राफेल डील के बीच रूस का मास्टरस्ट्रोक! भारत को 5th जनरेशन जेट देने के पीछे क्या है पुतिन की चाल?

राफेल डील के बीच रूस का मास्टरस्ट्रोक! भारत को 5th जनरेशन जेट देने के पीछे क्या है पुतिन की चाल?

ठीक उसी वक्त जब भारत 114 राफेल खरीदने की फाइल पर मुहर लगाने के बेहद करीब पहुंच चुका था, जब फ्रांस की सफ्रान के साथ मिलकर 6th जनरेशन जेट इंजन बनाने की महा-डील लगभग पक्की होने वाली थी, ऐन उसी वक्त व्लादिमीर पुतिन ने अपना सबसे खूंखार और हैरान कर देने वाला दांव चल दिया है। यह एक ऐसा दांव है जिसने रातों-रात दिल्ली से लेकर पेरिस और वॉशिंगटन तक खलबली मचा दी है। आखिर रूस के सुखोई डिजाइन ब्यूरो की तरफ से Su-57 का यह क्विक डिलीवरी ऑफर भारत के लिए कोई शानदार गिफ्ट है या फिर पश्चिमी देशों को भारत से दूर फेंकने और भारत को हमेशा के लिए रूसी हथियारों का मोहताज बनाए रखने का कोई बहुत बड़ा और गहरा ट्रैप? क्या सच में रूस बंद कमरों में भारत को सीधे छठी पीढ़ी यानी 6th Gen की वो महाविनाशक तकनीक ऑफर कर रहा है, जिससे दुश्मन के रडार पलक झपकते ही अंधे हो जाएं? हवा में उड़ने वाला ड्रोन कमांड सेंटर Su-57D क्या भारत को रातों-रात चीन के खूंखार J-20 का काल बना देगा, या इसके पीछे रूस की कोई गहरी मजबूरी और चालाकी छिपी है? अगर ये रूसी विमान इतना ही घातक और अचूक है, तो पूर्व वायुसेना प्रमुख आर के एस भदौरिया ने इसे भारत के सबसे बड़े स्वदेशी सपने यानी AMCA के लिए सीधे तौर पर मौत की घंटी क्यों करार दे दिया है? क्या महज 8 या 10 रूसी जेट्स खरीदने का वो लालच, भारत के 15000 करोड़ के स्वदेशी प्रोजेक्ट को हमेशा के लिए कब्र में दफना देगा? आखिर भदौरिया ऐसा क्या जानते हैं जो इस चकाचौंध के पीछे छुपाया जा रहा है? आज हम इसी चक्रव्यूह को डिकोड करेंगे और आपको वो सच बताएंगे जो मेनस्ट्रीम मीडिया की बहसों से पूरी तरह गायब है।

इस पूरे खेल को समझने के लिए आपको सबसे पहले उस टाइमिंग को समझना होगा, जिस वक्त रूस ने यह ब्रह्मास्त्र फेंका है। भारतीय रक्षा गलियारों में इस समय एक खामोश लेकिन बेहद तीव्र हलचल मची हुई है। भारत अपने महत्वाकांक्षी 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानी MRFA टेंडर के तहत फ्रांसीसी राफेल को तरजीह देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दूसरी तरफ, अपने स्वदेशी 5th जनरेशन फाइटर जेट AMCA के लिए विदेशी कंपनियों के साथ इंजन की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर बातचीत अंतिम दौर में है। अमेरिका की GE और फ्रांस की Safran इस रेस में सबसे आगे हैं। भारत सिर्फ विमान नहीं खरीद रहा है, भारत फ्रांस के साथ मिलकर 6th जनरेशन लड़ाकू विमानों की तकनीक पर भी नजरें गड़ाए हुए है। मोदी सरकार का विजन साफ है, अब जो भी डील होगी, उसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और मेक इन इंडिया सबसे बड़ी शर्त होगी। और ठीक इसी नाजुक और निर्णायक मोड़ पर रूस को यह अहसास हो गया है कि अगर उसने अभी कोई बड़ा धमाका नहीं किया, तो अगले 40 से 50 सालों के लिए भारत का एविएशन मार्केट उसके हाथ से हमेशा के लिए फिसल जाएगा। भारत ऐतिहासिक रूप से रूस का सबसे बड़ा हथियार खरीदार रहा है। इस बाजार को खोना रूसी रक्षा उद्योग के लिए किसी भयानक सपने से कम नहीं है। इसीलिए रूस ने केवल एक विमान का ढांचा पेश नहीं किया है, बल्कि उसने एक पूरा इकोसिस्टम और अत्याधुनिक हथियारों का पैकेज ऑफर किया है जो भारतीय वायुसेना यानी IAF की मौजूदा कमियों को तुरंत भर सकता है।

