क्या एक फोन कॉल ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सत्तर साल पुरानी दोस्ती को रातों-रात मलबे में तब्दील कर दिया है? दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने डोनाल्ड ट्रम्प को मुंह पर ऐसा क्या जवाब दे दिया कि तिलमिलाए अमेरिका ने एशिया से अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच ही खींच लिया? पर्दे के पीछे ऐसा कौन सा खेल चल रहा है जिसने अमेरिका को अपने ही सबसे भरोसेमंद दोस्तों के साथ गद्दारी करने पर मजबूर कर दिया है? आखिर किम जोंग उन ने कौन सी खौफनाक हाई-टेक वॉर-टेक्नोलॉजी सीख ली है कि सुपरपावर अमेरिका की रातों की नींद उड़ चुकी है और वो जापान-दक्षिण कोरिया के मैदान से भागने को मजबूर हो गया है? और सबसे बड़ा सवाल, जो किम जोंग उन रोज सुबह उठकर अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया को परमाणु बम से नेस्तनाबूद करने की धमकियां देता है, आखिर वो भारत का नाम आते ही गूंगा क्यों हो जाता है? आज तक उसने भारत के खिलाफ एक शब्द क्यों नहीं बोला? जब अमेरिका ने धोखा दिया, तो दुनिया के सबसे बड़े टेक और मिलिट्री जायंट्स जापान और दक्षिण कोरिया ने रातों-रात नई दिल्ली का दरवाजा क्यों खटखटाया? भारतीय नौसेना और कोचीन शिपयार्ड के बंद कमरों में ऐसा क्या पक रहा है, जिसने एशिया के पावर गेम को पूरी तरह पलट कर रख दिया है?
द मिस्ट्री बिहाइंड द कूटनीतिक भूकम्प
दुनिया के नक्शे पर इस वक्त जो कुछ घटित हो रहा है, वह किसी हॉलीवुड थ्रिलर या कोल्ड वॉर की खुफिया पटकथा से कम नहीं है। अगस्त दो हजार छब्बीस का महीना चल रहा है और कोरियाई प्रायद्वीप में हर साल की तरह तनाव अपने चरम पर है। दक्षिण कोरिया और अमेरिका दशकों पुरानी अपनी रक्षा संधि के तहत उल्ची फ्रीडम शील्ड नामक संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू कर रहे हैं। इस महा-अभ्यास में अठारह हजार से अधिक दक्षिण कोरियाई सैनिकों के साथ अमेरिकी सेनाएं और यूनाइटेड नेशंस कमान के ग्यारह देशों के जवान शामिल होने वाले हैं। इसका इकलौता मकसद उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग उन के लगातार बढ़ते मिसाइल और सैन्य खतरे को काउंटर करना है। यह कोई आम मिलिट्री ड्रिल नहीं है, बल्कि एक ऐसा शक्ति प्रदर्शन है जिसे देखकर प्योंगयांग की सत्ता हमेशा कांपती रही है।
लेकिन अचानक वाशिंगटन के ओवल ऑफिस से एक ऐसा कूटनीतिक बम गिरता है, जिसने सियोल से लेकर टोक्यो, ताइवान और कैनबरा तक की नींव हिला दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, पेंटागन के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को स्पष्ट आदेश देते हैं कि दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यासों को काफी सीमित कर दिया जाए। कारण क्या बताया गया? ट्रम्प के मुताबिक, ये अभ्यास उत्तर कोरिया के लिए अनुचित और शत्रुतापूर्ण हैं, और किम जोंग उन उनके बहुत अच्छे दोस्त हैं। यह बयान आते ही पूरी दुनिया के डिफेंस एक्सपर्ट्स सन्न रह गए। जिस किम जोंग उन ने अभी कुछ ही दिन पहले बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण करके पूरे इलाके में दहशत फैला दी थी, उसे अमेरिका का राष्ट्रपति अपना दोस्त बता रहा है और अपने ही सबसे पुराने साथी दक्षिण कोरिया की पीठ में छुरा घोंप रहा है।
