अक्टूबर 2026 की शुरुआत में बंगाल की खाड़ी के ऊपर एक साधारण सा दिखने वाला तकनीकी नोटिस जारी होता है। अंतरराष्ट्रीय एविएशन की भाषा में इसे NOTAM यानी ‘नोटिस टू एयरमेन’ कहते हैं। कागजों पर यह चेतावनी 6 अक्टूबर से 9 अक्टूबर 2026 के बीच, सुबह 10:00 बजे से शाम 16:00 बजे तक प्रभावी है। लेकिन जैसे ही इस नोटिस के अक्षांश और देशांतर ग्लोबल मिलिट्री मैप पर प्लॉट किए गए, बीजिंग से लेकर ढाका और वॉशिंगटन तक के रक्षा मुख्यालयों में हड़कंप मच गया।
यह अलर्ट ओडिशा के दशकों पुराने चांदीपुर या डॉ. अब्दुल कलाम द्वीप के लिए नहीं था। इस बार मिसाइल लॉन्च का केंद्र पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर का एक शांत तटीय इलाका बना है, जिसे दुनिया जुनपुट के नाम से जानती है। और यहीं से चीन से लेकर दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों की नींद उड़नी शुरू हो गई है।
सवाल खड़ा होता है कि आखिर भारत ने ओडिशा में पहले से दो-दो विश्वस्तरीय मिसाइल बेस होने के बावजूद, बंगाल के एक शांत तटीय गांव को रातों-रात सीक्रेट मिसाइल ज़ोन में क्यों बदल दिया? क्या 6 से 9 अक्टूबर का यह NOTAM केवल एक सामान्य मिसाइल परीक्षण है, या फिर हिंद महासागर में घात लगाकर बैठे चीनी जासूसी जहाजों को अंधा करने की सोची-समझी सैन्य चाल? बंगाल की खाड़ी में यह रणनीतिक हलचल ठीक उसी हफ्ते क्यों तेज हुई, जब ढाका में चीन और तुर्किये के साथ ड्रोन टेक्नोलॉजी की सीक्रेट डील्स को लेकर सुगबुगाहट चल रही थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या बंगाल के इस समुद्री तट से उठने वाला रॉकेट समंदर के लिए नहीं, बल्कि भारत की सबसे संवेदनशील नस ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ यानी चिकन नेक को बचाने का नया सुरक्षा कवच है?
इन सवालों के जवाब किसी साधारण रक्षा ब्रीफिंग में नहीं मिलने वाले हैं। इसके पीछे भारत के ईस्टर्न सीबोर्ड की वह सबसे बड़ी भू-रणनीतिक बिसात है, जिसे नई दिल्ली ने पिछले दो सालों में बेहद खामोशी से तैयार किया है।
ऑपरेशन जुनपुट: दलदल से मिसाइल बेस तक का सफर
बात शुरू होती है वर्ष 2024 से। रक्षा मंत्रालय ने संसद में बहुत संक्षिप्त बयान के साथ पश्चिम बंगाल के जुनपुट में DRDO की एक नई टेस्ट फैसिलिटी का प्रस्ताव रखा था। उस समय किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था कि दीघा और कांथी के करीब फैला यह दलदली और रेतीला इलाका इतनी तेजी से कंक्रीट और फौलाद के अभेद्य किले में बदल जाएगा।
शुरुआत में कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन की पर्यावरण मंजूरियों और स्थानीय प्रशासनिक पेचों के कारण प्रोजेक्ट की रफ्तार थोड़ी धीमी रही। लेकिन 2026 के मध्य तक आते-आते सभी कानूनी अड़चनों को युद्धस्तर पर सुलझा लिया गया। सितंबर 2026 तक जुनपुट में भारी मोबाइल लॉन्चरों का वजन उठाने वाले कंक्रीट हार्ड-स्टैंडिंग प्लेटफॉर्म्स, आधुनिक कमांड पोस्ट और हाई-स्पीड डेटा लिंक पूरी तरह से बनकर तैयार हो गए।
अब सवाल उठता है कि जब ओडिशा के चांदीपुर में इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज मौजूद था, और पास ही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप भी एक्टिव था, तो फिर बंगाल में तीसरे बेस की क्या जरूरत आन पड़ी?
