क्या भारतीय खुफिया एजेंसियों ने तिब्बत की बर्फीली चोटियों के पीछे चीन की कोई ऐसी खौफनाक साजिश पकड़ ली है जिसके डर से भारत को रातों-रात पचास हजार करोड़ रुपये के पांच नए एस-फोर हंड्रेड स्क्वाड्रन सिर्फ और सिर्फ चीन बॉर्डर पर धकेलने पड़ रहे हैं? आखिर लद्दाख के आसमान में ऐसा क्या मंडरा रहा है जिसे मार गिराने के लिए एस-फोर हंड्रेड के साथ एमआर-सैम का यह अभेद्य महा-चक्रव्यूह रचा जा रहा है? ड्रैगन हमें हिमालय में घेरने का सपना देख रहा था, लेकिन भारत ने फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया के हाथों में ब्रह्मोस का लाल बटन देकर, साउथ चाइना सी में चीन की नेवी की गर्दन पर सीधे तलवार कैसे रख दी है? आखिर क्यों भारत के इस एक कूटनीतिक वार ने बीजिंग के सत्ता के गलियारों की नींद हराम कर दी है?
एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में अक्टूबर दो हजार छब्बीस आते-आते एक खामोश लेकिन बेहद खतरनाक भूचाल आकार ले चुका है। एक तरफ हिमालय की बर्फीली ऊंचाइयों पर ड्रैगन अपनी विस्तारवादी और आक्रामक साजिशों का जाल बुन रहा है, तो दूसरी तरफ मोदी सरकार ने अपनी सामरिक और कूटनीतिक बिसात पर ऐसे मोहरे चल दिए हैं जिन्होंने बीजिंग के सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी है। भारत और चीन के बीच का तनाव अब केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब तकनीकी वर्चस्व, मिसाइल डिप्लॉयमेंट और कूटनीतिक घेराबंदी के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है।
क्या भारत और चीन के बीच कोई बड़ा तनाव या युद्ध होने वाला है? इस सवाल का जवाब उन सैन्य और सामरिक तैयारियों में छिपा है जो पिछले कुछ वर्षों, विशेषकर दो हजार पच्चीस के संघर्ष और ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारत ने युद्ध स्तर पर शुरू की हैं। चीन की पीएलए लगातार तिब्बत और शिनजियांग प्रांतों में अपने मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रही है। जे-ट्वेंटी जैसे फिफ्थ जनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट्स को भारतीय सीमा के बेहद करीब तैनात किया जा रहा है। इसके जवाब में भारत ने न केवल आसमान को अभेद्य बनाने के लिए रूस से एस-फोर हंड्रेड ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम की नई खेप मंगाने की तैयारी कर ली है, बल्कि स्वदेशी मिसाइल ढाल के जरिए ड्रैगन का गुरूर तोड़ने का पूरा खाका खींच लिया है।
मार्च दो हजार छब्बीस में भारत की डीएसी यानी डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया जिसने इस्लामाबाद से लेकर बीजिंग तक के रडार स्क्रीन पर लाल बत्तियां जला दीं। पचास हजार करोड़ रुपये से अधिक के भारी-भरकम बजट के साथ पांच अतिरिक्त एस-फोर हंड्रेड स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी गई। यह कोई सामान्य रक्षा खरीद नहीं थी, बल्कि यह दो हजार पच्चीस में हुए संघर्ष के दौरान उभरी उन सामरिक कमियों को भरने की एक बेहद आक्रामक रणनीति थी जिन्हें चीन भविष्य में इस्तेमाल करने का सपना देख रहा था।