ईरान का वो फोन कॉल और ट्रम्प का ईगो
लेकिन जिओपॉलिटिक्स में कभी भी वह सच नहीं होता जो माइक पर बोला जाता है। परदे के पीछे की कहानी इससे कहीं ज्यादा गहरी, व्यापारिक और खौफनाक है। ट्रम्प की इस नाराजगी की असली जड़ यह है कि दक्षिण कोरिया के नेतृत्व ने ईरान के मामले में अमेरिका का साथ देने से साफ इनकार कर दिया। ट्रम्प ने खुद इस बात को कबूल किया है कि उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति को फोन किया था और उनसे पूछा था कि क्या वे ईरान के मामले में अमेरिकी सेना की मदद करेंगे। इस पर दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ने बेहद ठंडे और स्पष्ट लहजे में जवाब दिया, नो थैंक्स। बस इसी एक जवाब ने ट्रम्प के ईगो को बुरी तरह हर्ट कर दिया। ट्रम्प का सीधा तर्क है कि जब दक्षिण कोरिया, ईरान के लिए अपनी सेना नहीं भेज सकता, तो अमेरिका, दक्षिण कोरिया की सुरक्षा पर अपने अरबों डॉलर क्यों फूंके? ट्रम्प ने यहां तक कह दिया कि उनके उनतालीस हजार सैनिक दक्षिण कोरिया को किम जोंग उन से बचा रहे हैं, और बदले में दक्षिण कोरिया उनका साथ नहीं दे रहा।
यह सिर्फ एक सैन्य अभ्यास को रद्द करने या कम करने की घटना नहीं है। यह प्रशांत महासागर की उस पूरी सुरक्षा वास्तुकला के दरकने का ऐलान है, जिसे अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अपने खून और डॉलर से सींचा था। लेकिन असल हकीकत यह है कि दक्षिण कोरिया कोई मुफ्तखोर देश नहीं है। आंकड़े गवाह हैं कि दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा की भारी कीमत चुकाता है। दो हजार छब्बीस से दो हजार तीस के लिए हाल ही में हुए बारहवें स्पेशल मेजर्स एग्रीमेंट के तहत, दक्षिण कोरिया दो हजार छब्बीस में एक दशमलव पांच दो ट्रिलियन वॉन यानी लगभग एक दशमलव एक तीन बिलियन यूएसडी का सीधा भुगतान कर रहा है, जो पिछले साल के मुकाबले आठ दशमलव तीन प्रतिशत अधिक है। दक्षिण कोरिया वहां तैनात अमेरिकी सेना के स्थानीय कर्मचारियों के वेतन, सैन्य ठिकानों के निर्माण और लॉजिस्टिक्स का पूरा खर्चा अपने कंधों पर उठाता है। इसके अलावा दक्षिण कोरिया अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मिडिल ईस्ट पर गहराई से निर्भर है। वह ईरान के साथ किसी सीधे सैन्य टकराव में पड़कर अपनी अर्थव्यवस्था का गला नहीं घोटना चाहता। यह एक संप्रभु राष्ट्र का अपनी विदेश नीति तय करने का बुनियादी अधिकार है।
उत्तर कोरिया का खतरनाक 2.0 वर्जन
लेकिन अमेरिका का रवैया अब पूरी तरह से ट्रांजैक्शनल यानी विशुद्ध व्यापारिक हो चुका है। ट्रम्प प्रशासन को लगता है कि हर सुरक्षा गारंटी की एक कीमत होनी चाहिए। और इसी स्वार्थी रवैये ने दुनिया को एक बहुत बड़े खतरे में डाल दिया है। जब डोनाल्ड ट्रम्प, किम जोंग उन के साथ अपनी पुरानी तस्वीरें साझा करते हुए अठारह और उन्नीस के सिंगापुर और पंजमुंजोम शिखर सम्मेलनों की यादों में खोए हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर कोरियाई सेना आधुनिक युद्धकला के सबसे घातक गुर सीख रही है। यह वो पुराना उत्तर कोरिया नहीं है, जो केवल बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण करके दुनिया को ब्लैकमेल करता था। यह दो दशमलव शून्य वर्जन का उत्तर कोरिया है, जिसे रूस के साथ हुए रणनीतिक गठबंधन ने एक खूंखार सैन्य मशीन में बदल दिया है।
