युद्ध की बिसात पर जब दुनिया की नज़रें लड़ाकू विमानों पर टिकी होती हैं, तब युद्ध की असली रूपरेखा वे विशालकाय हवाई योद्धा तय करते हैं जो रातों रात सरहदों पर हजारों सैनिकों, टैंकों और तोपों को उतारने का माद्दा रखते हैं। भारत की रक्षा गलियारों में इन दिनों एक ऐसी ही खुफिया और बेहद रणनीतिक सुगबुगाहट चल रही है, जिसने न केवल चीन के बीजिंग में बल्कि पश्चिमी रक्षा दिग्गजों के बोर्डरूम में भी भारी बेचैनी पैदा कर दी है। यह कहानी सिर्फ ब्राजील की एयरोस्पेस दिग्गज कंपनी एम्ब्रेयर के C-390M मिलनियम को भारत में बनाने तक सीमित नहीं है। अंदरखाने एक तीसरे और पूरी तरह से नए बाहुबली को जन्म देने की नींव रखी जा रही है। एक ऐसा स्वदेशी 40 टन पेलोड क्षमता वाला सैन्य परिवहन विमान, जिसे भारत और एम्ब्रेयर मिलकर मेक इन इंडिया के तहत विकसित करने का मास्टरप्लान तैयार कर चुके हैं।
इस पूरी इनसाइड स्टोरी को समझने के लिए हमें इतिहास, वर्तमान के सटीक आंकड़ों, असफल हो चुके पुराने प्रोजेक्ट्स और हाल ही में हुए उन घटनाक्रमों की तह तक जाना होगा, जिन्होंने लगभग 10 बिलियन डॉलर की इस मदर ऑफ ऑल एयरलिफ्ट डील्स की बुनियाद रखी है। यह उस पूरे चक्रव्यूह का पर्दाफाश है जो भारतीय वायुसेना को सोवियत युग की जंजीरों से मुक्त कर एक ग्लोबल एयरोस्पेस पावर बनाने जा रहा है।
भारतीय वायुसेना का वर्तमान परिवहन बेड़ा मुख्य रूप से सोवियत संघ के जमाने की तकनीक पर टिका है। इसमें सबसे अहम भूमिका 100 से अधिक एंटोनोव एन-32 और इल्युशिन इल-76 गजराज विमानों की रही है। एन-32 जिसकी पेलोड क्षमता मात्र 6.7 टन है, वह दशकों से हिमालय की दुर्गम चोटियों और पूर्वोत्तर भारत के सीमित रनवे पर वायुसेना का सबसे भरोसेमंद साथी रहा है। वहीं 48 टन की पेलोड क्षमता वाला भारी भरकम इल-76 भारत के लिए एक हेवी लिफ्टर का काम करता रहा है। लेकिन इन दोनों की उम्र अब पूरी हो चुकी है। 1980 के दशक में खरीदे गए ये विमान अब रखरखाव के भारी संकट से जूझ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या इनकी सर्विसिबिलिटी रेट है, जो गिरकर लगभग 50 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक आ चुकी है।
यानी अगर युद्ध की स्थिति आन पड़े, तो बेड़े के आधे विमान उड़ान भरने की स्थिति में ही नहीं होंगे। इल-76 के पुराने इंजन ईंधन के मामले में बेहद खर्चीले हैं और आधुनिक डिजिटल एवियोनिक्स के अभाव में ये 21वीं सदी के नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध के लिए पूरी तरह से अनफिट हो चुके हैं। रक्षा मंत्रालय का स्पष्ट विजन है कि 2035 तक इन सोवियत युग के पुराने विमानों को हर हाल में रिटायर कर दिया जाए और उनकी जगह एक ऐसा सिस्टम लाया जाए जो किसी भी देश पर निर्भर न हो।