पहला और सबसे व्यावहारिक कारण है चांदीपुर पर बढ़ता भारी दबाव। पिछले कुछ सालों में भारत का मिसाइल शस्त्रागार बहुत तेजी से फैला है। आज भारत सिर्फ लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें नहीं बना रहा है। आज सेना को ‘प्रलय’ जैसी टैक्टिकल मिसाइलें चाहिए। नौसेना को VL-SRSAM जैसी क्विक रिएक्शन मिसाइलें चाहिए। थल सेना को QRSAM और MR-SAM के लगातार ट्रायल्स करने पड़ते हैं। ब्रह्मोस के नए एक्सटेंडेड रेंज वेरिएंट्स की टेस्टिंग लाइन में लगी है। अकेले चांदीपुर और व्हीलर आइलैंड से हर महीने इतने टेस्ट संभालना लगभग नामुमकिन हो रहा था। कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स को अपनी टेस्टिंग विंडो के लिए हफ्तों तक इंतजार करना पड़ता था। जुनपुट के एक्टिव होते ही DRDO को वह ऑपरेशनल आजादी मिल गई है, जिससे मिसाइल ट्रायल्स की रफ्तार अब दोगुनी हो जाएगी।
डिफेंस का नया ट्रैकिंग ट्रायंगल
लेकिन यह तो सिर्फ सिक्के का एक पहलू है। असली गेम चेंजर है वह 150 किलोमीटर लंबा दायरा, जिसे रक्षा विशेषज्ञ स्ट्रैटेजिक-ट्रायंगल कह रहे हैं।
सैन्य विज्ञान में किसी मिसाइल को खुले समंदर में दाग देना बहुत आसान काम है। असली चुनौती होती है मिसाइल बनाम मिसाइल का मुकाबला कराना। इसे रक्षा वैज्ञानिक ‘एंगेजमेंट एनवेलप’ कहते हैं। जब आप बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस यानी BMD का टेस्ट करते हैं, तो आपको एक टारगेट मिसाइल दागनी होती है और दूसरी इंटरसेप्टर मिसाइल से उसे हवा या अंतरिक्ष में बेअसर करना होता है।
अब तक भारत क्या कर रहा था? व्हीलर आइलैंड से टारगेट मिसाइल दागी जाती थी, और चांदीपुर से उसे रोकने वाला इंटरसेप्टर उड़ता था। लेकिन इन दोनों जगहों के बीच की हवाई दूरी केवल 70 से 74 किलोमीटर है। आधुनिक हाइपरसोनिक हथियारों और 5000 किलोमीटर रेंज वाली तेज रफ्तार बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए 74 किलोमीटर का दायरा बहुत छोटा पड़ता है। मिसाइल के रडार को टारगेट लॉक करने और फैसला लेने के लिए पर्याप्त स्लैंट रेंज और रिएक्शन टाइम नहीं मिल पाता था।
यहीं पर जुनपुट भारत के लिए सबसे बड़ा वरदान साबित हुआ है। जुनपुट चांदीपुर से लगभग 74 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। व्हीलर द्वीप से इसकी दूरी करीब 120 से 150 किलोमीटर बैठती है। अब जरा इस डिफेंस गणित को समझिए। जब अब्दुल कलाम द्वीप से कोई डमी बैलिस्टिक मिसाइल अंतरिक्ष की तरफ उड़ेगी, तो उसे हवा में ही नाकाम करने वाला फेज-2 इंटरसेप्टर जुनपुट से लॉन्च किया जा सकेगा। इससे डिफेंस सिस्टम को असली युद्ध जैसी दूरी मिलती है। इंटरसेप्टर के रडार को दूर से आ रहे खतरे को ट्रैक करने का पूरा मौका मिलता है। यह वही रियल-टाइम कॉम्बैट सिमुलेशन है, जिसके लिए अमेरिकी सेना को प्रशांत महासागर के दूरदराज द्वीपों पर जाना पड़ता है।
इसके साथ ही जुनपुट ने भारत की ट्रैकिंग ज्यामिति को पूरी तरह बदल दिया है। किसी भी मिसाइल टेस्ट के दौरान सबसे कीमती चीज होती है उसका टेलीमेट्री डेटा। मिसाइल का इंजन कितनी गर्मी पैदा कर रहा है, उसकी रफ्तार किस सेकंड कितनी बढ़ी, और उसकी ट्रेजेक्ट्री में क्या बदलाव आया, यह सब रिकॉर्ड करना होता है। पहले चांदीपुर से दागी गई मिसाइल को ज्यादातर पीछे से या सीधे सामने से ट्रैक किया जाता था। लेकिन अब जुनपुट में अत्याधुनिक इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम, डॉपलर रडार और मल्टी-स्टैटिक टेलीमेट्री एंटेना लगाए गए हैं। जब कोई मिसाइल चांदीपुर से उड़ान भरेगी, तो जुनपुट का रडार उसे ठीक साइड से यानी 90 डिग्री के क्रॉस-एंगल से ट्रैक करेगा। साइड एंगल से मिलने वाला डेटा मिलीमीटर स्तर पर सटीक होता है। मिसाइल वैज्ञानिक अच्छी तरह जानते हैं कि क्रॉस-एंगल ट्रैकिंग के बिना आधुनिक हथियारों का सटीक डेटा जुटाना लगभग असंभव होता है। जुनपुट ने भारत को वही अचूक क्षमता दे दी है।