भारत ने दो हजार अठारह में रूस के साथ पांच दशमलव चार तीन बिलियन डॉलर में पांच एस-फोर हंड्रेड स्क्वाड्रन का सौदा किया था। शुरुआती खेप का बड़ा हिस्सा पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के खिलाफ और कुछ हिस्सों को एनसीआर की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया। पिछले साल जब हाइब्रिड तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई, तब एस-फोर हंड्रेड ने पाकिस्तानी वायुसेना की किसी भी हवाई घुसपैठ को नाकाम कर दिया। लेकिन लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन के खिलाफ भारत का एयर डिफेंस अभी भी एक मजबूत ढाल की मांग कर रहा था। वर्तमान में पठानकोट का बेस सीधे तौर पर लद्दाख को कवर करने के बजाय उस पर केवल नजर रखता है, और सिलीगुड़ी कॉरिडोर का डिफेंस पूरे फ्रंटियर को कवर करने के बजाय केवल उस संकरे और संवेदनशील गलियारे की सुरक्षा तक सीमित है।
चीन ने इस खामी को भांपते हुए तिब्बत के अपने एयरबेसों जैसे होतान, गारगुन्सा, शिगात्से और गोंगगार को अपग्रेड कर लिया है। वहां मजबूत बंकर बनाए गए हैं और लंबी दूरी तक मार करने वाले प्रिसिजन-स्ट्राइक हथियारों को तैनात कर दिया गया है। यही कारण है कि भारत अगले पांच एस-फोर हंड्रेड सिस्टम्स को मुख्य रूप से चीन सीमा पर केंद्रित कर रहा है। हाई आल्टीट्यूड यानी अधिक ऊंचाई वाले इलाके एस-फोर हंड्रेड के रडारों के लिए एक वरदान की तरह काम करते हैं। पहाड़ों की ऊंचाई रडार की लाइन ऑफ साइट को बढ़ा देती है जिससे चीनी सीमा के भीतर सैकड़ों किलोमीटर दूर उड़ने वाले विमान, ड्रोन या मिसाइलें भी तुरंत ट्रैक की जा सकती हैं।
लेकिन क्या सिर्फ एस-फोर हंड्रेड से चीन का खेल खत्म हो जाएगा? ऐसा सोचना एक भूल होगी क्योंकि एस-फोर हंड्रेड मुख्य रूप से चार सौ किलोमीटर दूर से आने वाले बड़े और हाई-वैल्यू टारगेट्स को तबाह करने के लिए है। अगर चीन पहाड़ों की आड़ लेकर क्रूज मिसाइलों या छोटे स्वाम ड्रोन से हमला करता है तो एक लेयर्ड एयर डिफेंस की आवश्यकता होती है। यहीं एंट्री होती है एमआर-सैम की। भारत और इजराइल द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह सिस्टम सत्तर से सौ किलोमीटर के दायरे में किसी भी हवाई खतरे को थ्री हंड्रेड साठ डिग्री एंगल से नेस्तनाबूद कर सकता है। भारत चीन से लगने वाली सीमा पर एस-फोर हंड्रेड की बैटरियों के ठीक नीचे और आस-पास एमआर-सैम की सघन तैनाती कर रहा है। अगर कोई चीनी मिसाइल एस-फोर हंड्रेड के रडार से बचकर अंदर घुसने में कामयाब हो भी जाए, तो एमआर-सैम उसे रास्ते में ही राख कर देगा।
इसके साथ ही डीआरडीओ की सीक्रेट लैब्स में भारत का सबसे महत्वाकांक्षी हथियार आकार ले रहा है जिसका नाम है प्रोजेक्ट कुशा। यह भारत का अपना स्वदेशी एलआर-सैम सिस्टम है जो पूरी तरह से एस-फोर हंड्रेड के समकक्ष होगा। इसकी मारक क्षमता डेढ़ सौ किलोमीटर, ढाई सौ किलोमीटर और साढ़े तीन सौ किलोमीटर तक होगी। जैसे ही प्रोजेक्ट कुशा भारतीय वायुसेना में शामिल होगा, लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक का पूरा क्षेत्र एक एकीकृत लंबी दूरी के एयर डिफेंस नेटवर्क से कवर हो जाएगा। चीन की पीएलएएएफ के लिए भारत के इस बहुस्तरीय चक्रव्यूह को भेदना लगभग असंभव हो जाएगा।
