याल्टा 2.0 का खतरनाक खेल: अमेरिका, रूस और चीन के गुप्त सिंडिकेट को भारत ने कैसे हिलाया?

याल्टा 2.0 का खतरनाक खेल: अमेरिका, रूस और चीन के गुप्त सिंडिकेट को भारत ने कैसे हिलाया?

जब पूरी दुनिया यह मानकर बैठी है कि ग्लोबल पॉलिटिक्स अब मल्टीपोलर हो चुकी है, तब क्या पर्दे के पीछे एक ऐसा खतरनाक सिंडिकेट तैयार हो रहा है जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को अपनी प्रायवेट प्रॉपर्टी में बदलने वाला है? नाटो की रहस्यमयी खामोशी के पीछे की असली वजह क्या है? पिछले 75 साल तक अमेरिका के अंब्रेला के नीचे पलने वाला यूरोप आज अचानक अनाथ क्यों फील कर रहा है? और सबसे बड़ा सवाल, जिस BRICS को वेस्टर्न डॉलर का सबसे बड़ा काल और डेवलपिंग कंट्रीज की सबसे बड़ी शील्ड बताया जा रहा था, क्या उसी के दो सबसे बड़े महारथी चुपचाप वाशिंगटन के साथ अपनी अलग डील पक्की कर चुके हैं? और जब अंदरखाने ये सारा खेल चल रहा था, तब नई दिल्ली ने जमीन और समंदर पर ऐसा कौन सा मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिससे दुनिया का यह सबसे बड़ा पावर-कार्टेल हिल गया है?

यह कोई फिक्शन नहीं है। इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के गलियारों से जो सिग्नल्स बाहर आ रहे हैं, वे सीधे 1945 के याल्टा कॉन्फ्रेंस की याद दिलाते हैं। उस दौर में चर्चिल, रूजवेल्ट और स्टालिन ने एक टेबल पर बैठकर मैप पर लाइनें खींची थीं और आधी दुनिया की तकदीर तय कर दी थी। आज हिस्ट्री खुद को रिपीट करने की कगार पर खड़ी है। इसे आप याल्टा 2.0 कह सकते हैं। वाशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग के बीच एक अनडिक्लेयर्ड और डेंजरस ट्राईपोलर अलायंस शेप ले रहा है, जिसे कूटनीतिक हलकों में G-3 कहा जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की स्ट्रेटजी, व्लादिमीर पुतिन की यूरेशिया पर डोमिनेंस की जिद और शी जिनपिंग की सुपरपॉवर बनने की हंगर के बीच एक साइलेंट सहमति बनती दिख रही है।

चिनमेरिका से लेकर G-3 तक का खतरनाक सफर

बीते दो दशकों तक दुनिया केवल G-2 यानी अमेरिका और चाइना के गठजोड़ की बात करती थी। एनालिस्ट्स ने इसे चिनमेरिका का नाम दिया था। लेकिन बीजिंग सिर्फ ट्रेड पार्टनर बनकर सेटिस्फाई नहीं था, उसने वाशिंगटन के ग्लोबल डोमिनेंस को डायरेक्ट चैलेंज दे दिया। ट्रंप ने ट्रेड वॉर छेड़कर उस भ्रम को तोड़ा जरूर, लेकिन उनकी बेसिक थिंकिंग मल्टीलेटरल अलायंसेज को ढोने की कभी नहीं रही। वे नाटो और यूएन जैसी संस्थाओं को अमेरिकन रिसोर्सेज पर एक बोझ मानते हैं। यूएस सिक्योरिटी एस्टेब्लिशमेंट को भी यह क्लीयरली समझ आ चुका ہے कि अगर रशिया पूरी तरह से चाइना के कैंप में चला गया, तो यूरेशिया का यह ज्वॉइंट ब्लॉक वेस्टर्न पावर को कंपलीटली वाइप आउट कर देगा। रशिया के पास 5,580 से ज्यादा न्यूक्लियर वेपन्स हैं, दुनिया की 20 परसेंट नेचुरल गैस और 11 परसेंट क्रूड ऑयल के रिजर्व्स हैं। दूसरी तरफ चाइना के पास 18 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी और 230 बिलियन डॉलर का डिफेंस बजट है।