ऐसा नहीं है कि भारत ने इस खतरे को भांपा नहीं था। लेकिन जो कदम उठाया गया वह एक बड़ी कूटनीतिक और तकनीकी भूल साबित हुआ। भारत ने समय रहते मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट यानी एमटीए बनाने का सपना देखा था। भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और रूस की कंपनी के बीच एक मल्टी रोल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट इल-214 को संयुक्त रूप से विकसित करने का समझौता हुआ था। यह विमान 15 से 20 टन क्षमता वाला होना था। लेकिन यह प्रोजेक्ट लाल फीताशाही और तकनीकी विवादों की भेंट चढ़ गया। भारतीय वायुसेना एक आधुनिक सिस्टम से लैस इंजन चाहती थी और इंजनों की हवा में इंजन बंद होने पर दोबारा चालू करने की क्षमता को लेकर रूस के साथ गहरे मतभेद पैदा हो गए।
रूस अपनी पुरानी तकनीक थोपना चाहता था, लेकिन नए भारत ने इसे साफ नकार दिया। आखिरकार रूस ने इस जॉइंट प्रोजेक्ट को फ्रीज करने का इशारा किया और भारत तथा रूस का यह संयुक्त प्रोजेक्ट पूरी तरह से रद्द हो गया। रूस ने बाद में अकेले ही इसे आगे बढ़ाया, लेकिन भारत इस सौदे से बाहर आ चुका था। इस असफलता ने भारतीय वायुसेना के लॉजिस्टिक्स में एक बहुत बड़ा खालीपन पैदा कर दिया।
इस खालीपन की असली कीमत भारत को 2020 में गलवान घाटी में चीन के साथ हुए खूनी संघर्ष के दौरान चुकानी पड़ सकती थी, लेकिन भारत को अमेरिका से खरीदे गए आधुनिक विमानों ने समय रहते बचा लिया। जब चीन की सेना ने लद्दाख में भारी सैन्य जमावड़ा किया, तब भारत को रातों रात अपने सैनिकों और भारी हथियारों को हिमालय की चोटियों पर पहुंचाना था। उस समय भारत के पास मौजूद 11 बोइंग सी-17 ग्लोबमास्टर थर्ड जिनकी क्षमता 77.5 टन है और 12 लॉकहीड मार्टिन सी-130जे सुपर हरक्युलिस जिनकी क्षमता 20 टन है, गेमचेंजर साबित हुए।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वायुसेना ने इन विमानों की मदद से कुछ ही समय के भीतर 68000 से अधिक सैनिकों, 90 से ज्यादा भारी टी-90 और टी-72 टैंकों, तथा लगभग 300 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के फॉरवर्ड बेस पर ड्रॉप किया। सी-17 विमानों ने अकल्पनीय विश्वसनीयता दिखाई। लेकिन समस्या यह है कि भारत के पास केवल 11 ही सी-17 विमान हैं और बोइंग इसकी प्रोडक्शन लाइन दुनिया भर के लिए बंद कर चुका है। इसलिए भारत अब चाहकर भी और सी-17 नहीं खरीद सकता। इस गलवान संकट ने साउथ ब्लॉक की आंखें पूरी तरह से खोल दीं। यह स्पष्ट हो गया कि भारत को न सिर्फ एन-32 का विकल्प चाहिए, बल्कि उसे भारी और मध्यम पेलोड के बीच का एक ऐसा मल्टी रोल ट्रांसपोर्टर चाहिए जो संख्या में ज्यादा हो, स्वदेश में बने, और किसी भी वक्त 90 प्रतिशत से ज्यादा सर्विसिबिलिटी रेट दे सके।
यहीं से शुरू होता है भारत का असली पलटवार। गलवान की सीख और रूसी प्रोजेक्ट की विफलता के बाद भारत सरकार ने एक निर्णायक और आक्रामक कदम उठाया। महीनों की चर्चाओं और आरएफआई के बाद, अंततः रक्षा मंत्रालय ने 60 मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के लिए एक औपचारिक आरएफपी जारी कर दिया। सामरिक सूत्रों के मुताबिक भविष्य में इस सौदे को 80 विमानों तक बढ़ाया जा सकता है। 100000 करोड़ रुपये के इस टेंडर की शर्तें बेहद सख्त और स्पष्ट हैं। विमान की वहन क्षमता 18 से 30 टन के बीच होनी चाहिए। कुल 60 विमानों में से शुरुआत के 12 विमान सीधे विदेशों से बनकर आएंगे, जबकि बाकी के 48 विमानों का निर्माण 100 प्रतिशत भारत में ही किया जाएगा, जिसमें व्यापक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल होगा।