चीनी जासूसी जहाजों का खेल खत्म
अब पर्दे के पीछे के उस खतरनाक खेल पर नजर डालिए, जो हिंद महासागर की गहराइयों में खेला जा रहा है। जब भी भारत बंगाल की खाड़ी के ऊपर NOTAM जारी करता है, चीनी नौसेना की हलचल अचानक तेज हो जाती है। चीनी सेना का स्ट्रेटेजिक सपोर्ट फोर्स तुरंत अपने जासूसी जहाजों को एक्टिव कर देता है। युआन वांग सीरीज के स्पेस और मिसाइल ट्रैकिंग जहाज, या शियांग यांग होंग जैसे रिसर्च वेसल्स चुपचाप अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भारत के करीब पहुंचने की कोशिश करते हैं।
इन जहाजों पर लगे विशालकाय पैराबोलिक डिश एंटेना समंदर में सिर्फ तैरने के लिए नहीं हैं। उनका एकमात्र मकसद होता है भारतीय मिसाइल के तीन सबसे बड़े राज चुराना। पहला, मिसाइल का रडार क्रॉस सेक्शन, जिससे पता चले कि वह रडार पर कितनी बड़ी दिखती है। दूसरा, उसका टेलीमेट्री सिग्नल, जिससे मिसाइल की आंतरिक बनावट का पता चलता है। और तीसरा, टर्मिनल गाइडेंस फ्रीक्वेंसी, जिससे यह पता लगाया जा सके कि मिसाइल अपने टारगेट को अंतिम पलों में कैसे खोजती है।
अब तक चीनी जासूसी जहाज मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने या अंडमान सागर के पास खड़े होकर ओडिशा के दोनों ठिकानों से उठने वाली मिसाइलों के कोण को पहले से भांप लेते थे। लेकिन जुनपुट के एक्टिव होते ही बीजिंग के जासूसी जहाजों का पूरा गणित बिगड़ चुका है। अब उनके लिए यह अंदाजा लगाना नामुमकिन हो गया है कि लॉन्च अब्दुल कलाम द्वीप से होगा, चांदीपुर से होगा, या फिर बंगाल के जुनपुट से।
जुनपुट का तटीय भूगोल बेहद पेचीदा है। यह इलाका घने मैंग्रोव, नमकीन दलदल और कटी-फटी तटीय रेखा से घिरा है। इस जटिल भूगोल के कारण तटीय रडारों के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स को गहरे समंदर में खड़े चीनी जहाज आसानी से डिकोड नहीं कर सकते। इसके अलावा, भारतीय वैज्ञानिकों ने इस नई रेंज के लिए साइलेंट टेलीमेट्री और जमीन के अंदर दबी सुरक्षित ऑप्टिकल फाइबर बैकबोन का जाल बिछाया है। यानी हवा में रेडियो तरंगों के जरिए डेटा लीक होने का खतरा अब लगभग शून्य हो चुका है। चीनी जासूसी नेटवर्क के लिए जुनपुट एक ऐसा अंधा मोड़ बन गया है, जहां उनकी लाखों डॉलर की इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस टेक्नोलॉजी पूरी तरह कबाड़ साबित हो रही है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर का नया सुरक्षा कवच
लेकिन यह कहानी सिर्फ चीन के जासूसी जहाजों तक सीमित नहीं है। इसका एक बहुत गंभीर सिरा हमारे पूर्वी पड़ोस यानी बांग्लादेश से भी जुड़ता है। हाल के महीनों में ढाका के रणनीतिक गलियारों में जो बदलाव देखे गए हैं, वे नई दिल्ली के लिए नजरअंदाज करने लायक बिल्कुल नहीं हैं। कॉक्स बाजार के पेकुआ में चीनी मदद से तैयार किया गया सबमरीन बेस पहले से ही भारत की सुरक्षा चिंताओं में शामिल रहा है।
लेकिन बात सिर्फ पनडुब्बियों तक रहती तो अलग थी। हालिया सुरक्षा रिपोर्टों से यह संकेत मिलते हैं कि ढाका में तुर्किये और चीनी कंपनियों के साथ मिलकर एडवांस ड्रोन और UAV असेंबली यूनिट्स लगाने की बातचीत चल रही है। तुर्किये के पास बायरक्तार जैसे ड्रोन्स का ढांचा है। चीन के पास सस्ते इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और सेंसर्स का अंबार है। अगर यह दोनों तकनीकें बांग्लादेश की जमीन पर एक साथ जुड़ती हैं, तो यह सीधे-सीधे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल के लिए एक नई टोही चुनौती बन सकती हैं।
