भारत को लेकर पश्चिमी दुनिया के रक्षा मुख्यालयों में इस वक्त एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक, जासूसी सैटेलाइट्स की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए बैठे रणनीतिकारों की धड़कनें तेज हैं। आखिर भारत के गुप्त भूमिगत ठिकानों में ऐसा क्या पक रहा है, जिसकी भनक दुनिया को नहीं लग पा रही? स्टॉकहोम से लेकर जिनेवा तक बैठे थिंक टैंक्स अचानक भारत के परमाणु जखीरे पर नए सिरे से माथापच्ची क्यों करने लगे हैं? क्या दुनिया को दिखाई जा रही भारत के 190 परमाणु हथियारों की गिनती केवल एक रणनीतिक पर्दा है?
जिस मिसाइल को हमारा DRDO महज 5000 किलोमीटर की बताकर पेश करता है, उसके नाम से ही बीजिंग और यूरोप के बंकर क्यों कांप उठते हैं? और अगर दुश्मन ने पहला वार करने की हिमाकत कर भी दी, तो समंदर की 50 मीटर गहरी खामोशी से ऐसा कौन सा प्रहार निकलेगा जो हमलावर देश का नामोनिशान हमेशा के लिए मिटा देगा?
सवाल बिल्कुल सीधा है। क्या भारत ने खामोशी से अपनी सामरिक ताकत का ऐसा अभेद्य चक्रव्यूह तैयार कर लिया है, जिसने एशिया के पूरे पावर बैलेंस को जड़ से हिला दिया है?
पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय रक्षा गलियारों में जबरदस्त हलचल मची हुई है। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स और SIPRI की ताजा रिपोर्ट्स यह दावा करती हैं कि भारत के पास 172 से 190 एक्टिव न्यूक्लियर वॉरहेड्स हैं। दुनिया के बड़े-बड़े विश्लेषक इस आंकड़े को सच मानकर अपनी सारी गणनाएं बैठा रहे हैं। लेकिन रक्षा विज्ञान के असल जानकार यह अच्छी तरह समझते हैं कि यह सिर्फ सतह पर तैरता हुआ एक नंबर है। असली कहानी तो इसके बहुत पीछे छिपी है।
आधुनिक युद्ध केवल बमों की संख्या गिनकर नहीं जीते जाते। असली ताकत इस बात में है कि वह हथियार कितनी तेजी से तैनात हो सकता है, क्या वह दुश्मन के मजबूत रडार ग्रिड को चकमा दे सकता है, और सबसे बड़ी बात- क्या वह पहले हमले को झेलकर पलटवार करने की क्षमता रखता है? भारत ने पिछले एक दशक में बिना किसी आक्रामक बयानबाजी के अपने पूरे न्यूक्लियर ट्रायड को पूरी तरह ऑपरेशनल कर दिया है। जल, थल और नभ से प्रहार करने की यह अचूक क्षमता अब उस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां भारत के खिलाफ कोई भी दुस्साहस सीधे आत्मघाती साबित होगा।
प्लूटोनियम का गणित: जो दिखता है, वो है नहीं
तो फिर 190 वॉरहेड्स का यह आंकड़ा क्या है? क्या यह सिर्फ पश्चिमी दुनिया को उलझाने का एक मास्टरस्ट्रोक है? हकीकत समझने के लिए हमें भारत के विखंडनीय पदार्थ यानी फिसाइल मटीरियल के गणित को डिकोड करना होगा। भारत का सैन्य परमाणु कार्यक्रम केवल घोषित सुविधाओं तक सीमित नहीं है। मुंबई के ट्रॉम्बे में स्थित BARC का ध्रुव रिएक्टर दशकों से बिना रुके चल रहा है। 100 मेगावाट का यह रिसर्च रिएक्टर पूरी तरह से IAEA के सेफगार्ड्स से बाहर है। इसका सीधा सा मतलब है कि इसका पूरा उत्पादन सीधे देश के सामरिक भंडार में जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था IPFM के आकलनों पर गौर कीजिए। भारत के पास 800 से 1,000 किलोग्राम वेपन्स-ग्रेड प्लूटोनियम का अघोषित भंडार मौजूद है। एक आधुनिक कॉम्पैक्ट वॉरहेड को तैयार करने में महज 4 से 5 किलोग्राम प्लूटोनियम की जरूरत होती है। अब आप खुद गणित लगाइए। अगर भारत चाहे, तो कुछ ही हफ्तों के भीतर अपने वॉरहेड्स की संख्या को 190 से बढ़ाकर सीधे 400 के पार पहुंचा सकता है। भारत ने जानबूझकर इन हथियारों को असेंबल करके शोकेस नहीं किया है। भारत की नीति हमेशा से क्रेडिबल मिनिमम डेटरेंस की रही है। यानी हथियार उतने ही रखो जितने दुश्मन को रोकने के लिए काफी हों, लेकिन मसाला इतना तैयार रखो कि जरूरत पड़ते ही पूरी दुनिया का नक्शा बदला जा सके।
