अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप की अथाह गहराइयों के इर्द गिर्द भारत एक ऐसा अभेद्य सुरक्षा तंत्र तैयार कर रहा है, जिसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। हिंद महासागर के इन संवेदनशील समुद्री रास्तों पर अब केवल पारंपरिक गश्ती जहाज नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस मानवरहित समुद्री प्रणालियों और उन्नत पनडुब्बियों का एक नया नेटवर्क तैनात करने की रूपरेखा तैयार हो चुकी है। यह एक ऐसा रणनीतिक कदम है जो मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापारिक मार्गों पर भारत की निगरानी क्षमता को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा देता है।
सामरिक विश्लेषकों के अनुसार, हिंद महासागर में इस समय शक्ति संतुलन की एक बेहद गंभीर और शांत बिसात बिछी हुई है। चीनी नौसेना जिस तीव्र गति से अपने बेड़े का विस्तार कर रही है, वह अब किसी से छिपा नहीं है। जिबूती के नौसैनिक बेस से लेकर पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक फैले उनके समुद्री नेटवर्क के जवाब में भारत ने अब अपनी रक्षा रणनीति को पूरी तरह प्रो-एक्टिव और दूरदर्शी बना दिया है। नई दिल्ली का स्पष्ट संदेश है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अपने समुद्री हितों की रक्षा के लिए अग्रिम मोर्चे पर डटकर खड़ा होगा।
रणनीतिक संतुलन और द्वीपों की अहमियत
भौगोलिक दृष्टि से अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप भारत के लिए सिर्फ जमीन के टुकड़े नहीं हैं। रक्षा विशेषज्ञ इन्हें भारत के ऐसे अनसिंकेबल प्लेटफॉर्म्स मानते हैं, जो समंदर के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स पर प्राकृतिक पहरेदार की तरह स्थित हैं। दुनिया का एक बहुत बड़ा ऊर्जा व्यापार और व्यापारिक जहाज इसी संकरे समुद्री गलियारे से होकर गुजरते हैं। यदि भारत इन जलक्षेत्रों में अपनी नौसैनिक और तकनीकी पकड़ मजबूत रखता है, तो किसी भी भू-राजनीतिक संकट के समय पूरे क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त भारत के पास होगी। लेकिन इन द्वीपों की प्रभावी सुरक्षा और विशाल समुद्री क्षेत्र की चौबीसों घंटे निगरानी के लिए भारतीय नौसेना को आधुनिक अंडरवाटर और सरफेस प्लेटफॉर्म्स की तुरंत जरूरत है।
प्रोजेक्ट 75I: जर्मनी बनाम फ्रांस का तकनीकी मुकाबला
भारतीय नौसेना के प्रोजेक्ट 75I के तहत छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है, जो एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम से लैस होंगी। यह तकनीक पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हफ्तों तक बिना सतह पर आए पानी के भीतर शांत रहने की क्षमता देती है। इस दौड़ में इस समय दो प्रमुख यूरोपीय रक्षा दिग्गज आमने-सामने हैं। एक तरफ जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस है और दूसरी तरफ फ्रांस का नेवल ग्रुप।
जर्मन इंजीनियरिंग की विश्वसनीयता से पूरी दुनिया वाकिफ है। टीकेएमएस की 214 और 212 सीरीज की पनडुब्बियां अपने उन्नत सोनार, बेहतरीन स्टील्थ और मजबूत निर्माण कला के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत जर्मन प्रस्तावों का तकनीकी स्तर पर पूरा विश्लेषण कर रहा है। लेकिन सामरिक गलियारों में जिस पहलू पर सबसे ज्यादा मंथन हो रहा है, वह तकनीक से ज्यादा समय सीमा और इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम का है।
किसी भी नए विदेशी प्लेटफॉर्म को भारत में पहली बार लाने का मतलब है कि उसके लिए बिल्कुल नए सिरे से बुनियादी ढांचा खड़ा करना, भारतीय शिपयार्ड्स को उस खास डिजाइन के अनुसार ढालना और कामगारों को नए सिरे से प्रशिक्षित करना। रक्षा जानकारों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम एक दशक से लेकर पंद्रह साल तक का समय लग सकता है। दूसरी तरफ, क्षेत्रीय नौसैनिक विस्तार इतनी तेजी से हो रहा है कि भारत के पास लंबे इंतजार की गुंजाइश बेहद सीमित है। रक्षा नीति का मूलभूत सिद्धांत यही कहता है कि समय पर उपलब्ध प्रभावी क्षमता किसी भी दूरगामी वादे से कहीं अधिक मूल्यवान होती है।
नेवल ग्रुप का प्रूवन ट्रैक रिकॉर्ड और मझगांव डॉक