खुफिया और सैन्य आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। अक्टूबर दो हजार चौबीस से ही उत्तर कोरियाई सेना की टुकड़ियां रूस पहुंचना शुरू हो गई थीं। अप्रैल दो हजार पच्चीस तक यह आधिकारिक तौर पर स्पष्ट हो गया कि उत्तर कोरिया की एलीट स्पेशल फोर्सेस सहित करीब बारह हजार सैनिक रूस के कुर्स्क क्षेत्र में यूक्रेनी सेनाओं के खिलाफ सीधी जंग लड़ रहे हैं। और अगस्त दो हजार छब्बीस के ताज़ा और सत्यापित खुफिया इनपुट्स के मुताबिक, उत्तर कोरिया की एक सौ बारहवीं मिसाइल ब्रिगेड के नब्बे से ज्यादा सैनिक रूस के वोरोनेल इलाके में तैनात हैं, जो छह लॉन्चरों से एक सौ बीस अत्याधुनिक बैलिस्टिक मिसाइलें ऑपरेट कर रहे हैं। इन सैनिकों को रूस की ओर से प्रति माह लगभग दो हजार यूएसडी का वेतन मिल रहा है।
उत्तर कोरियाई समाज और अर्थव्यवस्था के मानकों के हिसाब से यह रकम एक सपने जैसी है, लेकिन प्योंगयांग का असली मकसद पैसा कमाना नहीं है। असली मकसद है रियल कॉम्बैट एक्सपीरियंस हासिल करना। आज के युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध की तरह सिर्फ टैंकों और तोपों से नहीं लड़े जा रहे। आज का युद्ध यूएवी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, जीपीएस जैमिंग और सटीक साइबर हमलों का खेल है। उत्तर कोरियाई सैनिक यह सब यूक्रेन के कीचड़ और बर्फ से भरे मैदानों में सीखकर वापस प्योंगयांग लौट रहे हैं। अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई सैन्य कमांडर इस बात को लेकर खौफ में हैं कि जिस उत्तर कोरियाई सेना के पास दशकों से आधुनिक युद्ध का कोई वास्तविक अनुभव नहीं था, वह अब रूस की मदद से हाई-टेक और हाइब्रिड वॉरफेयर में पारंगत हो चुकी है।
अमेरिका का आइसोलेशनिज़्म और जी2 थ्योरी
और ठीक ऐसे वक्त में, जब उत्तर कोरिया अपने इतिहास में सबसे ज्यादा खतरनाक और सक्षम हो चुका है, डोनाल्ड ट्रम्प का दक्षिण कोरिया से अपना सुरक्षा कवच पीछे खींचना, एक सुसाइडल कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में एक पुरानी लेकिन बेहद खतरनाक थ्योरी फिर से जीवित हो उठती है, जिसे जीटू यानी ग्रुप ऑफ टू कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां अमेरिका और चीन आपस में गुप्त सहमति बना लें और पूरी दुनिया को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांट लें। सरल शब्दों में, तुम मेरे पश्चिमी गोलार्ध में दखल मत दो, मैं तुम्हारे एशियाई प्रभाव में दखल नहीं दूंगा। अमेरिका के नीति-निर्माताओं का एक बड़ा धड़ा अब यह मानने लगा है कि अमेरिका को सुदूर एशिया के झगड़ों में अपना खून बहाने की कोई जरूरत नहीं है।
अगर चीन, ताइवान को निगलता है, या साउथ चाइना सी पर पूरी तरह कब्जा कर लेता है, तो यह अमेरिका की सीधी समस्या नहीं होनी चाहिए, जब तक कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसके व्यापारिक मार्ग सुरक्षित हैं। डोनाल्ड ट्रम्प का किम जोंग उन की तरफ बार-बार दोस्ती का हाथ बढ़ाना और उन्नीस सौ त्रेपन की म्यूचुअल डिफेंस ट्रीटी से बंधे दक्षिण कोरिया जैसे वफादार साथी को सार्वजनिक रूप से झिड़कना, इसी आइसोलेशनिस्ट मानसिकता का ज्वलंत प्रमाण है। ट्रम्प प्रशासन शायद यह भ्रम पाले हुए है कि उत्तर कोरिया अंततः चीन के इशारों पर नाचता है, और अगर किम जोंग उन के साथ एक व्यक्तिगत डील कर ली जाए, तो अमेरिका कोरियाई प्रायद्वीप की स्थायी सिरदर्दी से हमेशा के लिए बच सकता है।