अग्नि-5: वो मिसाइल जिसने ड्रैगन की नींद उड़ाई
यह तो सिर्फ बारूद का सच था। असली सनसनी उस डिलीवरी सिस्टम को लेकर है, जो इस बारूद को दुश्मन की दहलीज तक ले जाएगा। जब भी अग्नि-5 का नाम आता है, DRDO की आधिकारिक फाइलों में उसकी रेंज 5,000 से 5,500 किलोमीटर दर्ज मिलती है। नई दिल्ली इसे इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) कहकर दुनिया के सामने पेश करती है। लेकिन इस 5,000 किलोमीटर के आंकड़े के पीछे का खौफनाक सच क्या है? बीजिंग के सुरक्षा योजनाकार इस मिसाइल के नाम से ही क्यों बेचैन हो उठते हैं?
रॉकेट साइंस का एक सीधा नियम है जिसे सियोलकोवस्की रॉकेट इक्वेशन कहते हैं। अग्नि-5 का कुल वजन लगभग 50 टन है। इसमें तीन चरणों वाला सॉलिड रॉकेट मोटर लगा है और इसकी बॉडी एडवांस कार्बन कम्पोजिट मटीरियल से बनी है। अगर इस मिसाइल पर 1,500 किलोग्राम का भारी पेलोड लादा जाए, तो यह 5,000 किलोमीटर जाती है। लेकिन अगर इसी मिसाइल पर आधुनिक 500 किलोग्राम का हल्का थर्मोन्यूक्लियर वॉरहेड लगा दिया जाए, तो क्या होगा?
भौतिकी के नियम झूठ नहीं बोलते। पेलोड घटते ही इस मिसाइल की मारक क्षमता सीधे 7,500 से 8,500 किलोमीटर तक पहुंच जाती है। चीनी सैन्य विज्ञान अकादमी के वरिष्ठ शोधकर्ता डु वेनलॉन्ग ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि भारत अपनी मिसाइल क्षमता को जानबूझकर छिपा रहा है। अग्नि-5 असल में एक पूर्ण अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल यानी ICBM है। यह सिर्फ बीजिंग या शंघाई तक सीमित नहीं है, यह पूरे एशिया, डिएगो गार्सिया, यूरोप के बड़े हिस्से और हिंद महासागर के हर कोने को अपनी जद में लेती है। ताकत इतनी रखो कि दुश्मन कांपे, लेकिन ढिंढोरा इतना कम पीटो कि कोई पश्चिमी देश आपके खिलाफ कूटनीतिक घेराबंदी न कर सके।
मिशन दिव्यास्त्र: अंतरिक्ष से अचूक प्रहार
अब जरा 11 मार्च 2024 की उस सुबह को याद कीजिए जिसने दुनिया के मिसाइल विशेषज्ञों के होश उड़ा दिए थे। भारत ने मिशन दिव्यास्त्र को अंजाम दिया। यह अग्नि-5 का पहला ऐसा टेस्ट था जो MIRV तकनीक से लैस था। MIRV यानी मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल। अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के बाद भारत दुनिया का पांचवां ऐसा देश बना जिसने इस जटिल तकनीक पर पूर्ण नियंत्रण हासिल किया।
मिशन दिव्यास्त्र कोई आम तकनीक नहीं है। MIRV से लैस अग्नि-5 जब अंतरिक्ष के निर्वात में पहुंचती है, तो उसका पोस्ट-बूस्ट व्हीकल एक्टिव हो जाता है। यह अंतरिक्ष में उड़ते हुए पहला वॉरहेड अलग दिशा में छोड़ती है, फिर अपनी कक्षा बदलकर दूसरा वॉरहेड किसी दूसरे शहर की तरफ दाग देती है। तीसरा वॉरहेड सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी तीसरे सैन्य ठिकाने की तरफ बढ़ जाता है। एक मिसाइल, और अंतरिक्ष से तीन अलग-अलग टारगेट