अब जरा इस रूसी ऑफर की बारीकियों और इसके पीछे छिपे उस लालच को समझिए जिसे ठुकराना किसी भी वायुसेना के लिए बेहद मुश्किल होता है। ET Now News और कई डिफेंस रिपोर्ट्स के हवाले से यह खबर निकलकर आई है कि रूस ने भारत को लगभग 8 से 10 Su-57 विमानों के क्विक ट्रांसफर का ऑफर दिया है। यह संख्या लगभग आधा स्क्वाड्रन होती है। रूस का तर्क है कि भारत को इसे एक झटके में बड़ी संख्या में खरीदने की जरूरत नहीं है। भारत इन विमानों को एक स्टॉपगैप सॉल्यूशन यानी अस्थायी व्यवस्था के तौर पर ले सकता है। रूस का कहना है कि जब तक भारत का अपना AMCA बनकर तैयार होगा, तब तक भारतीय पायलटों को 5th जनरेशन के स्टील्थ फाइटर जेट्स को उड़ाने, उनके एविओनिक्स को समझने और नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर का सीधा अनुभव मिल जाएगा। यह ऑफर इसलिए भी अहम है क्योंकि दुनिया अभी 5th जनरेशन के लिए तरस रही है, और Su-57 रूस का सबसे एडवांस ऑपरेशनल फाइटर है। इसमें रडार को चकमा देने वाली स्टील्थ क्षमता, इंटरनल वेपन बे यानी हथियारों को अंदर छिपाकर ले जाने की खूबी और बेहद एडवांस सेंसर लगे हैं। चीन लगातार एलएसी के पास अपने J-20 स्टील्थ फाइटर्स की तैनाती बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत को तुरंत एक ऐसा प्लेटफॉर्म चाहिए जो आंख में आंख डालकर J-20 को हवा में ही भस्म कर सके। और यहीं पर रूस ने इस डील में एक ऐसा हथियार जोड़ दिया है जिसने पूरी दुनिया के डिफेंस एक्सपर्ट्स के होश उड़ा दिए हैं।

रूस ने इस विमान के साथ अपनी सबसे खतरनाक और घातक मिसाइल R-77M, जिसे Izdeliye 180 भी कहा जाता है, का एक्सेस भारत को देने की पेशकश की है। चीन की जिस PL-15 मिसाइल से पूरी दुनिया खौफ खाती है, यह मिसाइल उसे हवा में ही राख कर देने की कुव्वत रखती है। आखिर इस R-77M में ऐसा क्या है जो इसे इतना खूंखार बनाता है? दरअसल, यह एक बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी BVR मिसाइल है जिसकी अनुमानित रेंज 200 किलोमीटर तक है। लेकिन इसकी असली ताकत इसकी रेंज नहीं, बल्कि इसके अंदर लगा डुअल पल्स रॉकेट मोटर और एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी AESA सीकर है। आम तौर पर जब कोई मिसाइल दागी जाती है, तो वह अपनी पूरी ऊर्जा शुरुआत में ही लगा देती है। जब वह दुश्मन के विमान के पास पहुंचती है यानी अपने टर्मिनल फेज में होती है, तब तक उसकी ऊर्जा और गति कम होने लगती है, और एक चालाक पायलट तेजी से मैन्युवर करके उस मिसाइल से बच सकता है। लेकिन R-77M का डुअल पल्स मोटर गेम पूरी तरह बदल देता है। यह मिसाइल अपने टारगेट के बिल्कुल करीब पहुंचने के बाद अपना दूसरा इग्निशन चालू करती है। इसका मतलब है कि टर्मिनल फेज में इसकी स्पीड और ऊर्जा अचानक दोगुनी हो जाती है। दुश्मन के पायलट को संभलने या भागने का कोई मौका ही नहीं मिलता। भारत लंबे समय से ऐसी ही लंबी दूरी की BVR मिसाइलों की तलाश में रहा है। स्वदेशी अस्त्र सीरीज पर तेजी से काम चल रहा है, लेकिन अस्त्र के पूरी तरह मैच्योर होने तक R-77M भारत को रातों-रात एक ऐसी ताकत दे सकती है जिसके सामने चीन या पाकिस्तान का कोई भी विमान टिक नहीं पाएगा।