लेकिन यह एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल है। किम जोंग उन किसी का मोहरा नहीं है। रूस के साथ हुए हालिया सैन्य समझौतों ने प्योंगयांग को बीजिंग की परछाई से भी बाहर निकाल दिया है। अब किम के पास व्लादिमीर पुतिन का खुला बैकअप है। अमेरिका के इस स्वार्थी रवैये ने प्रशांत महासागर के देशों में हड़कंप मचा दिया है। फिलीपींस, वियतनाम, जापान और ताइवान, ये सभी देश समझ गए हैं कि जिस अमेरिका ने ईरान के एक छोटे से कूटनीतिक मुद्दे पर दक्षिण कोरिया को सैन्य अभ्यासों में अकेला छोड़ दिया, वह ताइवान पर चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के वास्तविक हमले के वक्त अपनी पैसिफिक फ्लीट क्यों भेजेगा?
क्यों याद आ रहा है भारत?
और जब एक पुरानी महाशक्ति अपने कदम पीछे खींचती है, तो एक भू-राजनीतिक वैक्यूम पैदा होता है। प्रकृति की तरह, जिओपॉलिटिक्स भी कभी खालीपन को बर्दाश्त नहीं करती। अमेरिका की इस अस्थिर, ट्रांजैक्शनल और गैर-भरोसेमंद नीतियों ने जापान और दक्षिण कोरिया जैसे तकनीकी और आर्थिक दिग्गजों को एक नया ठिकाना खोजने पर मजबूर कर दिया है। और वह ठिकाना है भारत। आखिर क्यों अचानक दक्षिण कोरिया और जापान को अमेरिका से मोहभंग होने के बाद भारत की याद आने लगी है? इसका जवाब अर्थशास्त्र, कूटनीतिक स्वायत्तता और सैन्य शक्ति के त्रिकोण में छिपा है।
जापान और दक्षिण कोरिया दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं कि अमेरिका के सुरक्षा कवच के बिना वे चीन की विस्तारवादी नीतियों और उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों के बीच सैंडविच बनकर रह जाएंगे। उन्हें एक ऐसे रणनीतिक साझीदार की सख्त जरूरत है, जिसकी अपनी एक स्वतंत्र और मजबूत विदेश नीति हो, जिसकी सेना में चीन की आंखों में आंखें डालकर बात करने का माद्दा हो, और जो अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर उनका एक सुरक्षित और विशाल मैन्युफैक्चरिंग बेस बन सके। भारत इन सभी पैमानों पर न केवल खरा उतरता है, बल्कि दुनिया में इकलौता विकल्प बनकर उभरता है।
भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह किसी के दबाव में नहीं आता। यूक्रेन युद्ध के चरम पर, जब पूरे पश्चिमी जगत ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, भारत ने अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया। दक्षिण कोरिया और जापान ने नई दिल्ली की इस कूटनीतिक रीढ़ को बहुत बारीकी से परखा है। सैन्य शक्ति की बात करें तो डोकलाम और गलवान वैली में भारतीय सेना ने जिस तरह चीनी सेना का डटकर मुकाबला किया और उन्हें पीछे धकेला, उसने पूरे एशिया को एक मूक संदेश दिया है कि भारत इकलौता ऐसा एशियाई देश है, जो चीन के सामने घुटने नहीं टेकता।
रक्षा और तकनीक का नया गठबंधन