यहीं से एक न्यू स्ट्रेटजी का जन्म हुआ, जिसे रिवर्स निक्सन थ्योरी कहा जा रहा है। 1971 में निक्सन और किसिंजर ने सोवियत यूनियन को घेरنے के लिए बीजिंग से हाथ मिलाया था। आज वाशिंगटन रशिया को कंसेशन देकर उसे चाइना की इकोनॉमिक स्लेवरी से बाहर निकालने और तीनों के बीच स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस का एक नया डिवीजन करने की फिराक में है। गल्फ कंट्रीज में रियाद और अबू धाबी के थ्रू जो बैकचैनल कॉन्टेक्ट्स साधे गए हैं, उनकी शर्तें शॉकिंग हैं। यूक्रेन के लगभग 20 परसेंट हिस्से पर रशियन ऑक्यूपेशन को साइलेंट अप्रूवल देना, यूक्रेन को कम से कम 20 से 25 साल तक नाटो से बाहर रखना, और रशिया पर लगे टफ एनर्जी सैंक्शंस को धीरे-धीरे रिमूव करना इस सीक्रेट डील का बेस बताया जा रहा है। इसके बदले चाइना को यह अश्योरेंस दिया जा रहा है कि अगर वह ताइवान पर डायरेक्ट अटैक नहीं करता, तो साउथ चाइना सी में उसके इन्फ्लुएंस को डायरेक्ट चैलेंज नहीं किया जाएगा।

इस सीक्रेट डेलिंग की सबसे हैवी कॉस्ट यूरोप पे कर रहा है। जिस यूरोप ने ब्लाइंडली अमेरिका की हर पॉलिसी को सपोर्ट किया, आज वह खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा है। यूरोप की इकॉनमी डिफेंस पर अपनी जीडीपी का मुमुश्किल 2 परसेंट स्पेंड कर पा रही है, जबकि उनके सामने रशिया की 6 परसेंट डिफेंस बजट वाली वॉर-टाइम इकॉनमी खड़ी है। ट्रंप, पुतिन और जिनपिंग की तिकड़ी जानती है कि वीक और डिवाइडेड यूरोप ग्लोबल चेसबोर्ड पर कोई मैटर नहीं करता। इसलिए यूरोप को साइडलाइन कर डायरेक्ट थ्री-वे स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस डिवाइड करने की यह प्रिपरेशन चल रही है।