यह तो बात हुई भारत के आसमान की सुरक्षा की, लेकिन असली भू-राजनीतिक खेल तो समंदर में चल रहा है। आज वैश्विक कूटनीति के मंच पर समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से चीन के खिलाफ जो बेहद सख्त और आक्रामक रुख अपनाया गया है, उसने भारत के कूटनीतिक कदमों को और भी ज्यादा धार दे दी है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन की इंडो पैसिफिक नीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता आज चीन को घेरने का एक अदृश्य गठजोड़ तैयार कर चुकी है। वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक चीन की घेराबंदी का जो चक्रव्यूह रचा जा रहा है उससे बीजिंग की रातों की नींद उड़ गई है।
चीन दशकों से भारत को घेरने के लिए स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका का हंबनटोटा और मालदीव में बढ़ता दखल भारत को समंदर में घेरने की साजिश है। लेकिन भारत ने कूटनीति की बिसात पर ऐसा पासा फेंका है जिससे ड्रैगन बिलबिला उठा है। भारत ने चीन को उसके सबसे संवेदनशील इलाके यानी साउथ चाइना सी में घेरना शुरू कर दिया है और इसका सबसे बड़ा अस्त्र बनी है दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस।
अक्टूबर दो हजार छब्बीस तक आते-आते ब्रह्मोस मिसाइल भारत की रक्षा निर्यात कहानी का सबसे चमकता हुआ सितारा बन चुकी है। इसका कुल निर्यात छह सौ मिलियन डॉलर के जादुई आंकड़े को पार करने की कगार पर है। साउथ ईस्ट एशिया के तीन देश फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम अब चीन के खिलाफ भारत की ब्रह्मोस मिसाइलें तानकर खड़े होने जा रहे हैं। फिलीपींस को करीब तीन सौ तीस मिलियन डॉलर यानी लगभग सत्ताईस सौ सत्तर करोड़ रुपये की ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति हो चुकी है।
साउथ चाइना सी में चीन के कोस्ट गार्ड अक्सर फिलीपींस की नौकाओं को डराते-धमकाते थे। लेकिन अब फिलीपींस के समुद्री तटों पर ब्रह्मोस की बैटरियां तैनात हैं। ब्रह्मोस की मारक क्षमता दो सौ नब्बे किलोमीटर से लेकर चार सौ किलोमीटर तक है और इसकी गति मैक टू पॉइंट एट से मैक थ्री पॉइंट जीरो तक है। इसका मतलब है कि अगर चीन का कोई युद्धपोत फिलीपींस के ईईजेड में घुसपैठ की कोशिश करता है, तो ब्रह्मोस मिसाइल बिना दुश्मन को प्रतिक्रिया का मौका दिए उसे समुद्र के तल में भेज देगी।
रक्षा सूत्रों के अनुसार इंडोनेशिया के साथ करीब दो सौ मिलियन डॉलर और वियतनाम के साथ सौ मिलियन डॉलर के निर्यात के लिए अनुबंध अंतिम चरण में हैं। वियतनाम का चीन के साथ लंबे समय से खूनी इतिहास रहा है। वियतनाम को ब्रह्मोस मिलने का सीधा मतलब है कि चीन के हैनान आइलैंड पर गंभीर खतरा मंडराना जहां चीन का सबसे बड़ा नेवल बेस है। इन तीनों देशों को ब्रह्मोस देकर भारत ने चीन की नाइन डैश लाइन की पूरी तरह से हवा निकाल दी है। चीन हमेशा से सोचता था कि वह एशिया का इकलौता चौधरी है, लेकिन भारत ने मित्र देशों को ऐसा वेपन दे दिया है जिसे रोकना चीनी नेवी के एचक्यू-नाइन एयर डिफेंस सिस्टम के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है।
