ग्लोबल क्राइसिस के बीच मोदी सरकार का कड़ा फैसला: देश का खजाना बचाने के लिए दिल्ली में धड़ाधड़ चल रही हैं सीक्रेट बैठकें!

ग्लोबल क्राइसिस के बीच मोदी सरकार का कड़ा फैसला: देश का खजाना बचाने के लिए दिल्ली में धड़ाधड़ चल रही हैं सीक्रेट बैठकें!

पूरी दुनिया इस वक्त एक भयंकर आर्थिक और जियोपॉलिटिकल तूफान से गुजर रही है। मिडिल ईस्ट में जो हालात बने हुए हैं, उसने दुनिया भर के शेयर बाजारों और बड़ी-बड़ी इकॉनमी की नींव हिला कर रख दी है। लेकिन जब दुनिया भर के देश महंगाई और मंदी के आगे घुटने टेक रहे हैं, तब नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसा चल रहा है जो भारत को इस ग्लोबल क्राइसिस से सुरक्षित निकालने की गारंटी बनेगा। वित्त मंत्रालय के अंदर लगातार, धड़ाधड़ हाई-लेवल बैठकें चल रही हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और देश के टॉप आर्थिक सलाहकार एक ऐसे मास्टरप्लान पर काम कर रहे हैं, जो सुनने में भले ही थोड़ा कड़वा लगे, लेकिन देश की आर्थिक सेहत के लिए यह एक संजीवनी बूटी का काम करेगा। सरकार देश के खजाने को बचाने के लिए खर्चों में एक बड़ी कटौती करने जा रही है। लेकिन यह कटौती कहां होगी, कैसे होगी और सबसे अहम बात, किन सेक्टरों को इस कटौती से बिल्कुल बाहर रखा गया है, यह जानना हर सच्चे हिंदुस्तानी के लिए बेहद जरूरी है।

सबसे पहले इस पूरी समस्या की जड़ को समझते हैं। आखिर दिल्ली में इतनी टेंशन क्यों है? इसका सीधा सा जवाब है ग्लोबल ऑयल प्राइसेस यानी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें। दुनिया जानती है कि भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से इम्पोर्ट करता है। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी हुई है। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो सिर्फ पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ते, बल्कि पूरी की पूरी सप्लाई चेन महंगी हो जाती है। इसका सबसे बड़ा और सीधा असर पड़ता है हमारे फर्टिलाइजर यानी खाद की सब्सिडी पर। भारत एक कृषि प्रधान देश है और सरकार अपने किसानों पर ग्लोबल महंगाई का बोझ नहीं डालना चाहती। इसलिए किसानों को सस्ती खाद देने के लिए सरकार अपनी जेब से सब्सिडी देती है।

अब जरा आंकड़ों का खेल समझिए। भारत ने इस वित्तीय वर्ष के लिए फर्टिलाइजर सब्सिडी के तौर पर 1.71 ट्रिलियन रुपये का बहुत बड़ा बजट रखा था। लेकिन ग्लोबल एनर्जी की कीमतें जिस तरह से आसमान छू रही हैं, आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह सब्सिडी बिल दोगुना हो सकता है। अब सवाल यह है कि सरकार यह अतिरिक्त पैसा लाएगी कहां से? अगर सरकार बिना सोचे-समझे पैसा खर्च करती रही, तो हमारा राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट आउट ऑफ कंट्रोल हो जाएगा। आसान भाषा में कहें तो जब सरकार की आमदनी अठन्नी हो और खर्चा रुपैया हो जाए, तो देश कर्ज के जाल में फंसने लगता है। अप्रैल के महीने में ही राजकोषीय घाटा पिछले साल की तुलना में लगभग दोगुना होकर 3.6 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया था। यह खतरे की घंटी थी और मोदी सरकार ने इसे बहुत गंभीरता से लिया है।

यहीं पर सामने आता है सरकार का वो कड़ा और साहसिक फैसला, जिसे लेने से अक्सर कमजोर सरकारें डरती हैं। सरकार ने तय किया है कि वो उधार लेकर घी पीने वाला काम नहीं करेगी। सरकार बाजार से और ज्यादा कर्ज नहीं लेगी, क्योंकि ज्यादा कर्ज लेने से बॉन्ड यील्ड बढ़ जाती है और देश की करेंसी पर दबाव पड़ता है। हमारी भारतीय करेंसी यानी रुपया पहले ही डॉलर के मुकाबले दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में सरकार ने तय किया है कि वो अपने ही खर्चों पर कैंची चलाएगी।

