चीन के खिलाफ भारत का अब तक का सबसे बड़ा एक्शन, लद्दाख की 28 जगहों पर ड्रैगन चित!

चीन के खिलाफ भारत का अब तक का सबसे बड़ा एक्शन, लद्दाख की 28 जगहों पर ड्रैगन चित!

आखिर भारत ने अचानक ऐसा कौन सा फैसला ले लिया, जिससे चीन के विदेश मंत्रालय में इमरजेंसी मीटिंग बुलानी पड़ गई? लद्दाख से सटी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर 21वीं सदी का सबसे बड़ा गेम पलट चुका है। भारत ने अपने उस मास्टरस्ट्रोक से पर्दा उठा दिया है, जिसने बीजिंग के होश उड़ा दिए हैं। चीन जिस अक्साई चिन को अपना बताता था, उसी इलाके के भीतर चीनी सेना की सबसे बड़ी लाइफलाइन G219 हाईवे के अंत की पटकथा पर भारत ने मुहर लगा दी है। बात सिर्फ नक्शों की नहीं है, बल्कि उस 150 किलोमीटर लंबे सीक्रेट और अभेद्य हाईवे की है, जिसे भारतीय सेना ने रातों-रात अपनी मंजूरी दे दी है। चीन को लगता था कि भारत सिर्फ डिफेंसिव खेलता है, लेकिन नई दिल्ली ने ऐसा आक्रामक फ्रंट खोला है, जिसकी गूंज अरुणाचल से लेकर समंदर के मलक्का स्ट्रेट तक साफ सुनाई दे रही है।

दशकों तक बॉर्डर पर सिर्फ स्टेटस-को यानी यथास्थिति बनाए रखने वाला भारत अब पूरी तरह बदल चुका है। अब पॉलिसी डिफेंसिव नहीं, बल्कि अग्रेसिव डिटरेंस की है। चीन दुनिया भर में अपनी सलामी स्लाइसिंग और साइकोलॉजिकल वॉरफेयर के जरिए खतरनाक प्रोपेगैंडा फैला रहा था। चीन की स्ट्रेटजी बहुत साफ थी। वो लीगल वॉरफेयर, पब्लिक ओपिनियन और साइकोलॉजिकल प्रेशर के जरिए दूसरे देशों की जमीन को अपना बताता था। 2017 से लेकर 2024 तक चीन ने कई बार अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों के मंदारिन नाम जारी किए और उसे जंगनान साबित करने की घटिया कोशिश की। चीन चाहता था कि इंटरनेशनल ग्लोबल डेटाबेस और ओपन सोर्स इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय इलाकों को चीनी पहचान मिल जाए। ठीक वैसे ही जैसे उसने तिब्बत का नाम बदलकर शिजांग कर दिया। लेकिन चीन भूल गया था कि अब उसका सामना नए भारत से है।

भारत ने चीन के इस टोपोनोमिक वॉरफेयर यानी स्थान-नाम युद्ध का ऐसा जवाब दिया है, जो सीधा ड्रैगन के सीने पर लगा है। अगस्त में अरुणाचल के 27 प्रमुख जियोग्राफिकल लोकेशंस को आधिकारिक नाम देने के बाद, भारत ने लद्दाख का मोर्चा खोल दिया। भारत सरकार ने लद्दाख प्रशासन और सर्वे ऑफ इंडिया के साथ मिलकर पूर्वी लद्दाख के 28 बेहद सेंसिटिव स्थानों, चोटियों, दर्रों और नदियों का ऑफिशियल भारतीय मैप जारी कर दिया है। यह चीन की कार्टोग्राफिक अग्रेसन पर भारत की एक डायरेक्ट और पावरफुल सर्जिकल स्ट्राइक है।

ये 28 नाम कोई मामूली नाम नहीं हैं। इस लिस्ट में गोगरा और हॉट स्प्रिंग शामिल हैं, जो 2020 के मिलिट्री स्टैंडऑफ का सबसे बड़ा सेंटर रहे हैं। अब इन्हें इंटरनेशनल मैप्स पर भारतीय पहचान के साथ दर्ज कर दिया गया है। इसी में एक नाम शामल लुंगपा का है। यह वो ऐतिहासिक और मुश्किल रास्ता है, जहां भारतीय सेना और सीआरपीएफ के जवान 1950 के दशक से पेट्रोलिंग करते आ रहे हैं। इस रास्ते को मैप पर आधिकारिक तौर पर दर्ज करके भारत ने चीन के उस सफेद झूठ को हमेशा के लिए दफना दिया है, जिसमें वो इस इलाके पर अपना दावा ठोकता था।