आखिर दुनिया अचानक ब्रह्मोस के पीछे क्यों भाग रही है? इसका जवाब छिपा है ऑपरेशन सिंदूर में। यह एक अत्यधिक गोपनीय और निर्णायक स्ट्राइक थी जिसने साबित कर दिया कि भारत दुश्मन के घर में घुसकर सटीक प्रहार करने की इच्छाशक्ति रखता है। ब्रह्मोस मिसाइल की पिनपॉइंट एक्यूरेसी ने दुश्मन के रडारों को सोचने तक का समय नहीं दिया। सु-थर्टीन एमकेआई लड़ाकू विमानों से दागे गए इसके एयर लॉन्च्ड वर्जन ने सौ प्रतिशत सफलता हासिल की। ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी ने ही विदेशी बाजारों में इसकी मांग को रातों-रात आसमान पर पहुंचा दिया।
यह सब देखने के बाद यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या चीन चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा? बिल्कुल नहीं। भारत की इस आक्रामक घेराबंदी से बौखलाया चीन कई खौफनाक साजिशें रच रहा है। पहली रणनीति है ग्रे जोन वारफेयर। चीन जानता है कि भारत के साथ फुल स्केल वार करना उसके लिए सैन्य आत्महत्या होगी। इसलिए वह एलएसी पर सामी स्लाइसिंग और बंजर इलाकों में रातों-रात शियाओकांग विलेज बसाकर लगातार दबाव बना रहा है। दूसरी साजिश है साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर। पीएलए स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स भारत के पावर ग्रिड और रक्षा नेटवर्क को हैक करने की लगातार कोशिश कर रही है।
चीन की तीसरी सबसे खतरनाक साजिश है ब्रह्मपुत्र नदी पर वाटर टेररिज्म। तिब्बत से निकलने वाली यारलूंग त्सांगपो नदी पर चीन विशालकाय सुपर-डैम बना रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन इसका इस्तेमाल एक वाटर वेपन के रूप में कर सकता है। बारिश में पानी छोड़कर नॉर्थ ईस्ट में बाढ़ लाना या सूखे में पानी रोककर जल संकट पैदा करना एक खौफनाक चीनी चाल है। इसके साथ ही चीन ने पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा मोहरा बना लिया है। भारत का ध्यान बंटाने के लिए चीन पाकिस्तानी सेना को अत्याधुनिक हथियार और जे-थर्टी वन स्टेल्थ जेट्स देने का वादा कर रहा है ताकि भारत हमेशा टू फ्रंट वार के जाल में फंसा रहे।
लेकिन पर्दे के पीछे की स्ट्रेटेजिक डिकोडिंग यही बताती है कि आज का भारत बहुत आगे निकल चुका है। आज लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर एस-फोर हंड्रेड और एमआर-सैम के जरिए मौत का ऐसा अदृश्य जाल बिछाया जा रहा है जिसे पार करने की हिम्मत चीन का जे-ट्वेंटी भी नहीं कर सकता। भारत की नेकलेस ऑफ डायमंड्स रणनीति के तहत साउथ ईस्ट एशिया को दी जा रही ब्रह्मोस मिसाइलें ड्रैगन की छाती पर गड़े हुए खंजर हैं।
ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर भारत ने ग्लोबल पोजीशनिंग में जो छलांग लगाई है, वह चीन के लिए एक बुरे सपने से कम नहीं है। चीन चाहे जितनी भी साजिशें रच ले, भारत ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि यदि हिमालय में ड्रैगन ने आग उगलने की कोशिश की, तो साउथ चाइना सी में उसकी पूंछ कुचलने के लिए भारत और उसके मित्र देश पूरी तरह तैयार हैं। आसमान से लेकर समंदर तक भारत ने ड्रैगन को घेरने की जो चक्रव्यूह रचना की है, वह एशिया के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय लिख रही है।