लेकिन, और यह बहुत बड़ा ‘लेकिन’ है, सरकार ने यह साफ कर दिया है कि खर्च में कटौती का यह मतलब कतई नहीं है कि देश की सुरक्षा और विकास से कोई समझौता किया जाएगा। बैठकों से जो सबसे शानदार बात निकलकर आई है, वह यह है कि डिफेंस बजट और कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी पूंजीगत व्यय में एक रुपये की भी कटौती नहीं की जाएगी। यह होती है एक राष्ट्रवादी सरकार की निशानी। चाहे दुनिया में कितनी भी बड़ी आर्थिक सुनामी क्यों न आ जाए, भारत अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण और हथियारों की खरीद पर कोई ब्रेक नहीं लगाएगा। बॉर्डर पर सड़कें बनेंगी, नए फाइटर जेट्स आएंगे और सेना को हर वो चीज मिलेगी जो उसे चाहिए। इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर, यानी देश में बन रहे हाईवेज, एक्सप्रेसवे, रेलवे और पोर्ट्स के बजट को भी नहीं छुआ जाएगा, क्योंकि यही वो इंजन है जो भारत की ग्रोथ को रफ्तार दे रहा है।

तो फिर कटौती होगी कहां? अधिकारियों ने उन सेक्टर्स की पहचान की है जहां फिलहाल खर्च को रोका या कम किया जा सकता है। इनमें मुख्य रूप से जल संसाधन मंत्रालय के कुछ प्रोजेक्ट्स और राज्य सरकारों को दिए जाने वाले विशेष कर्ज शामिल हैं। सरकार का साफ मानना है कि जो प्रोजेक्ट्स बहुत अर्जेंट नहीं हैं, उनकी फंडिंग को कुछ समय के लिए धीमा किया जा सकता है ताकि उस पैसे का इस्तेमाल देश की इकॉनमी को स्टेबल रखने में किया जा सके।

अब इस कड़े फैसले के राजनीतिक मायने भी समझ लीजिए। भारत में कोई भी कड़ा आर्थिक फैसला लेना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होता। जब राज्य सरकारों के फंड में या कर्ज में कटौती होगी, तो तय मानिए कि देश में एक बड़ा सियासी बवाल मचेगा। खासतौर पर दक्षिण भारत के कई विपक्षी शासित राज्य इसे एक बड़ा मुद्दा बनाएंगे। वो हमेशा से यह आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार टैक्स रेवेन्यू का बंटवारा उनके हिसाब से नहीं करती। फंड में कटौती होते ही विपक्ष का इकोसिस्टम एक्टिव हो जाएगा और सरकार पर राजनीतिक हमले शुरू हो जाएंगे। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों की कुछ कल्याणकारी योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है, जिससे सरकार को राजनीतिक नुकसान का डर हो सकता है।

लेकिन देश हित सर्वोपरि है। अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि अगर अभी खर्चों को कंट्रोल नहीं किया गया, तो मार्च 2027 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का जो लक्ष्य भारत ने दुनिया के सामने रखा है, वह टूट जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो यह महामारी के बाद पहला फिस्कल स्लिपेज होगा, जिससे ग्लोबल इन्वेस्टर्स के बीच भारत की मजबूत छवि पर असर पड़ सकता है। सरकार किसी भी कीमत पर यह नहीं होने देना चाहती। विदेशी पूंजी को देश से बाहर जाने से रोकने, रुपये को मजबूती देने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए सरकार को अपनी बैलेंस शीट एकदम क्लीन और मजबूत रखनी होगी।

भारतीय रिजर्व बैंक भी इस पूरे मिशन में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है। बाजार में लगातार बनी हुई अस्थिरता के बीच आरबीआई ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ऐतिहासिक स्तर पर मजबूत कर लिया है। लेकिन आरबीआई की तरफ से इस बार सरकार को जो डिविडेंड मिलने की उम्मीद थी, वह थोड़ी कम रही है, जिसके कारण सरकार का फिस्कल बफर सीमित हो गया है। इसीलिए अब गेंद पूरी तरह से वित्त मंत्रालय के पाले में है।

आने वाले कुछ महीनों में, खासकर साल की दूसरी छमाही में, हम देखेंगे कि सरकार इस प्लान को कैसे जमीन पर उतारती है। अगर ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो यह तय है कि कुछ मंत्रालयों को अपना बेल्ट टाइट करना पड़ेगा।

यह वक्त राजनीति करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रनीति का है। जब दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को डूबने से नहीं बचा पा रहे हैं, तब भारत की लीडरशिप ने यह दिखाया है कि मुश्किल वक्त में कड़े फैसले कैसे लिए जाते हैं। सब्सिडी का बढ़ता बोझ एक ऐसी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता, लेकिन डिफेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देकर सरकार ने यह संदेश दे दिया है कि भारत का उदय अब रुकने वाला नहीं है। यह खर्च में कटौती का महज एक आर्थिक प्लान नहीं है, बल्कि यह एक नए और मजबूत भारत का वो ब्लूप्रिंट है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहना जानता है।

देश का खजाना सुरक्षित रहेगा, तो देश सुरक्षित रहेगा। और जब देश सुरक्षित रहेगा, तो हमारी ग्रोथ स्टोरी को दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।

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