BRICS के भीतर सुलगते अंतर्विरोध और भारत की अडिग स्थिति

लेकिन इस गेम में एक ऐसा हिडन चैप्टर है, जिसकी चर्चा पब्लिक प्लेटफॉर्म्स पर कभी नहीं होती। रशिया और चाइना के बीच जिस नो-लिमिट्स पार्टनरशिप का ढोल पीटा जाता है, उसकी रियलिटी क्रेमलिन के खुफिया दस्तावेजों में कुछ और ही बयां करती है। रशिया का फार ईस्ट साइबेरिया का 40 लाख वर्ग किलोमीटर का वह स्नोइ एरिया है, जहां ऑयल, गैस, गोल्ड और अथाह लिथियम दबा हुआ है। इस रीजन में रशियन पापुलेशन रैपिडली डिक्रीज हो रही है, जबकि बॉर्डर पार चाइना के डेंसली पॉपुलेटेड प्रोविंसेज मौजूद हैं। पुतिन के स्ट्रैटेजिस्ट्स को यह खौफ सता रहा है कि अगर उन्होंने वाशिंगटन के साथ बैलेंस मेंटेन नहीं किया, तो नेक्स्ट 10 इयर्स में बीजिंग बिना एक भी गोली चलाए रशिया के इस हूज जियोफिजिकल एरिया को इकोनॉमिकली और डेमोग्राफिकली निगल जाएगा। यही रीज़न है कि पुतिन BRICS का फ्लैग लहराते हुए भी वाशिंगटन के साथ डायरेक्ट चैनल ओपन रखना चाहते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि अगर रशिया और चाइना पर्दे के पीछे अपनी अलग गोटियां सेट कर रहे हैं, तो फिर BRICS का असली वजूद क्या रह जाता है? नई दिल्ली में जब BRICS के लीडर्स एक मंच पर बैठते हैं, तो आंकड़े बहुत हैवी नजर आते हैं। दुनिया की 45 परसेंट से ज्यादा पापुलेशन, पीपीपी के बेसिस पर ग्लोबल इकॉनमी का 36 परसेंट हिस्सा, जो जी-7 के 30 परसेंट से कहीं ज्यादा है, और ग्लोबल ऑयल प्रोडक्शन के 40 परसेंट से ज्यादा हिस्से पर कंट्रोल। न्यू डेवलपमेंट बैंक का अरबों डॉलर का फंड भी अवेलेबल है। लेकिन इस चमकदार आवरण के नीचे विरोधाभासों का एक गहरा समंदर हिलोरें ले रहा है। पुतिन के लिए यह ऑर्गेनाइजेशन सैंक्शंस से बचने और खुद को इंटरनेशनल लेवल पर आइसोलेट होने से बचाने की शील्ड है। शी जिनपिंग के लिए यह प्लेटफॉर्म अपनी करेंसी युआन को थोपने और ग्लोबल साउथ पर चाइनीज कंट्रोल एस्टेब्लिश करने का जरिया है।

इस मंच का सबसे सेंसिटिव टर्निंग पॉइंट तब सामने आता है जब ईरान और यूएई जैसे दो धुर विरोधी एक ही टेबल पर बैठते हैं। ईरान अमेरिका और इजरायल के डायरेक्ट टारगेट पर है और वह BRICS को एक ओपनली एंटी-वेस्टर्न मिलिट्री फ्रंट में ट्रांसफॉर्म करना चाहता है। दूसरी तरफ यूएई की पूरी इकॉनमी और सिक्योरिटी की जड़ें वेस्टर्न कैपिटल, अमेरिकन बेसेस और अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़ी हैं। जब रेड सी और गल्फ के मैरीटाइम रूट्स पर टेंशन स्पाइक होती है, तो इन दोनों देशों के इंटरेस्ट्स डायरेक्ट क्लैश करते हैं। ऐसे में किसी भी ज्वॉइंट डिक्लेरेशन पर सभी की सहमति बनाना आग के दरिया से गुजरने जैसा हो जाता है।

रशिया और चाइना कंटीन्यूअसली प्रेशर बनाते हैं कि ज्वॉइंट डिक्लेरेशन में नाटो और वेस्टर्न सैंक्शंस के अगेंस्ट शार्प लैंग्वेज का यूज किया जाए। लेकिन इंडिया का स्टैंड कंपलीटली फर्म और क्लियर है। नई दिल्ली का डायरेक्ट मैसेज यह है कि BRICS एक नॉन-वेस्टर्न प्लेटफॉर्म जरूर है, लेकिन यह कभी भी एंटी-वेस्टर्न प्लेटफॉर्म नहीं बन सकता। इंडिया किसी भी ऐसे डॉक्यूमेंट पर साइन नहीं करता जो डेवलपिंग कंट्रीज के इस मंच को चाइना या रशिया का पर्सनल पॉलिटिकल वेपन बना दे। इंडिया इस मंच को कॉन्फ्लिक्ट की जगह इंक्लूसिव डेवलपमेंट, आतंकवाद के खिलाफ बिना डबल स्टैंडर्ड्स के लड़ाई, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और इकोनॉमिक सिक्योरिटी के एजेंडे पर मेंटेन रखता है।

