अमेरिका-रूस-चीन के ‘G-3’ सिंडिकेट पर भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक चक्रव्यूह!

अमेरिका-रूस-चीन के 'G-3' सिंडिकेट पर भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक चक्रव्यूह!

जिस वक्त पूरी दुनिया यह मानकर बैठी है कि दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) हो चुकी है, क्या ठीक उसी वक्त परदे के पीछे एक ऐसा खौफनाक सिंडिकेट तैयार हो चुका है जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को अपनी निजी जागीर में बदलने वाला है? नाटो की रहस्यमयी खामोशी के पीछे की असली वजह क्या है? 75 साल तक अमेरिका के साए में पलने वाला यूरोप आज अचानक अनाथ क्यों महसूस कर रहा है? और सबसे बड़ा सवाल, जिस BRICS को पश्चिमी डॉलर का काल और विकासशील देशों की सबसे बड़ी ढाल बताया जा रहा था, क्या उसी के दो सबसे बड़े महारथी गुपचुप तरीके से वाशिंगटन के साथ अपनी अलग सौदेबाजी पक्की कर चुके हैं? और जब अंदरखाने ये खतरनाक खेल हो रहा था, तब भारत ने समुंदर और जमीन पर ऐसा कौन सा मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिससे दुनिया का यह सबसे बड़ा पावर-कार्टेल हिल गया?

यह कोई कोरी कल्पना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गहरे और अंधेरे गलियारों से जो संकेत छनकर बाहर आ रहे हैं, वे सीधे 1945 के उस ‘याल्टा सम्मेलन’ की याद दिलाते हैं। उस दौर में चर्चिल, रूजवेल्ट और स्टालिन ने एक मेज पर बैठकर दुनिया के नक्शे पर पेंसिल से लकीरें खींची थीं और आधी दुनिया की तकदीर तय कर दी थी। आज इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने की कगार पर खड़ा है। इसे आप ‘याल्टा 2.0’ कह सकते हैं। वाशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग के बीच एक अघोषित और खतरनाक त्रिध्रुवीय गठजोड़ आकार ले रहा है, जिसे कूटनीतिक हलकों में G-3 कहा जा रहा है। अमेरिका की सीधी लेन-देन वाली रणनीति, रूस की यूरेशिया पर वर्चस्व की जिद और चीन की महाशक्ति बनने की भूख के बीच एक मौन सहमति बनती दिख रही है।

बीते दो दशकों तक दुनिया केवल G-2 यानी अमेरिका और चीन के गठजोड़ की बात करती रही। विश्लेषकों ने इसे ‘चिनमेरिका’ का नाम दिया था। लेकिन बीजिंग सिर्फ व्यापारिक साझेदार बनकर संतुष्ट नहीं था, उसने वाशिंगटन के वैश्विक आधिपत्य को सीधी चुनौती दे दी। अब अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान को यह साफ समझ आ चुका है कि अगर रूस पूरी तरह से चीन के पाले में चला गया, तो यूरेशिया का यह संयुक्त ब्लॉक पश्चिमी ताकत को पूरी तरह मिटा देगा। रूस के पास 5,580 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं, दुनिया की 20% प्राकृतिक गैस और 11% कच्चे तेल के भंडार हैं। दूसरी ओर चीन के पास 18 ट्रिलियन डॉलर की विशाल अर्थव्यवस्था और 230 अरब डॉलर का भारी भरकम रक्षा बजट है।

यहीं से एक नई रणनीति का जन्म हुआ है, जिसे ‘उलटा निक्सन सिद्धांत’ कहा जा रहा है। 1971 में निक्सन और किसिंजर ने सोवियत संघ को घेरने के लिए बीजिंग से हाथ मिलाया था। आज वाशिंगटन रूस को रियायतें देकर उसे चीन की आर्थिक पकड़ से बाहर खींचने और तीनों के बीच प्रभाव क्षेत्रों का एक नया बंटवारा करने की फिराक में है। बैकचैनल संपर्कों के जरिए जो शर्तें सामने आ रही हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाली हैं। यूरोप को दरकिनार कर यूक्रेन के हिस्से पर रूसी नियंत्रण को मौन स्वीकृति देना और रूस पर लगे ऊर्जा प्रतिबंधों को ढीला करना इस गुप्त सौदे का आधार बताया जा रहा है। इसके बदले चीन को यह भरोसा दिया जा रहा है कि अगर वह ताइवान पर सीधा हमला नहीं करता, तो दक्षिण चीन सागर में उसके प्रभाव को कोई सीधी चुनौती नहीं दी जाएगी।

