समंदर में ड्रैगन का शिकार!भारत-फ्रांस की सीक्रेट डील ने उड़ाई चीन की नींद!

समंदर में ड्रैगन का शिकार!भारत-फ्रांस की सीक्रेट डील ने उड़ाई चीन की नींद!

जिस वक्त पूरी दुनिया अमेरिका के टैरिफ वॉर और यूरोप से लेकर मिडिल ईस्ट की आग में बुरी तरह से झुलस रही है, ठीक उसी वक्त समंदर की काली गहराइयों में भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर चीन के खिलाफ एक ऐसा सीक्रेट चक्रव्यूह रच दिया है, जिसकी भनक खुद अमेरिका तक को नहीं लगी। जर्मन टेक्नोलॉजी आज दुनिया में नंबर वन है, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि जर्मनी के साथ चल रही 65,000 करोड़ रुपये की महा-डील के बीच, भारत को रातों-रात फ्रांस के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी? कलवरी पनडुब्बियों के बाद समंदर में अचानक ऐसा क्या बड़ा खतरा मंडराने लगा कि भारत ने बिना एक सिंगल सेकंड बर्बाद किए, फ्रांस के साथ एक और खतरनाक डील का खुफिया ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया? पेरिस के एक सीक्रेट मिलिट्री बेस पर भारतीय नौसेना के अधिकारियों को रातों-रात ऐसा कौन सा समुद्री हथियार दिखाया गया, जिसने समंदर में छुपी चीनी पनडुब्बियों के शिकार का पक्का इंतजाम कर दिया है?

एक तरफ वाशिंगटन में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति के आक्रामक टैरिफ वॉर और ट्रेड नीतियों ने ग्लोबल इकॉनमी को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। अमेरिका का पूरा फोकस इस वक्त अपने घरेलू ट्रेड और अपनी इकॉनमी को बचाने पर लगा हुआ है। दूसरी तरफ यूरोप और मिडिल ईस्ट भयंकर युद्ध की लपटों में घिरे हुए हैं। इजरायल, लेबनान, ईरान, हमास और उधर रूस-यूक्रेन के मोर्चे पर पश्चिमी देशों ने अपनी पूरी मिलिट्री, पैसा और डिप्लोमैटिक ताकत झोंक दी है। इन सबके बीच बीजिंग में बैठे चीनी रणनीतिकारों को लगा कि यही वो सबसे परफेक्ट मौका है जब वो बिना किसी अंतरराष्ट्रीय शोर-शराबे के इंडियन ओशियन रीजन यानी हिंद महासागर पर अपना पूरा सामरिक कब्जा जमा लें। चीन को यह मुगालता हो गया था कि भारत तो सिर्फ अपनी हिमालय की जमीनी सीमाओं यानी एलएसी पर ही उलझा हुआ है। चीनी सेना को लगा कि समंदर के रास्ते भारत को चारों तरफ से घेरने की उनकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति अब अपने अंतिम और सबसे खतरनाक चरण में पहुंच चुकी है।

समंदर में ड्रैगन की चाल और भारत का पलटवार

लेकिन ड्रैगन यह भूल गया कि आज का नया भारत पुरानी और रक्षात्मक सोच के सहारे नहीं चलता। जिबूती, पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा और म्यांमार के सिटवे बंदरगाहों पर चीनी नेवी ने अपने जासूसी जहाजों और खतरनाक न्यूक्लियर सबमरीन्स का जो जाल बिछाना शुरू किया था, उसकी एक-एक भनक भारतीय नौसेना को थी। चीन को शायद इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि जिस वक्त दुनिया की महाशक्तियां अपने ट्रेड वॉर और मिसाइल हमलों में आंखें मूंदे बैठी हैं, ठीक उसी वक्त समंदर की गहराइयों में भारतीय नौसेना एक अचूक साइलेंट वॉर की बिसात बिछा चुकी है। भारत को यह बहुत अच्छे से पता है कि उसके पास 80 के दशक की पुरानी पड़ चुकी जर्मन शिशुमार क्लास और रूसी किलो क्लास सिंधुघोष पनडुब्बियां हैं, जो अब धीरे-धीरे रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रही हैं। आज चीन और पाकिस्तान के बढ़ते नेवल फ्लीट के संयुक्त खतरे को देखते हुए, भारत को समंदर में दबदबा बनाने के लिए कम से कम 24 पारंपरिक पनडुब्बियों के एक बहुत ही विशाल और अत्याधुनिक बेड़े की तुरंत जरूरत है। आपको बता दें कि पाकिस्तान को भी चीन आठ युआन क्लास पनडुब्बियां देने का करार कर चुका है।