डी-डॉलराइजेशन का भ्रम और भारत की व्यावहारिक कूटनीति

इसी तरह कॉमन करेंसी के नाम पर फैलाए गए भ्रम को भी समझना जरूरी है। रशिया और ईरान वेस्टर्न सैंक्शंस और स्विफ्ट से बाहर किए जाने के बाद R5 नाम की साझा मुद्रा के लिए बेताब हैं। लेकिन इंडिया ने इस प्रपोजल को कंपलीटली रिजेक्ट कर दिया है। इसके पीछे सॉलिड इकोनॉमिक और स्ट्रेटेजिक रीज़न्स हैं। किसी कॉमन करेंसी को रन करने के लिए सभी देशों की इकॉनमी, इन्फ्लेशन रेट्स और फिस्कल पॉलिसीज का एक जैसा होना जरूरी है। 18 ट्रिलियन डॉलर की विशाल मैन्युफैक्चरिंग इकॉनमी वाले चाइना और 400 बिलियन डॉलर के साउथ अफ्रीका के बीच कोई समानता नहीं हो सकती। ऐसी किसी भी करेंसी की चाबी सीधे पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के हाथ में चली जाएगी। रशिया-यूक्रेन वॉर के बाद मॉस्को का ट्रेड ऑलरेडी हैवी स्केल पर युआन पर डिपेंडेंट हो चुका है। इंडिया अपनी सोवरेनिटी को बीजिंग की करेंसी के हवाले कभी नहीं कर सकता।

रियलिटी यह भी है कि ग्लोबल फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व्स में आज भी अमेरिकन डॉलर का शेयर लगभग 58 से 59 परसेंट है। ग्लोबल ट्रेड के 80 परसेंट ट्रांजैक्शंस और स्विफ्ट मैसेजिंग आज भी डॉलर के अराउंड घूमती है। इसके कंपैरिजन में चाइनीज युआन तमाम कोशिशों के बाद भी ग्लोबल रिजर्व्स में केवल 2 से 3 परसेंट के बीच स्टक है। बीजिंग की इकॉनमी क्लोज्ड है और वहां कैपिटल मूवमेंट पर कम्युनिस्ट पार्टी का स्ट्रिक्ट कंट्रोल है। कोई भी देश अपनी नेशनल वेल्थ ऐसी करेंसी में नहीं फंसाना चाहेगा जिसे बीजिंग का एक पॉलिटिकल डिसीजन रातोंरात क्रैश कर सके। यही रीज़न है कि इंडिया डी-डॉलराइजेशन के हवाई नारों में फंसने के बजाय डी-रिस्किंग की प्रैक्टिकल पॉलिसी पर वर्क कर रहा है। इंडिया ने डॉलर से डायरेक्ट फाइट करने के बजाय अपनी नेशनल करेंसी में बाइलैटरल ट्रेड को बूस्ट किया है। यूएई के साथ रुपया-दिरहम मेकैनिज्म, रशिया के साथ स्पेशल वोस्ट्रो अकाउंट्स, और दुनिया के 20 से ज्यादा देशों के साथ रुपयों में ट्रेड की शुरुआत इसी पॉलिसी का पार्ट है। इसके साथ ही इंडिया अपने यूपीआई को ग्लोबल लेवल पर कनेक्ट करके बिना किसी थर्ड कंट्री की मिडलमैनशिप के डायरेक्ट डिजिटल पेमेंट नेटवर्क खड़ा कर रहा है।