इस गुप्त सौदेबाजी की सबसे भारी कीमत यूरोप चुका रहा है। जिस यूरोप ने आंख मूंदकर अमेरिका की हर नीति का समर्थन किया, आज वह खुद को पूरी तरह ठगा हुआ पा रहा है। अमेरिका, रूस और चीन की यह तिकड़ी जानती है कि कमजोर और बंटा हुआ यूरोप वैश्विक बिसात पर कोई मायने नहीं रखता।

लेकिन इस खेल में एक ऐसा छुपा हुआ पन्ना है, जिसकी चर्चा सार्वजनिक मंचों पर कभी नहीं होती। रूस और चीन के बीच जिस ‘नो-लिमिट्स पार्टनरशिप’ का ढोल पीटा जाता है, उसकी असलियत क्रेमलिन के खुफिया दस्तावेजों में कुछ और ही बयां करती है। रूस का सुदूर पूर्व साइबेरिया का 40 लाख वर्ग किलोमीटर का वह बर्फीला इलाका है, जहां तेल, गैस, सोना और अथाह लिथियम दबा हुआ है। इस इलाके में रूसी आबादी तेजी से घट रही है, जबकि सीमा पार चीन के बेहद घनी आबादी वाले प्रांत मौजूद हैं। रूस के रणनीतिकारों को यह खौफ सता रहा है कि अगर उन्होंने वाशिंगटन के साथ संतुलन नहीं बनाया, तो अगले 10 साल में बीजिंग बिना कोई सीधा टकराव किए रूस के इस विशाल भूभाग को आर्थिक और जनसांख्यिकीय तौर पर निगल जाएगा।

अब सवाल उठता है कि अगर रूस और चीन पर्दे के पीछे अपनी अलग गोटियां सेट कर रहे हैं, तो फिर BRICS का असली वजूद क्या रह जाता है? नई दिल्ली में जब BRICS के नेता एक मंच पर बैठते हैं, तो आंकड़े बेहद भारी-भरकम नजर आते हैं। दुनिया की 45% आबादी और वैश्विक तेल उत्पादन के 40% से ज्यादा हिस्से पर नियंत्रण। लेकिन इस चमकदार आवरण के नीचे विरोधाभासों का एक गहरा समंदर हिलोरें ले रहा है। पुतिन के लिए यह संगठन प्रतिबंधों से बचने की ढाल है, और चीन के लिए यह मंच अपनी मुद्रा युआन को थोपने और ग्लोबल साउथ पर चीनी नियंत्रण जमाने का जरिया है।

रूस और चीन लगातार दबाव बनाते हैं कि साझा घोषणापत्र में नाटो और पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ तीखी भाषा का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन भारत का रुख पूरी तरह से अडिग और स्पष्ट है। नई दिल्ली का सीधा और दो-टूक संदेश है कि BRICS एक गैर-पश्चिमी मंच जरूर है, लेकिन यह कभी भी पश्चिम-विरोधी मंच नहीं बन सकता। भारत किसी भी ऐसे दस्तावेज पर मुहर नहीं लगाता जो विकासशील देशों के मंच को चीन या रूस का निजी राजनीतिक हथियार बना दे। भारत इस मंच को टकराव की जगह समावेशी विकास, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, और आर्थिक सुरक्षा के एजेंडे पर मजबूती से खींचकर रखता है।

इसी तरह ‘साझा मुद्रा’ (Common Currency) के नाम पर फैलाए गए भ्रम को भी समझना जरूरी है। रूस और ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों से बाहर किए जाने के बाद R5 नाम की साझा मुद्रा के लिए बेताब हैं। लेकिन भारत ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। इसके पीछे ठोस आर्थिक और रणनीतिक तर्क हैं। 18 ट्रिलियन डॉलर की विशाल विनिर्माण अर्थव्यवस्था वाले चीन और 400 अरब डॉलर के दक्षिण अफ्रीका के बीच कोई समानता नहीं हो सकती। ऐसी किसी भी मुद्रा की चाबी सीधे पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के हाथ में चली जाएगी। भारत अपनी संप्रभुता को बीजिंग की मुद्रा के हवाले कभी नहीं कर सकता।

यही कारण है कि भारत डी-डॉलराइजेशन के हवाई नारों में फंसने के बजाय डी-रिस्किंग की व्यावहारिक नीति पर चल रहा है। भारत ने अपनी राष्ट्रीय मुद्रा में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा दिया है। UAE के साथ रुपया-दिरहम तंत्र, रूस के साथ विशेष वोस्ट्रो खाते, और दुनिया के 20 से ज्यादा देशों के साथ रुपये में व्यापार की शुरुआत इसी का हिस्सा है। भारत अपने UPI को वैश्विक स्तर पर जोड़कर बिना किसी तीसरे देश की मध्यस्थता के सीधा डिजिटल पेमेंट नेटवर्क खड़ा कर रहा है।