Project-75I: 65,000 करोड़ की महा-डील

असली खेल यहीं से शुरू होता है। इसी भारी कमी को तुरंत दूर करने के लिए भारत ने प्रोजेक्ट-75I नाम का एक बहुत ही महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू किया। यह करीब 65,000 करोड़ रुपये का एक ऐसा मेगा डिफेंस डील है जिसका सीधा मकसद भारत के ही अंदर छह नई जनरेशन की ऐसी पारंपरिक पनडुब्बियां बनाना है, जो दुनिया में सबसे घातक हों। इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी और अहम खासियत होगी एआईपी यानी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम। यह कोई साधारण तकनीक नहीं है। एआईपी एक ऐसी एडवांस तकनीक है जो किसी भी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी को हफ्तों तक पानी के भीतर लगातार छिपे रहने की ताकत देती है। बिना एआईपी वाली एक नॉर्मल पनडुब्बी को अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए हर दो से तीन दिन में समंदर की सतह पर आना ही पड़ता है। सतह पर आते ही दुश्मन के शक्तिशाली राडार और सैटेलाइट्स उसे तुरंत पकड़ सकते हैं। लेकिन एआईपी सिस्टम के साथ एक पनडुब्बी कई हफ्तों तक समंदर की काली गहराइयों में बिल्कुल शांत पड़ी रह सकती है, और दुश्मन को पता भी नहीं चलेगा कि काल उसके ठीक नीचे तैर रहा है।

इस 65,000 करोड़ रुपये के महा-प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार ने जर्मनी की विश्व-प्रसिद्ध कंपनी को चुना है। भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनी एमडीएल यानी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के साथ मिलकर जर्मन कंपनी भारत में इन छह पनडुब्बियों का निर्माण करेगी। अपनी खामोशी, घातक हथियारों और बेहद एडवांस सेंसर्स के लिए जर्मन इंजीनियरिंग का कोई सानी नहीं है। हाल ही में भारत में जर्मन राजदूत ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि जर्मनी की तरफ से सारी कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी है और अब बस भारत की आंतरिक प्रक्रियाओं के पूरा होने का इंतजार है।

जर्मन देरी और फ्रांस की सॉलिड एंट्री

लेकिन इंटरनेशनल कूटनीति और युद्ध के मैदान में सिर्फ तकनीक ही सब कुछ नहीं होती, उससे भी बड़ा एक हथियार होता है, और वो है टाइमिंग। जर्मन टेक्नोलॉजी शानदार है, लेकिन भारतीय नौसेना के टॉप कमांडरों और साउथ ब्लॉक के रक्षा विशेषज्ञों के माथे पर एक बहुत बड़ी चिंता की लकीर खिंची हुई है। इतनी जटिल और एडवांस जर्मन तकनीक का पूरी तरह से भारत में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी होना, फिर भारत में एक बिल्कुल नई असेंबली लाइन लगाना, उसके प्रोटोटाइप बनाना, उनके लंबे समुद्री परीक्षण करना और फिर जाकर उनका नौसेना के बेड़े में शामिल होना, यह एक बहुत ही लंबी और थकाऊ प्रक्रिया है। रक्षा जानकारों का स्पष्ट अनुमान है कि अगर इस जर्मन डील पर फाइनल मुहर लग भी जाती है, तब भी पहली जर्मन पनडुब्बी को बनकर तैयार होने और भारतीय नौसेना में कमीशन होने में कम से कम आठ से दस साल का एक लंबा समय लग जाएगा। जर्मनी की अप्रूवल प्रोसेस भी कई बार इस टाइमलाइन को और लंबा खींच देती है।

अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए। चीन हिंद महासागर में अपने जासूसी जहाजों से भारत को लगातार आंखें दिखा रहा है। भारत के पास दस साल का लंबा इंतजार करने का समय बिल्कुल भी नहीं है। चीन समंदर में अपनी चालें तेज कर चुका है। चीन के साथ बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत एक मिनट का भी रिस्क नहीं ले सकता।

इसीलिए भारत के रणनीतिकारों ने रातों-रात एक इमरजेंसी प्लान एक्टिवेट किया। यहीं से शानदार एंट्री होती है फ्रांस की। भारत ने तुरंत फ्रांस के नेवल ग्रुप को कॉल लगाया। भारत और फ्रांस के बीच रक्षा संबंध केवल हथियारों की खरीद-बिक्री वाले नहीं हैं, बल्कि यह एक बहुत ही गहरी और अटूट सामरिक साझेदारी है। फ्रांस ने हमेशा भारत के सबसे मुश्किल समय में बिना किसी शर्त के उसका साथ दिया है। भारत की कंपनी एमडीएल ने हाल ही में फ्रांस की तकनीक के जरिए प्रोजेक्ट-75 के तहत सभी छह कलवरी क्लास पनडुब्बियों का निर्माण भारत में बहुत ही सफलता के साथ पूरा किया है। आज भारत के पास फ्रांस की डिजाइन वाली पनडुब्बियों को बनाने की एक पूरी तरह से तैयार असेंबली लाइन है।

इसीलिए छह कलवरी क्लास पनडुब्बियों को समंदर में उतारने के बाद, भारत ने फ्रांस के साथ तीन अतिरिक्त और बेहद अत्याधुनिक एन्हांस्ड कलवरी क्लास पनडुब्बियों के लिए बातचीत का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया। करीब 36,000 करोड़ रुपये के इस नए सौदे को लेकर बातचीत बहुत ही सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।

समंदर में उतरेगा स्वदेशी ‘बम’

लेकिन यहां एक बहुत बड़ा ट्विस्ट है। यह नई तीन पनडुब्बियां कोई पुरानी पनडुब्बियां नहीं होने वाली हैं। यह एक बहुत बड़ा नेक्स्ट-जनरेशन अपग्रेड होगा। फ्रांस की इन तीन नई पनडुब्बियों में पुरानी लीड-एसिड बैटरी की जगह मॉडर्न लिथियम-आयन बैटरी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे पनडुब्बी की ताकत और अंडरवाटर एंड्योरेंस कई गुना बढ़ जाएगी। और सबसे बड़ा गेम चेंजर यह है कि इन पनडुब्बियों में सीधे तौर पर भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ द्वारा पूरी तरह से स्वदेश में विकसित फ्यूल-सेल बेस्ड एआईपी सिस्टम लगाया जाएगा। यह भारत का अपना स्वदेशी दिमाग होगा जो एक फ्रांसीसी मशीन के अंदर धड़केगा। इनके अकॉस्टिक सिग्नेचर समंदर के शोर में पूरी तरह छिप जाएंगे, जिसे पकड़ना दुश्मन के बस की बात नहीं होगी।

सीक्वेस्ट एस ड्रोन: समंदर का रोबोटिक निगेहबान

पनडुब्बियों की यह कहानी तो सिर्फ एक हिस्सा है, पर्दे के पीछे भारत और फ्रांस के बीच एक और बहुत ही खामोश लेकिन बेहद शानदार तकनीकी क्रांति जन्म ले रही है। पेरिस में स्थित एक मिलिट्री बेस पर भारतीय डिफेंस अताशे को फ्रांस की कंपनी ने रातों-रात एक ऐसा समुद्री ड्रोन दिखाया, जिसने समंदर में चीनी पनडुब्बियों का पक्का इलाज खोज लिया है। फ्रांस ने भारतीय अधिकारियों को अपने सीक्वेस्ट एस ड्रोन का एक एक्सक्लूसिव लाइव डेमोंस्ट्रेशन दिया।