भारत का रणनीतिक चक्रव्यूह और महाशक्तियों को मात

जब तीनों महाशक्तियां दुनिया को अपने स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस में डिवाइड करने का सपना देख रही थीं, तब भारत ने केवल अपनी डिफेंसिव बॉर्डर नहीं संभालीं, बल्कि ग्लोबल चेसबोर्ड पर एक ऐसा स्ट्रेटेजिक चक्रव्यूह रच दिया जिसने इस पूरे ट्राईपोलर कार्टेल को हिलाकर रख दिया। ट्रंप को लगा था कि वे हैवी टैरिफ का फियर दिखाकर झुका लेंगे। जिनपिंग को लगा था कि वे लद्दाख की एलएसी पर 3,488 किलोमीटर लंबी बॉर्डर पर प्रेशर क्रिएट करके उलझा देंगे। और मॉस्को को लगा था कि वह अपने ऑयल और हथियारों की डिपेंडेंसी से इंडिया की डिप्लोमेसी को अपनी डायरेक्शन में टर्न कर लेगा। लेकिन साउथ ब्लॉक ने जो जवाबी रणनीति बनाई, उसने इन तीनों के इक्वेशंस को ध्वस्त कर दिया।

सबसे पहले बात समंदर की, जहां असली ताकत का टेस्ट होता है। चाइना अपनी छाती कितनी भी पीट ले, उसकी सबसे वीक नस उसका मैरीटाइम एनर्जी रूट है। बीजिंग का 80 परसेंट क्रूड ऑयल और हैवी ट्रेड इंडियन ओशन के मलक्का स्ट्रेट से होकर पास होता है। इंडिया ने अंडमान एंड निकोबार कमांड यानी एएनसी को एक अल्ट्रा-मॉडर्न थिएटर कमांड और नेवल फोर्ट्रेस में ट्रांसफॉर्म कर दिया है। इंडियन नेवी ने अंडमान के वाटर में ऐसा ग्रिप टाइट किया है कि क्राइसिस के टाइम चाइना की एनर्जी सप्लाई की सांसें कुछ ही घंटों में स्टॉप की जा सकती हैं। चाइना के स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स को काउंटर करने के लिए इंडिया ने नेकलेस ऑफ डायमंड्स स्ट्रेटजी बिछा दी है। ओमान के दुकम पोर्ट से लेकर मॉरीशस के अगालेगा आइलैंड पर मॉडर्न एयरस्ट्रिप, मेडागास्कर में कोस्टल रडार स्टेशन, और इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट तक इंडियन नेवी की रीच ने पूरे इंडियन ओशन को इंडिया का इम्प्रेग्नेबल फोर्ट्रेस बना दिया है।

अमेरिकन सैंक्शंस की तमाम धमकियों को इग्नोर करते हुए इंडिया ने 2024 में ईरान के चाबहार पोर्ट के ऑपरेशन का 10 इयर्स का हिस्टोरिक कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया। यह चाबहार केवल एक पोर्ट नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान को कंपलीटली बाईपास करते हुए इंडिया को अफगानिस्तान, सेंट्रल एशिया और INSTC कॉरिडोर के थ्रू डायरेक्ट यूरेशिया तक डायरेक्ट स्ट्रेटेजिक एक्सेस प्रोवाइड करता है।

इधर जब ट्रंप ने यूरोप को पुतिन के सामने अकेला छोड़ दिया, तब फ्रांस के प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों ने नई दिल्ली का रुख किया। पेरिस और नई दिल्ली के बीच डिफेंस और न्यूक्लियर सेक्टर में जो स्ट्रेटेजिक एक्सिस बिल्ड हुई है, उसने G-3 की हेकड़ी निकाल दी है। फ्रांस यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल का वीटो पावर होल्डर न्यूक्लियर नेशन है, जिसके पास इंडिपेंडेंट हाई टेक्नोलॉजी है। राफेल फाइटर जेट्स से लेकर स्कॉर्पीन सबमरीन तक और अब सैफरान के साथ 100 परसेंट टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर बेस्ड फाइटर जेट इंजन बनाने की प्रिपरेशन, इंडिया को वेस्टर्न और रशियन हथियारों की ब्लैकमेलिंग से कंपलीटली फ्री करती है। फ्रांस और इंडिया मिलकर साउथ-वेस्ट इंडियन ओशन में ज्वॉइंट पेट्रोलिंग कर रहे हैं, जो यह प्रूव करता है कि दुनिया में मिडिल पावर्स का एक ऐसा ऑटोनॉमस अलायंस रेडी हो चुका है जो न अमेरिका का ऑर्डर मानेगा, न रशिया के आगे झुकेगा और न ही चाइना की दादागिरी सहेगा।

