बांग्लादेश का बड़ा कबूलनामा: बॉर्डर किलिंग के नाम पर भारत को घेरने वाला प्रोपेगेंडा अब खत्म!

बांग्लादेश का बड़ा कबूलनामा: बॉर्डर किलिंग के नाम पर भारत को घेरने वाला प्रोपेगेंडा अब खत्म!

भारत और बांग्लादेश की सरहद पर पिछले कई दशकों से एक ऐसी आग सुलग रही थी, जिसे कुछ लोग जानबूझकर भड़काए रखते थे। सीमा पर होने वाली कार्रवाई को एक ‘राजनीतिक हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन, 2 जून को ढाका के सचिवालय में जो हुआ, उसने उस पूरे प्रोपेगेंडा की नींव हिलाकर रख दी है। बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहाउद्दीन अहमद ने कैमरे के सामने आकर वो सच बोला, जिसे भारत का सीमा सुरक्षा बल यानी BSF बरसों से दुनिया के सामने चिल्ला-चिल्लाकर रख रहा था। ये कोई मामूली बयान नहीं, बल्कि कूटनीति की दुनिया में एक बड़ा धमाका है।

वो बयान जिसने नरेटिव बदल दिया

जब ढाका के प्रेस रूम में पत्रकारों ने घिसे-पिटे अंदाज में ‘बॉर्डर किलिंग’ का मुद्दा उठाया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि गृह मंत्री का जवाब उनके अपने ही प्रोपेगेंडा को आइना दिखा देगा। सलाहाउद्दीन अहमद ने दो टूक कहा कि अगर कोई हमारी सीमा में घुसकर हमला करता है, तो जवाब मिलेगा। लेकिन, इसके आगे उन्होंने जो कहा, वो भारत के स्टैंड की सबसे बड़ी जीत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग अवैध तरीके से सरहद पार करते हैं, जो अपराधों में संलिप्त हैं, उन पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई को ‘बॉर्डर किलिंग’ का नाम देना सरासर गलत है। यह बयान उस नैरेटिव को सीधे खारिज करता है, जिसके जरिए भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनाम करने की कोशिश की जाती थी।

जमीनी हकीकत बनाम प्रोपेगेंडा

रात के अंधेरे में भारत और बांग्लादेश की सीमा पर जो होता है, उसे समझना जरूरी है। यह कोई आम आवाजाही नहीं है। मवेशियों की तस्करी, जाली नोटों का धंधा और अवैध घुसपैठ—ये सब एक संगठित सिंडिकेट की तरह काम करते हैं। जब हमारे जवान इन्हें रोकते हैं, तो ये कोई सीधे-सादे लोग नहीं होते। ये लोग धारदार हथियारों और कभी-कभी बंदूकों के साथ जवानों पर टूट पड़ते हैं। ऐसे में, आत्मरक्षा और देश की सीमा की हिफाजत के लिए बल प्रयोग करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि ड्यूटी है। लेकिन, बांग्लादेश का एक खास वर्ग हमेशा इस कानूनी कार्रवाई को ‘मानवाधिकार’ का जामा पहनाकर भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है।

अब जब ढाका के अपने गृह मंत्री ने ही इस सच्चाई पर मुहर लगा दी है, तो वहां की मानवाधिकार लॉबी और पत्रकार बिरादरी में खलबली मचना लाजिमी है। प्रसिद्ध पत्रकार जन्नतुल नईम ने तो इसे ‘ऑफिशियल डॉक्ट्रिन’ तक करार दे दिया है। उन्होंने अपने लेखों के जरिए ये सवाल उठाए हैं कि क्या अब बांग्लादेश ने भारत की पूरी सुरक्षा नीति को आधिकारिक तौर पर अपना लिया है? यह सवाल ढाका की सियासत में आग की तरह फैल चुका है।

7 जून की बैठक: अब क्या होगा?

सबसे ज्यादा चर्चा इस बयान की टाइमिंग को लेकर है। 7 जून को दिल्ली में BSF और BGB के टॉप कमांडर्स की हाई-लेवल मीटिंग होने वाली है। सालों से इस मीटिंग की एक तय स्क्रिप्ट होती थी—बांग्लादेशी अधिकारी आते थे, फाइलें खोलते थे और भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करते थे। लेकिन इस बार पूरा सीन बदल चुका है। सोचिए, जब टेबल पर बॉर्डर किलिंग का मुद्दा उठेगा, तो भारतीय अधिकारी बहुत ही कूल और कॉन्फिडेंट अंदाज में कहेंगे कि आपके अपने गृह मंत्री ने तो खुद माना है कि अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करना बॉर्डर किलिंग नहीं है। यह जवाब ही काफी है। इस एक बयान ने भारतीय कूटनीति को एक ऐसी ढाल दे दी है, जिसे तोड़ना अब नामुमकिन है।

राजनीतिक टूलकिट की विफलता

बांग्लादेश की राजनीति में ‘बॉर्डर किलिंग’ का मुद्दा ठीक वैसे ही इस्तेमाल किया जाता रहा है, जैसे पाकिस्तान कश्मीर का रोना रोता है। अपनी नाकामियों, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से अवाम का ध्यान भटकाने के लिए यह एक ‘रेडिमेड टूलकिट’ था। लेकिन गृह मंत्री के इस बयान ने उस पूरी टूलकिट को पंचर कर दिया है। अब ढाका के लिए ये बहुत बड़ी सिरदर्दी बन चुका है कि वो इस बयान को डिफेंड करें या इसका खंडन करें। अगर डिफेंड करते हैं तो अपनी जनता के निशाने पर आएंगे, और अगर खंडन करते हैं तो भारत के साथ कूटनीतिक रिश्तों में खटास आने का डर है। यह एक ऐसी सिचुएशन है जहां से निकलना ढाका के रणनीतिकारों के लिए आसान नहीं है।

सच की जीत

सरहदें सिर्फ कागज की लकीरें नहीं होतीं, ये संप्रभु राष्ट्र की सुरक्षा का कवच होती हैं। भारत ने हमेशा साफ रखा है कि हम विकास और भाईचारे के साथ हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की आती है, तो हम कभी समझौता नहीं करते। जो लीगल है उसे पूरा सम्मान, और जो इल्लीगल है, उसके साथ सख्ती से ही निपटा जाएगा। गृह मंत्री सलाहाउद्दीन का बयान सिर्फ एक कबूलनामा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक वास्तविकता का प्रमाण है। यह साफ है कि जब आप अपने स्टैंड पर मजबूती के साथ टिके रहते हैं, तो सामने वाले को अपनी हकीकत कबूलनी ही पड़ती है। आने वाले वक्त में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ढाका इस नई वास्तविकता को पूरी तरह स्वीकार करता है या फिर से पुराने प्रोपेगेंडा की तरफ लौटता है। एक बात तो तय है—भारत की सुरक्षा नीति को अब कोई भी ‘विक्टिम कार्ड’ के जरिए झुका नहीं सकता।

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