इसके बाद नाम आता है जोरावर चोटी का। 19वीं सदी के महान डोगरा जनरल जोरावर सिंह के नाम पर यह चोटी रखी गई है। यह चोटी उस ऐतिहासिक विजय अभियान की याद दिलाती है, जब भारतीय सेनाओं ने तिब्बत की सीमाओं के भीतर तक अपनी सैन्य ताकत का परचम लहराया था। यह बीजिंग के लिए सीधा मैसेज है कि इस जमीन पर भारत की जड़ें कितनी गहरी हैं। कनिष्क चोटी और मार्तंड गिरी जैसे नाम लद्दाख को कश्मीर के प्राचीन कुषाण साम्राज्य और मार्तंड सूर्य मंदिर के इतिहास से जोड़ते हैं। पारपिक ग्लेशियर और स्कमरी ग्लेशियर काराकोरम रेंज के वो विशाल ग्लेशियर हैं, जहां से शक्सगाम घाटी और सियाचिन के सामरिक गलियारे पर पैनी नजर रखी जाती है।

लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत को भी मैप पर अमर कर दिया गया है। रिनचेन जांगपो, शाक्यश्री गिरी, गुरु रिनपोचे और शिव री जैसे नामों को ऑफिशियल दर्जा दिया गया है। भारत ने दुनिया को साफ बता दिया है कि लद्दाख की आत्मा को बीजिंग का नास्तिक कम्युनिस्ट प्रोपेगैंडा कभी नहीं मिटा सकता।

अब सवाल यह उठता है कि गोगरा और हॉट स्प्रिंग के नाम से ही बीजिंग में खलबली क्यों मच जाती है? गोगरा यानी पेट्रोलिंग पॉइंट 15 और हॉट स्प्रिंग यानी पीपी 17 चांग चेन्मो घाटी में स्थित हैं। यह इलाका अक्साई चिन के पठार और भारतीय लद्दाख के बीच एक नेचुरल दीवार का काम करता है। हॉट स्प्रिंग के पास कोंगका दर्रा वह ऐतिहासिक जमीन है, जहां 1959 में चीनी सैनिकों ने सीआरपीएफ के गश्ती दल पर धोखे से हमला किया था। हमारे वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। सामरिक दृष्टि से गोगरा और हॉट स्प्रिंग सीधे उस रास्ते पर हैं जो कोंगका ला के जरिए अक्साई चिन की गहराइयों तक जाता है। यदि भारतीय सेना इन ऊंचाइयों पर मजबूत रहती है, तो वह चीन के सबसे सेंसिटिव हाईवे G219 पर सीधे नजर रख सकती है। तिब्बत-शिनजियांग नेशनल हाईवे G219 वही लाइफलाइन है जो चीन के दो सबसे अशांत प्रांतों को आपस में जोड़ती है। बीजिंग को हमेशा यह डर सताता है कि किसी भी बड़े टकराव की स्थिति में भारतीय सेना गोगरा और हॉट स्प्रिंग से आगे बढ़कर G219 हाईवे को काट देगी। अगर यह हाईवे कट गया, तो तिब्बत और शिनजियांग के बीच चीनी सेना का संपर्क पूरी तरह टूट जाएगा।

लेकिन असली भूचाल तो लद्दाख के सब-सेक्टर नॉर्थ में आया है। भारतीय रक्षा मंत्रालय और बीआरओ ने पूर्वी लद्दाख में श्योक नदी के पूर्वी तट के पैरेलल 150 किलोमीटर लंबे बिल्कुल नए ऑल-वेदर रोड कॉरिडोर की डीपीआर तैयार कर ली है। यह नई सड़क असली गेम चेंजर है। इसे समझने के लिए दौलत बेग ओल्डी यानी डीबीओ के महत्व को समझना होगा। 16,614 फीट की ऊंचाई पर स्थित डीबीओ दुनिया की सबसे ऊंची एडवांस लैंडिंग ग्राउंड है। यह रणनीतिक काराकोरम दर्रे से महज 8 किलोमीटर दूर है। डीबीओ पर मजबूत कंट्रोल रखकर भारत चीन और पाकिस्तान के उस खतरनाक गठजोड़ की गर्दन दबाए रखता है, जो सियाचिन को घेरने की फिराक में रहता है।

वर्तमान में लेह से डीबीओ तक पहुंचने का मुख्य मार्ग 255 किलोमीटर लंबी दरबुक-श्योक-डीबीओ सड़क है। बीआरओ ने इसे दो दशक की कड़ी मेहनत से बनाया था। लेकिन इस सड़क की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह कई जगहों पर एलएसी के बेहद करीब से गुजरती है। देपसांग के मुहाने पर चीनी तोपखाने डीएस-डीबीओ सड़क के कुछ हिस्सों को सीधी नजर में रखते हैं। युद्ध के समय अगर चीन अपने रॉकेट या तोपों से इस सड़क के किसी एक बड़े पुल को भी नुकसान पहुंचाता, तो डीबीओ में तैनात भारतीय जवानों की रसद और गोला-बारूद की सप्लाई रुक सकती थी।