स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी केवल बातों से नहीं आती, उसके पीछे सॉलिड और हैवी हार्ड पावर की नीड होती है। 2020 के गलवान क्लैश के बाद इंडिया ने अपनी मिलिट्री प्रायोरिटीज को हिस्टोरिकली चेंज किया है। आर्मी की ट्रेडिशनल डिप्लॉयमेंट को पाकिस्तान के फ्रंट से हटाकर फुल फोर्स से चाइना के नॉर्थन बॉर्डर की तरफ रीबैलेंस किया गया है। एलएसी पर 50,000 से ज्यादा एक्स्ट्रा ट्रूप्स, टी-90 भीष्म टैंक्स, के-9 वज्र होवित्जर तोपें और आकाश जैसी मिसाइल सिस्टम्स डिप्लॉयड हैं। बीआरओ ने सेला और अटल टनल जैसी ऑल-वेदर टनल्स और बॉर्डर एयरस्ट्रिप्स का जो नेटवर्क बिछाया है, उसने किसी भी चाइनीज मिसएडवेंचर का इमीडिएट और डेडली रिप्लाई देने की कैपेसिटी बिल्ड कर दी है।

इसके साथ ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में इंडिया का कायाकल्प पूरी दुनिया देख रही है। कभी दुनिया का सबसे बड़ा वेपन इम्पोर्टर रहा इंडिया आज 1.27 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का डिफेंस प्रोडक्शन अपनी होमलैंड में कर रहा है। 21,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के डिफेंस इक्विपमेंट्स का एक्सपोर्ट किया जा रहा है। फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें डिलीवर करके इंडिया ने डायरेक्ट चाइना के बैकयार्ड साउथ चाइना सी में अपनी पावर रजिस्टर कर दी है। पिनाका रॉकेट सिस्टम, एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन ATAGS, और आर्मेनिया को भेजे गए आकाश एयर डिफेंस सिस्टम ने प्रूव कर दिया है कि इंडिया अब केवल सिक्योरिटी डिमांड करने वाला नहीं, बल्कि सिक्योरिटी प्रोवाइड करने वाला नेशन बन चुका है।

डेटा, सेमीकंडक्टर और भविष्य का ग्लोबल लीडर

21वीं सदी की इस जंग में सबसे डिसाइसिव वेपन डेटा और सेमीकंडक्टर चिप हैं। इंडिया ने 10 बिलियन डॉलर के सेमीकंडक्टर मिशन के तहत गुजरात के धोलेरा और असम के मोरीगांव में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पावरचिप के कोलैबोरेशन से मॉडर्न फैब्रिकेशन और टेस्टिंग प्लांट्स की स्ट्रॉन्ग फाउंडेशन रख दी है। इसके अलावा अमेरिका के साथ iCET एग्रीमेंट के तहत जीई F414 जेट इंजन का 80 परसेंट टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ इंडिया में को-प्रोडक्शन देश को एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के टॉप पायदान पर बिठा रहा है। चिप और मॉडर्न हार्डवेयर के दम पर इंडिया ने यह एश्योर कर दिया है कि फ्यूचर के ड्रोन, हाइपरसोनिक मिसाइलें और एआई सिस्टम किसी फॉरेन पावर के मोहताज नहीं रहेंगे।