आखिर यह सीक्वेस्ट एस क्या बला है? यह एक अत्याधुनिक अनमैन्ड सरफेस वेसल यानी ड्रोन जहाज है, जिसमें कोई भी इंसान या नौसैनिक नहीं बैठता। भारत का रक्षा मंत्रालय यह बहुत अच्छी तरह से समझता है कि हिंद महासागर का विस्तार इतना विशाल है कि सिर्फ हमारे युद्धपोतों से उसकी 24 घंटे लगातार निगरानी करना इंसान के बस की बात नहीं है। अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक हर चीनी गतिविधि पर पैनी नजर रखने के लिए भारत को समंदर में हजारों अदृश्य आंखों की जरूरत है।

फ्रांस का यह सीक्वेस्ट एस इसी कमी को पूरा करेगा। यह पूरी तरह से मॉड्यूलर है, यानी मिशन की जरूरत के हिसाब से आप इस ड्रोन जहाज में अलग-अलग सिस्टम फिट कर सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, पनडुब्बी रोधी युद्ध या फिर जासूसी और निगरानी के सेंसर्स, सब कुछ इसमें आसानी से लगाया जा सकता है। इसे भारतीय नौसेना के जहाजों के साथ बहुत ही आसानी से इंटीग्रेट किया जा सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से यह मानवरहित जहाज अपना काम खुद करता है।

जैसे ही कोई चीनी पनडुब्बी छिपते-छिपाते भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास घुसने की जुर्रत करेगी, ये मानवरहित ड्रोन्स मीलों दूर से ही उसकी हल्की सी आहट को भी पकड़ लेंगे। पलक झपकते ही भारतीय नेवी के विमानों और युद्धपोतों को डेटा भेजकर अलर्ट कर दिया जाएगा।

Project-76: आत्मनिर्भर भारत का खूंखार अवतार

फ्रांस की रफ्तार और जर्मनी की एडवांस इंजीनियरिंग अपनी जगह बिल्कुल सही है, लेकिन भारत की सामरिक सोच का असली मास्टरस्ट्रोक कुछ और ही है। आत्मनिर्भर भारत का जो विजन रक्षा मंत्रालय ने देखा है, उसका असली रूप है प्रोजेक्ट-76। जर्मनी और फ्रांस की डील तो सिर्फ एक ट्रेलर है, भारत असल में 2028 के लिए एक ऐसा स्वदेशी ब्लूप्रिंट तैयार कर रहा है जो किसी भी दुश्मन को पूरी तरह से पस्त करने की ताकत रखता है।

प्रोजेक्ट-76 भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो, डीआरडीओ और भारत की इंजीनियरिंग दिग्गज कंपनी एलएंडटी का एक बहुत ही सीक्रेट और ताकतवर जॉइंट वेंचर है। यह भारत की पहली सौ प्रतिशत स्वदेशी डिजाइन वाली नेक्स्ट-जनरेशन पनडुब्बी होने वाली है। इस स्वदेशी पनडुब्बी का वजन करीब 3000 टन से ज्यादा होगा। यह कलवरी क्लास से आकार में बहुत बड़ी और क्षमता में कई गुना ज्यादा घातक होगी। इसमें 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह से मेड-इन-इंडिया होगा।

सबसे शानदार बात यह है कि इस 3000 टन के समुद्री महारथी में टॉरपीडो ट्यूब से लॉन्च होने वाली लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइलें तैनात की जाएंगी। इसका सीधा मतलब यह है कि समंदर में छिपकर यह पनडुब्बी सिर्फ दुश्मन के जहाजों को ही टारगेट नहीं करेगी, बल्कि दुश्मन के जमीनी ठिकानों, उनके नेवल बेस और मिलिट्री कमांड सेंटर्स को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर सकेगी। भारत की योजना कुल 12 ऐसी महा-पनडुब्बियां बनाने की है जो पूरे हिंद महासागर की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।

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