इसी कमजोरी को जड़ से खत्म करने के लिए 150 किलोमीटर लंबा नया श्योक कॉरिडोर बनाया जा रहा है। इसे नेशनल हाईवे डबल लेन मानकों पर तैयार किया जाएगा। यह नया मार्ग प्राकृतिक पहाड़ों की आड़ में बन रहा है और चीनी रडार और सीधी तोपों की पहुंच से पूरी तरह बाहर रहेगा। श्योक नदी के जमे हुए पानी और माइनस 40 डिग्री तापमान में इसे बनाना इंजीनियरिंग का चमत्कार है। भारत ससोमा से सासेर ला होते हुए गापशान और फिर डीबीओ तक एक तीसरा सुरक्षित मार्ग भी तेजी से बना रहा है। इसका मतलब है कि भारत के पास डीबीओ तक पहुंचने के लिए तीन समानांतर आजाद रास्ते होंगे। चीनी सेना के लिए इन तीनों रास्तों को एक साथ रोकना नामुमकिन होगा।

अब जरा देपसांग के मैदानों पर नजर डालिए। 16,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित देपसांग 900 वर्ग किलोमीटर का एक सपाट पठार है। पहाड़ों के बीच यह अकेला ऐसा इलाका है जहां भारी बख्तरबंद गाड़ियां और मेन बैटल टैंक पूरी रफ्तार से दौड़ सकते हैं। 2020 के बाद भारत ने अपनी मथुरा स्थित वन स्ट्राइक कोर को पाकिस्तान के रेगिस्तान से हटाकर सीधे लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों में तैनात कर दिया। जो स्ट्राइक कोर कभी लाहौर और कराची की दिशा में आक्रामक प्रहार के लिए बनी थी, वह अब माइनस 30 डिग्री में चीन की सीमा पर तैनात है। देपसांग और चुमार में भारतीय सेना ने टी-90 भीष्म टैंकों की पूरी रेजिमेंट उतार दी है। लेकिन जब चीन ने 16,000 फीट पर अपने टाइप-15 हल्के टैंक उतारे, तो भारत ने इसका ऐसा जवाब तैयार किया जिसकी बीजिंग ने कभी उम्मीद नहीं की थी। डीआरडीओ और एलएंडटी ने रिकॉर्ड समय में 25 टन का स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक तैयार कर दिया। इसे भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमानों से लद्दाख के किसी भी फॉरवर्ड बेस पर कुछ ही घंटों में उतारा जा सकता है। पहाड़ों में तेजी से जगह बदलकर दुश्मन को नेस्तनाबूद करने में यह टैंक बेजोड़ है।

फायरपावर के मोर्चे पर भारत ने के-9 वज्र सेल्फ-प्रोपेलड हॉवित्जर को लद्दाख में तैनात किया है। यह तोप शून्य से 40 डिग्री नीचे भी बिना रुके गोले दागती है। अमेरिका से मिली एम-777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर का वजन सिर्फ 4 टन है। इसे चिनूक हेलिकॉप्टर से लटकाकर उन दुर्गम चोटियों पर मिनटों में पहुंचाया जा सकता है, जहां कोई सड़क नहीं जाती। हवा में भारत की सुरक्षा दीवार पूरी तरह अभेद्य है। एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल सिस्टम की 400 किलोमीटर की रेंज के चलते चीनी लड़ाकू विमान तिब्बत के एयरबेस से उड़ान भरते ही भारतीय रडार पर आ जाते हैं। आसमान में अपाचे और स्वदेशी प्रचंड हेलिकॉप्टर गश्त कर रहे हैं। प्रचंड ने तो 16,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर उड़ान भरकर दुनिया को अपनी ताकत का लोहा मनवा दिया है। निगरानी के लिए इजरायली हेरोन और एमक्यू-9बी प्रीडेटर ड्रोन 35,000 फीट की ऊंचाई से चीनी सेना के हर मूवमेंट का हाई-डेफिनिशन वीडियो सीधे कमांड सेंटर को भेज रहे हैं।

लेकिन भारत की असली चाल केवल हिमालय तक सीमित नहीं है। भारत ने चीन के खिलाफ एक ऐसा दोहरा संकट खड़ा कर दिया है, जिसे चीनी रणनीतिकार अपनी सबसे कमजोर नस मानते हैं। इसे कहते हैं मलक्का डिलेमा। चीन अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते मंगाता है। अंडमान और निकोबार कमान सीधे मलक्का के मुहाने पर बैठी है। ग्रेट निकोबार में नए सैन्य अड्डे और हवाई पट्टियां तैयार हो रही हैं। भारतीय नौसेना के पी-8आई पोसिडॉन विमान और कलवरी क्लास की पनडुब्बियां वहां से गुजरने वाले हर चीनी जहाज पर पैनी नजर रखती हैं। अगर चीन लद्दाख में कोई हिमाकत करता है, तो भारतीय नौसेना मलक्का की इस संकरी नली को पूरी तरह चोक कर सकती है। यदि मलक्का बंद हुआ, तो चीन की फैक्टरियां और तेल रिफाइनरियां 15 दिन के भीतर ठप पड़ जाएंगी।

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