हिस्ट्री का यह अटल नियम है कि बिना शेयर वैल्यूज के, केवल सेल्फिशनेस और फियर के बेसिस पर बनाए गए सिंडिकेट्स ज्यादा दिन तक सस्टेन नहीं करते। यह कथित G-3 एलायंस भी अपने ही इंटरनल कॉन्ट्रडिक्शंस के बोझ से टूटने के लिए डेस्टिंड है। अमेरिकन डीप स्टेट, पेंटागन और सीआईए कभी भी दुनिया की नंबर वन इकॉनमी की गद्दी चाइना को पीसफुली नहीं सौंपेंगे। उनके बीच सेमीकंडक्टर, एआई और स्पेस में डोमिनेंस की फाइट किसी एग्रीमेंट से स्टॉप होने वाली नहीं है। दूसरी तरफ रशिया और चाइना का म्यूचुअल मिस्ट्रस्ट साइबेरिया और सेंट्रल एशिया में किसी भी मोमेंट पर स्पार्क हो सकता है। और ट्रंप की पॉलिसीज की अनसर्टेनिटी ऐसी है कि आज हुआ कोई भी सीक्रेट एग्रीमेंट टुमारो मॉर्निंग एक नए डिसीजन के साथ डस्टबिन में थ्रो किया जा सकता है।

यहीं वह जगह है जहां इंडिया की असली ताकत शाइन करती है। इंडिया के पास 130 से ज्यादा डेवलपिंग कंट्रीज का वह मोरल, डिप्लोमैटिक और न्यूमेरिकल सपोर्ट है जिसे दुनिया की कोई सुपरपॉवर इग्नोर नहीं कर सकती। इंडिया ने अपनी जी20 प्रेसिडेंसी के दौरान 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ को परमानेंट मेंबरशिप दिलाकर प्रूव किया कि वह केवल अपनी चेयर डिमांड नहीं करता, बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ को डिसीजन की टेबल पर बिठाता है। इंडिया अपना डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर यानी आधार, यूपीआई और डिजिलॉकर दुनिया के गरीब देशों को बिना किसी डेट ट्रैप के हैंड्स-ओवर कर रहा है। चाइना जहां देशों को कर्ज में डुबोकर उनकी जमीनें छीनता है, वहीं इंडिया उन्हें टेक्नोलॉजिकली सेल्फ-रिलायंट बना रहा है।

1945 की हिस्ट्री को 2026 में रिपीट नहीं किया जा सकता। दुनिया अब किसी थ्री नेशंस की पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं बन सकती। 1.4 बिलियन की पॉपुलेशन, दुनिया का सबसे बड़ा स्किल्ड वर्कफोर्स, 5 ट्रिलियन और फिर 7 ट्रिलियन डॉलर की तरफ रैपिड स्पीड से रन करती इकॉनमी और 1.4 मिलियन से ज्यादा ब्रेव, वॉर-एक्सपीरियंस्ड आर्मी के साथ खड़ा इंडिया किसी के कैंप का प्यादा नहीं है। इंडिया मिडिल पावर्स को साथ लेकर, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ग्लोबल साउथ की पावर को कनेक्ट करके खुद दुनिया का चौथा और सबसे एसेंशियल स्ट्रेटेजिक पोल बन चुका है। इंडिया न किसी के सामने झुकेगा, न किसी का फॉलोअर बनेगा। साउथ ब्लॉक का यह न्यू और पावरफुल इंडिया अब दुनिया के रूल्स एंड रेगुलेशंस का स्पेक्टेटर नहीं, बल्कि रूल-मेकर्स की फर्स्ट रो में स्टैंड करने वाला एक अनडिस्प्यूटेड विश्वबंधु है। क्या आपको लगता है कि अमेरिका, रशिया और चाइना की यह तिकड़ी इंडिया के इस चक्रव्यूह के आगे सस्टेन कर पाएगी? अपनी ओपिनियन जरूर शेयर करें।

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