लेकिन बात सिर्फ मिसाइल पर आकर नहीं रुकती। रूस ने इस ऑफर में एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है जो सीधे 6th जनरेशन की तकनीक से जुड़ा है। रूस के सुखोई डिजाइन ब्यूरो ने Su-57 के प्रस्तावित दो सीट वाले वर्जन यानी Su-57D के बारे में एक बहुत बड़ी जानकारी लीक की है। सुखोई के डायरेक्टर मिखाइल स्ट्रेलेट्स के मुताबिक, यह दो सीट वाला विमान सिर्फ कोई ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट नहीं होगा। इसके अतिरिक्त कॉकपिट की वजह से यह विमान हवा में उड़ते हुए एक एयरबोर्न कमांड पोस्ट के तौर पर काम करेगा। जरा इस तस्वीर की कल्पना कीजिए। आसमान में एक Su-57D उड़ रहा है। आगे बैठा पायलट पूरी तरह से विमान उड़ाने और डॉगफाइट पर फोकस कर रहा है, जबकि पीछे बैठा दूसरा ऑपरेटर कोई हथियार नहीं चला रहा, बल्कि वह एक ड्रोन कमांड सेंटर को कंट्रोल कर रहा है। यह ऑपरेटर S-70 Okhotnik जैसे भारी भरकम और महाविनाशक स्टील्थ ड्रोन के पूरे झुंड को कंट्रोल करेगा। S-70 Okhotnik कोई छोटा ड्रोन नहीं है, यह अपने आप में एक भारी लड़ाकू विमान जितना बड़ा है जो स्टील्थ तकनीक से लैस है और भारी मात्रा में बम और मिसाइलें ले जा सकता है। रूस ने इसे 5th जनरेशन विमान के वफादार साथी यानी लॉयल विंगमैन के रूप में पेश किया है। युद्ध के मैदान में ये ड्रोन Su-57D के आगे उड़ेंगे, दुश्मन के रडार को जाम करेंगे, खतरनाक इलाकों में घुसकर टारगेट की पहचान करेंगे और जरूरत पड़ने पर खुद ही बमबारी कर देंगे। इसे कहते हैं मैन्ड अनमैन्ड टीमिंग यानी MUM-T तकनीक। यह पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेंसर फ्यूजन पर आधारित 6th जनरेशन का कॉन्सेप्ट है। रूस का दावा है कि अगर भारत इस डील के लिए हां करता है, तो उसे यह तकनीक समय से बहुत पहले मिल जाएगी।

अब आप सोच रहे होंगे कि अगर यह डील इतनी ही शानदार है, इसमें 5th जनरेशन का विमान मिल रहा है, 200 किलोमीटर मार करने वाली अचूक मिसाइल मिल रही है, और 6th जनरेशन का ड्रोन कमांड सेंटर मिल रहा है, तो फिर भारत आंख बंद करके इस पर साइन क्यों नहीं कर देता? आखिर दिक्कत कहां है? असली दिक्कत और सबसे खौफनाक जाल यहीं से शुरू होता है। और इसी जाल को बेनकाब किया है पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आर के एस भदौरिया ने। भदौरिया का साफ कहना है कि रूस का यह Su-57 ऑफर भारत के अपने 5th जनरेशन फाइटर जेट प्रोग्राम यानी AMCA के लिए सीधे तौर पर मौत की घंटी साबित हो सकता है। यह कोई साधारण बयान नहीं है। इसके पीछे दशकों का वो कड़वा सच और रक्षा खरीद का वो इतिहास छिपा है जिसने भारत को आज तक विदेशी हथियारों का गुलाम बनाए रखा है।