यहीं पर फ्रांस के नेवल ग्रुप की स्थिति काफी मजबूत नजर आती है। नेवल ग्रुप की स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बी भारत के लिए कोई नया या अप्रमाणित प्रोजेक्ट नहीं है। मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में प्रोजेक्ट 75 के तहत कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियों का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। आईएनएस कलवरी, खंडेरी, करंज, वेला, वागीर और वाग्शीर आज भारतीय नौसेना के एक्टिव फ्लीट का मजबूत हिस्सा हैं।
इसका सीधा लाभ यह है कि भारत के पास पहले से ही कुशल इंजीनियर, प्रशिक्षित तकनीशियन और विशेष असेंबली लाइन मौजूद है। यदि भारत इस प्लेटफॉर्म के विस्तार का विकल्प चुनता है, तो उसे स्क्रैच से शुरुआत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा, कूटनीतिक स्तर पर भारत और फ्रांस के रक्षा संबंध हमेशा बिना किसी राजनीतिक शर्त के आगे बढ़े हैं। चाहे 1998 का दौर रहा हो या 1999 का कारगिल संकट, फ्रांस ने हमेशा संवेदनशील रक्षा आपूर्ति को बिना रुकावट जारी रखा है।
डीआरडीओ की स्वदेशी तकनीक का एकीकरण
विदेशी रक्षा खरीद में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती हमेशा यह रही है कि कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय स्वदेशी उपकरणों को अपने प्लेटफॉर्म पर लगाने से परहेज करती हैं। वे तकनीकी जटिलताओं या वारंटी नियमों का हवाला देकर पीछे हट जाती हैं। लेकिन नेवल ग्रुप ने इस मामले में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ के साथ मिलकर काम करने की पूरी इच्छा जताई है।
डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वदेशी फ्यूल-सेल बेस्ड एआईपी सिस्टम को मौजूदा और भविष्य की स्कॉर्पीन पनडुब्बियों में इंटीग्रेट करने पर दोनों पक्षों में तकनीकी सहमति बन चुकी है। साथ ही, नेवल ग्रुप भारतीय नौसेना के लिए लाइफ-साइकिल सपोर्ट और मेंटेनेंस का मजबूत बेस भारत में ही स्थापित कर रहा है, जो आत्मनिर्भर भारत के विजन के साथ सीधे तौर पर मेल खाता है। हथियारों के मोर्चे पर भी फ्रांस की एसएम39 एक्सोसेट एंटी-शिप मिसाइलें इस प्लेटफॉर्म को लंबी दूरी तक सटीक मारक क्षमता प्रदान करती हैं।
सीक्वेस्ट एस: ऑटोनॉमस नौसैनिक युद्ध का नया दौर
पनडुब्बियों के समानांतर, समंदर की सतह पर मानवरहित प्रणालियों का एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। हाल ही में फ्रांस में भारतीय नौसैनिक प्रतिनिधियों के सामने नेवल ग्रुप ने अपने उन्नत अनमैन्ड सरफेस वेसल यानी यूएसवी का तकनीकी प्रदर्शन किया, जिसका नाम सीक्वेस्ट एस है। यह कदम साफ करता है कि भविष्य का समुद्री सुरक्षा ढांचा केवल पारंपरिक जहाजों के भरोसे नहीं रहेगा, बल्कि मानवरहित ड्रोन्स का नेटवर्क इसमें मुख्य भूमिका निभाएगा।
सीक्वेस्ट एस को नेवल ग्रुप की सहायक कंपनी सिरेना और कुआच सीएनसी शिपयार्ड ने मिलकर तैयार किया है। यह एक मॉड्यूलर सरफेस वेसल है, जिसे मिशन के अनुसार तुरंत रि-कॉन्फ़िगर किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी खास इलाके में अंडरवाटर हलचल ट्रैक करनी हो, तो इसे एंटी-सबमरीन वारफेयर पेलोड के साथ उतारा जा सकता है। वहीं, निगरानी और सिग्नल इंटेलिजेंस के लिए इसे इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरणों से लैस किया जा सकता है।
इस पूरे सिस्टम की रीढ़ इसका स्टीयरिस मिशन सिस्टम है। यह एक एडवांस्ड एआई सॉफ्टवेयर है जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के सेंसर डेटा को प्रोसेस करता है, खतरों का विश्लेषण करता है और सीधे कमांड सेंटर को रियल-टाइम फीड भेजता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के ड्रोन्स को भारतीय नौसेना के बड़े फ्रिगेट्स और डेस्ट्रॉयर्स के साथ इंटीग्रेट किया जा सकता है। एक अकेला युद्धपोत अपने साथ कई ऐसे ऑटोनॉमस ड्रोन्स ले जाकर समंदर में एक विस्तृत स्वार्म यानी सुरक्षा घेरा तैयार कर सकता है।
भारत स्वयं भी स्वदेशी स्तर पर ऑटोनॉमस अंडरवाटर और सरफेस व्हीकल्स पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हो रही इस तकनीक का अध्ययन भारतीय नौसेना को अपनी भविष्य की ऑटोनॉमी और डिस्ट्रीब्यूटेड मैरीटाइम ऑपरेशंस को गति देने में सहायक साबित हो रहा है।
हिंद महासागर में उभरती नई चुनौतियां यह साफ कर चुकी हैं कि भारत को अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीक, सिद्ध औद्योगिक क्षमता और त्वरित डिलीवरी का संतुलन बनाना होगा। समय की मांग को देखते हुए उठाया गया हर सटीक कदम भारत की समुद्री संप्रभुता को आने वाले दशकों के लिए पूरी तरह सुरक्षित बनाएगा।