इस विशालकाय टेंडर में तीन मुख्य पश्चिमी दावेदार मैदान में उतरे। पहला एयरबस का ए400एम एटलस जिसकी पेलोड क्षमता 37 टन है। दूसरा लॉकहीड मार्टिन का सी-130जे सुपर हरक्युलिस जिसकी पेलोड क्षमता 20 टन है। और तीसरा ब्राजील की एम्ब्रेयर का सी-390एम मिलनियम जिसकी पेलोड क्षमता 26 टन है, जो टेंडर के एकदम मध्य में बिल्कुल सटीक बैठता है।
लेकिन असली भू राजनीतिक भूकंप तब आया जब महिंद्रा और एम्ब्रेयर ने वो मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने इस रेस के समीकरण पूरी तरह से बदल दिए। ब्राजील की एम्ब्रेयर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी कमर्शियल जेट निर्माता कंपनी है। दोनों कंपनियों के बीच शुरुआती एमओयू साइन होने के बाद यह आधिकारिक घोषणा कर दी गई कि यदि उन्हें यह टेंडर मिलता है, तो सी-390एम की फाइनल असेंबली लाइन महाराष्ट्र के नागपुर में स्थापित की जाएगी। नागपुर को चुनना यह साबित करता है कि वे भारत के केंद्र से पूरे एशिया के इकोसिस्टम को कंट्रोल करना चाहते हैं।
सी-390एम की खासियत यह है कि यह एक ट्विन इंजन जेट पावर्ड विमान है। इसमें लगे टर्बोफैन इंजन इसे लगभग 870 किलोमीटर प्रति घंटे की टॉप स्पीड देते हैं। 26 टन की पेलोड क्षमता वाले इसके कार्गो होल्ड में बख्तरबंद वाहन या 80 पूरी तरह से सुसज्जित सैनिक आसानी से समा सकते हैं। इसके लैंडिंग गियर विशेष रूप से लो प्रेशर टायर्स से लैस हैं, जिसका मतलब है कि यह लद्दाख की कच्ची हवाई पट्टियों पर भी बिना किसी दिक्कत के लैंड कर सकता है। और इसका विशेष वैरिएंट हवा में ही दूसरे लड़ाकू विमानों को ईंधन दे सकता है।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती, बल्कि असली सस्पेंस तो अब शुरू होता है। भारत सिर्फ 26 टन के सी-390एम पर रुकने वाला नहीं है। सी-390एम केवल एन-32 का शानदार विकल्प बन सकता है, लेकिन भारत को अपने 48 टन वाले इल-76 बेड़े को भी रिप्लेस करना है। रणनीतिकारों ने देखा कि 26 टन और 77.5 टन वाले सी-17 के बीच एक बहुत बड़ा पेलोड गैप है। भारत को 40 टन क्षमता का एक ऐसा मीडियम हैवी ट्रांसपोर्टर चाहिए जो रणनीतिक और सामरिक दोनों मिशनों को अंजाम दे सके। यहीं पर प्रोजेक्ट 40 सामने आता है।
एम्ब्रेयर ने भारत सरकार और एचएएल जैसी कंपनियों को एक बिल्कुल नया 40 टन पेलोड क्षमता वाला सैन्य परिवहन विमान को डेवलप करने का गुप्त प्रस्ताव दिया है। यह सिर्फ कोई असेंबली लाइन नहीं होगी, यह स्क्रैच से शुरू होने वाला एक इंडो-ब्राजीलियन जॉइंट वेंचर होगा। अगर यह 40 टन का बाहुबली भारत में डिजाइन और विकसित होता है, तो यह सीधे तौर पर यूरोप के ए400एम को ग्लोबल मार्केट में कड़ी टक्कर देगा। यह इल-76 की सटीक जगह लेगा और अत्याधुनिक फ्लाई बाय वायर तकनीक से लैस होगा। भारत को ऐसे 40 से 50 विमान चाहिए। इसके निर्माण से भारत के पास एयरफ्रेम डिजाइनिंग और हेवी लिफ्ट एरोडायनामिक्स का वो ज्ञान आ जाएगा जो अभी सिर्फ चुनिंदा देशों के पास है। यह सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति का सबसे बड़ा रक्षा मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