पर प्रहार। और खेल यहीं खत्म नहीं होता। इस मिसाइल के साथ दर्जनों डिकॉय यानी नकली वॉरहेड और इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स भी छोड़े जाते हैं। चीन ने अपनी सीमाओं पर अरबों डॉलर खर्च करके जो HQ-19 एयर डिफेंस ग्रिड तैयार किया है, वह इस तकनीक के सामने पूरी तरह लाचार हो जाता है। जब तक दुश्मन का रडार सिस्टम असली और नकली बम में फर्क समझता है, तब तक मैक-24 यानी ध्वनि की गति से 24 गुना तेज रफ्तार से गिरते हुए असली वॉरहेड्स अपना काम पूरा कर चुके होते हैं।
कनस्तरीकरण: 15 मिनट में लॉन्च का अलर्ट
इन हथियारों को लॉन्च करने में अगर घंटों का वक्त लग जाए, तो फिर आधुनिक सैटेलाइट्स के दौर में इनका क्या फायदा? यहीं पर भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक ट्रंप कार्ड सामने आता है- कैनिस्टराइजेशन की गुप्त क्रांति।
पुरानी तकनीक में मिसाइल और परमाणु बम अलग-अलग तहखानों में रखे जाते थे। संकट के समय दोनों को साथ लाने और असेंबल करने में 24 घंटे लग जाते थे। आज भारत ने इस पूरी व्यवस्था को जड़ से बदल दिया है। अग्नि-प्राइम और अग्नि-5 पूरी तरह से कैनिस्टराइज्ड हैं। मिसाइल अपने वॉरहेड के साथ पहले से ही एक मजबूत कम्पोजिट कनस्तर के भीतर सीलबंद रहती है। यह सिस्टम पूरी तरह से रोड-मोबाइल और रेल-मोबाइल है। एक भारी ट्रक देश के किसी भी अनजान हाईवे या गहरी सुरंग से बाहर निकलता है, कनस्तर को 90 डिग्री पर खड़ा करता है, ऑथराइजेशन कोड पंच होते हैं और महज 10 से 15 मिनट में मिसाइल आसमान का सीना चीरते हुए निकल जाती है। दुश्मन के जासूसी सैटेलाइट्स जब तक खतरे को भांपते हैं, तब तक सब खत्म हो चुका होता है।
समंदर की गहराई में खामोश सिकंदर
मान लीजिए किसी युद्ध में दुश्मन ने भारत पर एक बहुत बड़ा पहला हमला कर दिया और हमारे सारे बेस तबाह कर दिए। क्या भारत जवाबी हमला नहीं कर पाएगा? यहीं पर भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का सबसे खामोश और सबसे घातक अंग सामने आता है- समुद्र की 50 मीटर गहरी गहराइयों में बैठा सेकंड-स्ट्राइक डेटरेंस।
सतह पर सब कुछ खाक हो सकता है, लेकिन समुद्र के नीचे सन्नाटे में तैरती भारतीय परमाणु पनडुब्बियों को कोई नहीं छू सकता। विशाखापत्तनम में तैयार हुई आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात आज नौसेना का अजेय हिस्सा हैं। अरिघात अपने स्वदेशी उशूस सोनार सिस्टम के कारण इतनी शांत है कि दुश्मन के आधुनिकतम विमान भी इसे ढूंढ नहीं सकते। भारत की के-4 मिसाइल, जिसकी मारक क्षमता 4,000 किलोमीटर है, बंगाल की खाड़ी के सुरक्षित पानी में रहते हुए भी बीजिंग और इस्लामाबाद को अपने सटीक निशाने पर रखती है। भविष्य की के-5 और के-6 मिसाइलें तो सीधे सबमरीन से दागी जाने वाली ICBM बनेंगी।
आसमान के सिकंदर: राफेल और मिराज का दबदबा
जमीन और समंदर के अलावा आसमान में भी भारत की तैयारी पूरी है। ग्वालियर एयरबेस पर तैनात मिराज 2000H और अंबाला के जगुआर फाइटर्स हमेशा से मॉडिफाइड रहे हैं, लेकिन अब असली ताकत राफेल के रूप में सामने आ चुकी है। अंबाला और हाशिमारा में तैनात राफेल विमान हवा से मार करने वाले परमाणु हथियारों के सबसे घातक प्लेटफॉर्म बन चुके हैं। राफेल का मिशन कंप्यूटर परमाणु पेलोड के लिए पूरी तरह अनुकूल है।
नो फर्स्ट यूज: क्या भारत अब प्रहार करेगा?