यहीं पर भारत की सबसे संवेदनशील नस का जिक्र आता है, जिसे हम सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकन नेक कहते हैं। यह संकरा गलियारा बमुश्किल 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा है, जो पूरे पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। तनाव की स्थिति में किसी भी विरोधी की पहली नजर हमेशा इसी चिकन नेक को ब्लॉक करने पर होती है।
अब नक्शे को ध्यान से देखिए। जुनपुट सिलीगुड़ी कॉरिडोर से दक्षिण बंगाल की सुरक्षित गहराई में स्थित है। लेकिन जुनपुट पर तैनात होने वाले रडार और एयर डिफेंस मिसाइलें पूरे उत्तरी बंगाल की खाड़ी, सुंदरबन के डेल्टा और बांग्लादेश के पूरे तटीय एयरस्पेस पर 24 घंटे नजर रख सकती हैं। अगर कोई भी संदिग्ध ड्रोन या स्टील्थ प्लेटफॉर्म पूर्वोत्तर या चिकन नेक की तरफ बढ़ने की हिमाकत करता है, तो जुनपुट का एयर डिफेंस ग्रिड उसे सैकड़ों किलोमीटर पहले ही अपने निशाने पर ले लेगा। यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर के लिए एक ऐसा अदृश्य सुरक्षा कवच है, जिसे जमीन से नहीं बल्कि बंगाल के समंदर से संचालित किया जा रहा है।
आखिर टेस्ट क्या होने वाला है?
अब उस तकनीकी सवाल पर आते हैं जो हर रक्षा प्रेमी के दिमाग में गूंज रहा है। 6 से 9 अक्टूबर 2026 की इस पहली टेस्टिंग विंडो में आखिर कौन सा हथियार टेस्ट होने जा रहा है?
चूंकि जुनपुट एक बिल्कुल नई रेंज है, इसलिए पहली ही उड़ान में कोई विशालकाय ICBM नहीं दागी जाएगी। रक्षा हलकों में इस समय तीन मुख्य प्रणालियों की सबसे ज्यादा चर्चा है। पहला सबसे मजबूत दावा है भारत का फेज-2 BMD इंटरसेप्टर, जिसे AD-1 या AD-2 कहा जाता है। जुनपुट का 150 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर इसी तरह के हाई-स्पीड इंटरसेप्टर ट्रायल्स के लिए सबसे मुफीद जगह है।
दूसरा संभावित विकल्प है प्रोजेक्ट कुशा। यह भारत की स्वदेशी लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल प्रणाली है, जिसे दुनिया भारत का अपना S-400 कह रही है। DRDO इस प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है ताकि 150 से 350 किलोमीटर के दायरे में दुश्मन के स्टील्थ फाइटर्स और क्रूज मिसाइलों को टारगेट किया जा सके।
तीसरा विकल्प है तटीय सुरक्षा का ब्रह्मास्त्र। यानी प्रलय अर्ध-बैलिस्टिक मिसाइल या फिर ब्रह्मोस-ER का नया कोस्टल डिफेंस बैटरी सिस्टम। 450 से 500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस की तटीय बैटरी अगर जुनपुट में तैनात होती है, तो बंगाल की खाड़ी में किसी भी विदेशी युद्धपोत का प्रवेश सीधे अपने रिस्क पर होगा।
भारत ने सॉलिड प्रोपल्शन यानी ठोस ईंधन तकनीक में पूरी महारत हासिल कर ली है। हमारी मिसाइलें सीलबंद कैनिस्टर्स में रखी जाती हैं, जिन्हें सड़क या ट्रेन नेटवर्क के जरिए देश के किसी भी कोने में ले जाकर मिनटों में दागा जा सकता है। इसके साथ ही ब्रह्मोस की सुपरसोनिक रफ्तार और अग्नि-5 के मिशन दिव्यास्त्र के साथ MIRV तकनीक भारत को दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की कतार में खड़ा करती है। हालांकि क्रूज मिसाइलों के स्वदेशी इंजन और हाई-एंड सेमीकंडक्टर सीकर्स को लेकर कुछ तकनीकी चुनौतियां बाकी हैं, जिन पर DRDO दिन-रात काम कर रहा है।