भारत की इस 40 टन स्वदेशी ट्रांसपोर्टर की आक्रामक तैयारी के पीछे चीन का बढ़ता खतरा सबसे बड़ा कारण है। चीन ने अपना खुद का हेवी लिफ्ट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट शियान वाई-20 तैयार कर लिया है, जिसकी पेलोड क्षमता 66 टन है। चीन ने इसे भारी संख्या में अपनी वायुसेना में शामिल करना शुरू कर दिया है, जिससे उसकी तिब्बत और लद्दाख के आसपास रातों रात सेना तैनात करने की क्षमता कई गुना बढ़ गई है। भारत को चीन के वाई-20 की बढ़ती तादाद के सामने अपना खुद का दमदार लिफ्टर चाहिए।
अब आते हैं उस ब्रह्मास्त्र पर जो दुश्मनों के पसीने छुड़ा देगा। आज के दौर में ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट सिर्फ कार्गो ढोने वाले खच्चर नहीं रह गए हैं। रक्षा अनुसंधान संगठन इनके लिए एक बहुत ही खतरनाक ब्लूप्रिंट तैयार कर रहा है। सी-390एम और प्रस्तावित 40 टन ट्रांसपोर्टर को अर्ली वार्निंग, मैरीटाइम पेट्रोल और टोही विमानों में तब्दील किया जा सकता है। भारत पहले से ही अन्य विमानों पर स्वदेशी नेत्रा रडार लगा चुका है। अब सी-390एम के बड़े एयरफ्रेम पर उन्नत नेत्रा रडार लगाना एक बहुत ही मारक कदम होगा।
इससे भी खौफनाक योजना है इन ट्रांसपोर्ट विमानों का वेपनाइजेशन। जिस तरह आधुनिक देश अपने विमानों से रैपिड सिस्टम के जरिए मिसाइलें दाबता है, उसी तर्ज पर भारत इन विमानों से क्रूज मिसाइलें फायर करने की योजना पर काम कर सकता है। सी-390एम को लंबी रेंज वाली निर्भय क्रूज मिसाइल या अन्य खतरनाक हथियारों से लैस किया जा सकता है। कल्पना कीजिए कि युद्ध के समय एक मालवाहक जहाज अचानक कई क्रूज मिसाइलों का पैलेट हवा में ड्रॉप कर दे, और वे मिसाइलें दुश्मन के एयरबेस को तबाह कर दें। यह क्षमता भारतीय वायुसेना को एक भयंकर स्ट्राइक पावर प्रदान करेगी।
भारतीय वायुसेना आज एक ऐसे मुहाने पर खड़ी है जहां से लिया गया एक फैसला अगले कई दशकों तक एशिया के आसमान का भविष्य तय करेगा। 60 एमटीए विमानों का टेंडर महज खरीद नहीं है, बल्कि भारत में एक संपूर्ण एयरोस्पेस इकोसिस्टम बनाने की शुरुआत है। टाटा और एयरबस पहले ही देश में परिवहन विमान बना रहे हैं, वहीं अब महिंद्रा और एम्ब्रेयर का नागपुर में सी-390एम का प्रोजेक्ट भारत को ग्लोबल पावरहाउस बना देगा। भारत का लक्ष्य दुनिया के उन देशों को सी-390 बेचना है जो महंगे अमेरिकी विमानों का सस्ता विकल्प खोज रहे हैं।
और सबसे अहम, 40 टन पेलोड वाले जॉइंट डेवलपमेंट का गोपनीय प्रोजेक्ट यह सुनिश्चित करेगा कि भारत कभी भी भारी लिफ्टिंग के लिए विदेशी ताकतों का मोहताज न रहे। जब लद्दाख की जमा देने वाली ठंड में भारत के खुद के बनाए हुए 40 टन के महाकाय ट्रांसपोर्ट विमान एक के बाद एक टैंकों को उतारेंगे, तब दुनिया को समझ आ जाएगा कि पुराना दौर पीछे छूट चुका है। यह नए, आक्रामक और आत्मनिर्भर भारत का युग है, जो अब हथियार खरीदता नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे घातक हवाई योद्धाओं को अपनी धरती पर जन्म देता है।