अब उस सवाल की बात करते हैं जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ाई हुई है। क्या भारत अपनी नो फर्स्ट यूज यानी NFU की नीति पर आज भी उसी तरह कायम है? क्या भारत सच में अपने ऊपर पहला बम गिरने का इंतजार करेगा?
2003 में नीति तय हुई थी कि हम पहले हमला नहीं करेंगे। लेकिन अगस्त 2019 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पोखरण में जो बयान दिया, उसने ग्लोबल सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए। उन्होंने साफ कहा था कि भविष्य में क्या होगा, यह उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इस एक बयान ने रणनीतिक अस्पष्टता का सबसे बड़ा एलिमेंट जोड़ दिया।
अगर भारत के खुफिया तंत्र को यह पक्का इनपुट मिल जाए कि दुश्मन भारत पर परमाणु हमला करने ही वाला है और उसकी मिसाइलों में ईंधन भरा जा चुका है, तो क्या भारत हाथ पर हाथ धरकर बैठेगा? बिल्कुल नहीं। भारत के पास अब एक घातक प्री-एम्प्टिव काउंटर-फोर्स स्ट्राइक करने की पूरी क्षमता मौजूद है। दुश्मन के बटन दबाने से पहले ही उसके लॉन्च पैड्स को खाक किया जा सकता है।
पाकिस्तान के जनरल अक्सर अपने छोटे टैक्टिकल बमों (नसर मिसाइल) का डर दिखाते हैं। उन्हें लगता है कि वे छोटा प्रहार करेंगे और भारत जवाब नहीं देगा। लेकिन भारत का फैसला क्रूर और स्पष्ट है- भारत के लिए छोटा या बड़ा बम जैसी कोई चीज नहीं है। अगर भारत पर कोई भी हमला हुआ, तो जवाब ‘मैसिव रिटेलिएशन’ होगा। ऐसा व्यापक और विनाशकारी प्रहार जो हमलावर देश का भूगोल हमेशा के लिए बदल देगा।
कल्पक्कम का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और रत्नाहल्ली का रेयर मटीरियल्स प्रोजेक्ट भारत के इस जखीरे को असीमित ऊर्जा दे रहे हैं। भारत का यह परमाणु कवच किसी पर हमला करने के लिए नहीं बना है। भारत शांति का पुजारी है। लेकिन यह शांति किसी कमजोरी की मोहताज नहीं है। यह शांति उन अजेय मिसाइलों, मौन पनडुब्बियों और हमारे वैज्ञानिकों के उस दृढ़ संकल्प पर टिकी है, जो किसी भी दुस्साहस का जवाब सीधे महाविनाश से देने के लिए 24 घंटे तैयार खड़े हैं।
आपको क्या लगता है? क्या बदलते वैश्विक हालात में भारत को अपनी ‘नो फर्स्ट यूज’ की नीति को पूरी तरह त्यागकर पहले प्रहार की खुली नीति घोषित कर देनी चाहिए? अपने विचार जरूर साझा कीजिए।