मार्च 2024 में भारत सरकार की कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी यानी CCS ने AMCA प्रोजेक्ट के लिए 15000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम मंजूरी दी है। यह भारत का इकलौता 5th जनरेशन स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम है जो फिलहाल डेवलपमेंट फेज में है। भदौरिया की सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारतीय वायुसेना के सामने इस वक्त एक बहुत बड़ा डिलेमा है। एक तरफ चीन का तत्काल खतरा है जिससे निपटने के लिए तुरंत हथियार चाहिए, और दूसरी तरफ भविष्य की आत्मनिर्भरता है। रूस कह रहा है कि आप सिर्फ 8 या 10 विमान खरीद लीजिए। सुनने में यह एक बहुत ही प्रैक्टिकल और सेफ ऑप्शन लगता है। लेकिन भदौरिया चेतावनी देते हैं कि सैन्य खरीद की दुनिया में थोड़ा सा खरीदेंगे वाला कॉन्सेप्ट एक बहुत बड़ा भ्रम है। एक बार जब कोई विदेशी 5th जनरेशन जेट वायुसेना के बेड़े में शामिल हो जाता है, तो उसके पीछे-पीछे उसका पूरा इकोसिस्टम चला आता है। उन 10 विमानों के लिए भारत को नए ट्रेनिंग सिम्युलेटर बनाने होंगे, मेंटेनेंस नेटवर्क खड़ा करना होगा, हथियारों का स्टॉक जमा करना होगा और पायलटों को एक खास तरह की ट्रेनिंग देनी होगी।

जब इतना भारी निवेश हो जाएगा, तो एक या दो साल बाद वायुसेना के भीतर से ही यह मांग उठने लगेगी कि सिर्फ 10 विमानों के लिए इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों बर्बाद किया जाए? क्यों न हम 10 की जगह 40 विमान खरीद लें? फिर 40 से 80 विमानों की मांग उठेगी। और देखते ही देखते जो डील एक स्टॉपगैप के तौर पर शुरू हुई थी, वह चार या आठ स्क्वाड्रन की परमानेंट कमिटमेंट में बदल जाएगी। यह विदेशी स्टॉपगैप विमान सीधे तौर पर भारत के स्वदेशी AMCA के साथ क्रूशियल फंड्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्किल्ड मैनपावर के लिए कॉम्पिटिशन करने लगेगा। भारत का रक्षा बजट सीमित है। अगर बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा Su-57 की फ्लीट को मेंटेन करने और महंगे रूसी हथियार खरीदने में चला गया, तो AMCA प्रोजेक्ट फंड्स की कमी का शिकार हो जाएगा।