जब तीनों महाशक्तियां दुनिया को अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांटने का सपना देख रही थीं, तब भारत ने दुनिया की बिसात पर एक ऐसा रणनीतिक चक्रव्यूह रच दिया जिसने इस पूरे त्रिध्रुवीय कार्टेल को हिलाकर रख दिया। वाशिंगटन, बीजिंग और मॉस्को को लगा था कि वे भारत की कूटनीति को अपनी दिशा में मोड़ लेंगे। लेकिन साउथ ब्लॉक ने जो जवाबी रणनीति बनाई, उसने इन तीनों के समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

सबसे पहले बात समंदर की, जहां असली ताकत की परीक्षा होती है। चीन अपनी छाती कितनी भी पीट ले, उसकी सबसे कमजोर रग उसका समुद्री ऊर्जा मार्ग है। बीजिंग का 80% कच्चा तेल हिंद महासागर के मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। भारत ने अंडमान और निकोबार कमान (ANC) को एक अत्याधुनिक थिएटर कमांड और नौसैनिक किले में तब्दील कर दिया है। भारतीय नौसेना ने अंडमान की जलसीमा में वह अचूक घेराबंदी की है कि तनाव की स्थिति में चीन की ऊर्जा आपूर्ति की सांसें चंद घंटों में रोकी जा सकती हैं। चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ को काटने के लिए भारत ने ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति बिछा दी है। ओमान के दुकम पोर्ट से लेकर मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर आधुनिक हवाई पट्टी, मेडागास्कर में तटीय रडार स्टेशन, और इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह तक भारतीय नौसेना की पहुंच ने पूरे हिंद महासागर को भारत का अभेद्य दुर्ग बना दिया है।

अमेरिकी धमकियों को दरकिनार करते हुए भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के संचालन का ऐतिहासिक अनुबंध हासिल किया। यह पाकिस्तान को पूरी तरह बाईपास करते हुए भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और INSTC कॉरिडोर के जरिए सीधे यूरेशिया तक रणनीतिक पहुंच देता है।

इधर जब यूरोप खुद को अकेला पा रहा था, तब फ्रांस ने नई दिल्ली का रुख किया। पेरिस और नई दिल्ली के बीच रक्षा और परमाणु क्षेत्र में जो रणनीतिक धुरी बनी है, उसने G-3 की हेकड़ी निकाल दी है। राफेल लड़ाकू विमानों से लेकर स्कॉर्पीन पनडुब्बियों तक और अब 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर आधारित फाइटर जेट इंजन बनाने की तैयारी, भारत को पश्चिमी और रूसी हथियारों की ब्लैकमेलिंग से पूरी तरह आजाद करती है। फ्रांस और भारत मिलकर दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर में साझा गश्त कर रहे हैं, जो साबित करता है कि दुनिया में मध्य शक्तियों का एक ऐसा स्वायत्त गठबंधन तैयार हो चुका है जो न अमेरिका का आदेश मानेगा, न रूस के आगे झुकेगा और न ही चीन की दादागिरी सहेगा।

रणनीतिक स्वायत्तता केवल बातों से नहीं आती, उसके पीछे ठोस हार्ड पावर होती है। सेना की पारंपरिक तैनाती को पाकिस्तान के मोर्चे से हटाकर पूरी ताकत से चीन की उत्तरी सीमा की तरफ रीबैलेंस किया गया है। LAC पर 50,000 से ज्यादा अतिरिक्त सैनिक, T-90 भीष्म टैंक, K-9 वज्र स्वचालित तोपें और आकाश जैसी मिसाइल प्रणालियां तैनात हैं। BRO ने सेला और अटल टनल जैसी ऑल-वेदर सुरंगों का जो जाल बिछाया है, उसने किसी भी चीनी दुस्साहस का तुरंत जवाब देने की क्षमता तैयार कर दी है।

रक्षा निर्माण में भारत का कायाकल्प दुनिया देख रही है। 1.27 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का रक्षा उत्पादन अब भारत में हो रहा है। फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें सौंपकर भारत ने सीधे चीन के पिछवाड़े दक्षिण चीन सागर में अपनी ताकत दर्ज करा दी है। भारत अब केवल सुरक्षा मांगने वाला नहीं, बल्कि सुरक्षा देने वाला देश बन चुका है।

21वीं सदी की इस जंग में सबसे अहम हथियार डेटा और सेमीकंडक्टर चिप हैं। भारत ने 10 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टर मिशन के तहत गुजरात के धोलेरा और असम के मोरीगांव में आधुनिक फैब्रिकेशन प्लांट्स की मजबूत नींव रख दी है। चिप और आधुनिक हार्डवेयर के दम पर भारत ने सुनिश्चित कर दिया है कि भविष्य के हथियार किसी विदेशी ताकत के मोहताज नहीं रहेंगे।

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