इस खतरे को और भी ज्यादा खतरनाक बनाता है रूस का एक और मास्टरस्ट्रोक। रूस ने अचानक HAL की नासिक फैसिलिटी पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। रूस कह रहा है कि भारत को Su-57 के लिए कोई नया इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की जरूरत ही नहीं है। HAL नासिक में पहले से ही Su-30MKI का निर्माण, ओवरहॉलिंग और मेंटेनेंस हो रहा है। रूस इसे प्लग एंड प्ले के नाम पर बेच रहा है। उनका तर्क है कि चूंकि दोनों विमान सुखोई परिवार के हैं, इसलिए नासिक की फैसिलिटी को आसानी से Su-57 के लिए अपग्रेड किया जा सकता है। यह तर्क भारतीय नीति निर्माताओं को बहुत लुभावना लग सकता है क्योंकि इससे अरबों डॉलर के नए निवेश की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन असल में यह एक ऐसा जाल है कि अगर भारत ने गलती से भी ये विमान खरीद लिए, तो अगले 50 सालों तक भारतीय वायुसेना फिर से रूसी सप्लाई चेन की गुलाम बनकर रह जाएगी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि AMCA का विकास तेजस फाइटर जेट से कई गुना ज्यादा जटिल है। इसमें एडवांस्ड स्टील्थ डिजाइन, रडार को सोखने वाला रडार एब्जॉर्बेंट मैटेरियल, अंदरूनी हथियारों का बे, अत्याधुनिक सेंसर फ्यूजन और सबसे अहम, एक बेहद ताकतवर नया जेट इंजन शामिल है। अगर इनमें से किसी एक तकनीक में भी कोई अड़चन आती है, तो पूरे प्रोजेक्ट की टाइमलाइन खिसक सकती है। वर्तमान रोडमैप के अनुसार AMCA का पहला प्रोटोटाइप 2028 से 2029 के आसपास रोलआउट होने की उम्मीद है। भदौरिया का डर बिल्कुल जायज है क्योंकि भारत ने पहले भी तेजस Mk2 जैसे प्रोजेक्ट्स में भारी देरी देखी है। अगर भारत ने Su-57 खरीद लिया, तो DRDO और ADA पर से AMCA को समय पर पूरा करने का वो भारी दबाव और इमरजेंसी का एहसास खत्म हो जाएगा। और अगर AMCA में देरी हुई, तो फिर से वायुसेना अपनी स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को गिरने से बचाने के लिए सरकार पर और ज्यादा विदेशी जेट्स खरीदने का दबाव बनाएगी। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें भारत का स्वदेशी रक्षा उद्योग हमेशा विदेशी लॉबी के आगे घुटने टेकता रहा है। भदौरिया का स्पष्ट संदेश है कि अगर हमें एक विश्व स्तरीय ताकत बनना है, तो हमें इस विदेशी लालच को ठुकराकर अपना पूरा फोकस, पूरा पैसा और पूरी राष्ट्रीय ऊर्जा सिर्फ और सिर्फ AMCA पर झोंक देनी चाहिए।

इस पूरे खेल का एक और बहुत बड़ा और डार्क ग्लोबल एंगल है जिसे समझना बेहद जरूरी है। आज दुनिया 2010 के दशक वाली नहीं है। आज रूस और यूक्रेन के बीच एक भीषण युद्ध चल रहा है जिसके कारण रूस पर पश्चिमी देशों ने इतिहास के सबसे कड़े आर्थिक और सामरिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। ऐसे माहौल में रूस से कोई भी बड़ी मिलिट्री हार्डवेयर डील करना भारत के लिए सीधे तौर पर आग से खेलने जैसा है। अमेरिका का सख्त कानून CAATSA यानी काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट हमेशा एक लटकती तलवार की तरह मौजूद है। हालांकि अमेरिका ने भारत को S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद पर एक विशेष छूट दी थी, क्योंकि वह भारत की एक पुरानी और बेहद जरूरी रक्षा आवश्यकता थी। लेकिन S-400 एक डिफेंसिव सिस्टम है। 5th जनरेशन का स्टील्थ फाइटर जेट एक बेहद आक्रामक और ऑफेंसिव वेपन प्लेटफॉर्म है। अगर भारत आज Su-57 की डील साइन करता है, तो वॉशिंगटन में बैठे अमेरिकी नीति निर्माता इसे एक बहुत बड़े झटके के तौर पर देखेंगे। इसके नतीजे में भारत और अमेरिका के बीच जो क्रिटिकल इमर्जिंग टेक्नोलॉजी और जेट इंजन के ट्रांसफर पर बातचीत चल रही है, वह रातों-रात खटाई में पड़ सकती है। अमेरिका भारत को GE F414 इंजन की तकनीक देने से हाथ खींच सकता है, जो भारत के तेजस Mk2 और शुरुआती AMCA विमानों के लिए लाइफलाइन है। यानी रूस से एक रेडीमेड विमान खरीदने के चक्कर में भारत अपने पूरे स्वदेशी एविएशन इकोसिस्टम की लाइफलाइन को खतरे में डाल सकता है।

इसके अलावा रूस की अपनी सप्लाई चेन इस वक्त भयंकर तनाव से गुजर रही है। युद्ध के कारण रूस के अपने रक्षा उद्योग को सेमीकंडक्टर और हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। भले ही रूस यह दावा करे कि वह भारत को समय पर डिलीवरी दे देगा, लेकिन युद्ध के हालात में अगर कल को स्पेयर पार्ट्स या क्रिटिकल कंपोनेंट्स की सप्लाई रुक गई, तो भारत के करोड़ों डॉलर के ये हाई-टेक फाइटर जेट्स जमीन पर धूल फांकने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे। भारत किसी भी कीमत पर अपनी नेशनल सिक्योरिटी को एक ऐसे देश की सप्लाई चेन के भरोसे नहीं छोड़ सकता जो खुद एक अंतहीन युद्ध में फंसा हो।

मोदी सरकार की स्ट्रैटेजिक थिंकिंग और विदेश नीति इस वक्त एक बहुत ही सधे हुए संतुलन पर चल रही है। भारत दुनिया को यह साफ संदेश दे चुका है कि वह स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी यानी सामरिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर काम करता है। भारत अपनी जरूरत के हिसाब से फैसले लेगा, किसी महाशक्ति के दबाव में नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अपने दीर्घकालिक हितों की बलि चढ़ा दे। भारत का लक्ष्य अब सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बने रहना नहीं है। भारत खुद को ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहता है। रक्षा निर्यात लगातार बढ़ रहा है। ब्रह्मोस से लेकर पिनाका और तेजस तक दुनिया भर में अपनी धाक जमा रहे हैं। ऐसे में वापस एक विदेशी 5th जनरेशन जेट पर निर्भर होना भारत के इस नए आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर भारत के विजन के खिलाफ जाता है।

अब अगर हम इस पूरे महामंथन का रणनीतिक निष्कर्ष निकालें, तो तस्वीर बहुत साफ हो जाती है। रूस का Su-57 और R-77M मिसाइल का ऑफर बिना किसी शक के तकनीकी रूप से एक बेहद शक्तिशाली और मारक पैकेज है। यह चीन के J-20 के खिलाफ तुरंत एक खौफनाक दीवार खड़ी कर सकता है। नासिक की फैसिलिटी का इस्तेमाल करके इसे लॉजिस्टिकली भी सपोर्ट किया जा सकता है। लेकिन यह सब सिर्फ एक शॉर्ट टर्म विजन है। दीर्घकालिक रणनीति के चश्मे से देखें तो दुनिया की कोई भी महाशक्ति कभी भी उधार की तकनीक और विदेशी जहाजों के दम पर नहीं बनती। जब तक भारत खुद स्टील्थ तकनीक, एडवांस्ड रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और सबसे जरूरी, एविएशन इंजन के सोर्स कोड पर अपना 100 प्रतिशत नियंत्रण नहीं रखता, तब तक भारतीय आसमान की पूर्ण संप्रभुता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। भदौरिया की चेतावनी किसी निराशावादी की आवाज नहीं है, बल्कि यह एक उस विजनरी की पुकार है जो जानता है कि दर्द सहे बिना कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकता।

अगर भारत आज थोड़ा दर्द सह लेता है, अगर वायुसेना आज अपने मौजूदा राफेल, अपग्रेडेड सुखोई और स्वदेशी तेजस बेड़े के दम पर कुछ साल और निकाल लेती है, और सरकार AMCA के डेवलपमेंट में किसी भी तरह की लाल फीताशाही और फंड की कमी नहीं आने देती, तो 2030 के दशक में भारत के पास अपना खुद का एक ऐसा अजेय स्टील्थ फाइटर होगा जिसे कोई भी प्रतिबंध, कोई भी ग्लोबल क्राइसिस या कोई भी विदेशी देश ग्राउंड नहीं कर सकेगा। वही भारत की असली ताकत होगी। सवाल सिर्फ एक फाइटर जेट चुनने का नहीं है, सवाल यह है कि भारत अपने अगले 50 सालों का भविष्य किसके हाथों में सौंपना चाहता है। क्या हम फिर से एक रेडीमेड और लुभावने विदेशी विकल्प के जाल में फंसकर अपने वैज्ञानिकों, अपने इंजीनियर्स और अपनी स्वदेशी प्रतिभाओं का मनोबल तोड़ देंगे? या फिर हम उस कठिन लेकिन गौरवशाली रास्ते पर चलेंगे जो हमें सही मायनों में एक एयरोस्पेस सुपरपावर बनाएगा?

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