आर्थिक मोर्चे पर भी भारत और दक्षिण कोरिया के बीच का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से छलांग लगा रहा है। वित्तीय वर्ष दो हजार छब्बीस में, यह अट्ठारह दशमलव तीन पांच बिलियन यूएसडी को पार कर गया। दोनों देशों ने इसे और आगे ले जाने का लक्ष्य रखा है। रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में यह दोस्ती एक नए मुकाम पर पहुंच चुकी है। दक्षिण कोरिया की कंपनी हानह्वा और भारत की एलएंडटी मिलकर भारतीय सेना के लिए के-नाइन वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर तोपें बना रही हैं।
इससे भी बड़ा रणनीतिक कदम उठाया गया, जब भारत के कोचीन शिपयार्ड ने दक्षिण कोरिया की एचडी कोरिया शिपबिल्डिंग के साथ एक बड़ा दीर्घकालिक समझौता किया। यह सिर्फ जहाज बनाने का सौदा नहीं है, बल्कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत को काउंटर करने की एक साझी तैयारी है। दूसरी तरफ, जापान तो भारत के साथ टू प्लस टू डायलॉग और मालाबार नौसैनिक अभ्यास के जरिए अपने रक्षा संबंधों को पहले ही बहुत ऊपर ले जा चुका है। जापान जानता है कि अगर स्ट्रेट ऑफ मलक्का से गुजरने वाला उसका तेल कभी चीन ने रोकने की कोशिश की, तो केवल भारतीय नौसेना ही अंडमान निकोबार कमांड से उस चोकपॉइंट को सुरक्षित कर सकती है।
किम जोंग उन का रहस्य और भारत
अब आते हैं इस पूरी भू-राजनीतिक बिसात के सबसे चौंकाने वाले और रहस्यमयी तथ्य पर। उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन, जो हर दूसरे दिन अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान को परमाणु हमले से राख में मिला देने की धमकियां देता है, उसने आज तक भारत के खिलाफ कभी एक भी कड़वा या उकसावे वाला शब्द नहीं बोला। यह तथ्य इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि भारत, क्वाड का एक बेहद मजबूत और सक्रिय सदस्य है। यह वही क्वाड है, जिसे चीन एशियाई नाटो कहकर खारिज करता है और उत्तर कोरिया इसे अपने वजूद के लिए सीधा खतरा मानता है।
इसके पीछे कई बहुत गहरी और ऐतिहासिक कूटनीतिक वजहें हैं। पहला है ऐतिहासिक और मानवीय कर्ज। उन्नीस सौ पचास से त्रेपन के कोरियन वॉर के दौरान, जब पूरी दुनिया दो फाड़ हो चुकी थी, तब भारत ने युद्ध के मैदान में अपनी कोई लड़ाकू सेना नहीं भेजी थी। इसके बजाय, भारत ने साठवीं पैराशूट फील्ड एम्बुलेंस नाम की एक विशिष्ट मेडिकल यूनिट भेजी थी। इस यूनिट ने बिना किसी भेदभाव के युद्ध में घायल हुए दोनों पक्षों के हजारों सैनिकों और नागरिकों का इलाज किया था। कड़ाके की ठंड और बमबारी के बीच भारतीय डॉक्टरों ने जो इंसानियत दिखाई थी, उसे उत्तर कोरिया आज भी भूला नहीं है।
दूसरा बड़ा कारण है रिजीम चेंज नीति का अभाव। किम जोंग उन अच्छी तरह जानता है कि अमेरिका का इतिहास रहा है कि उसने इराक, लीबिया और अन्य जगहों पर तानाशाहों को उखाड़ फेंका। किम का परमाणु कार्यक्रम दरअसल इसी पैरानोइया की उपज है। लेकिन वह यह भी जानता है कि भारत की विदेश नीति नॉन-इंटरफेरेंस पर आधारित है। भारत कभी भी किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देकर वहां सत्ता परिवर्तन नहीं करवाता। तीसरा और सबसे अहम कारण है भारत की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी का लोहा। किम जोंग उन और उसके रणनीतिकार इस बात को भली-भांति समझते हैं कि भारत, क्वाड का सदस्य होने के बावजूद अमेरिका का कोई अंधा अनुयायी नहीं है।
निष्कर्ष: विश्वमित्र से नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर तक
डोनाल्ड ट्रम्प की किम जोंग उन के प्रति यह तथाकथित दोस्ती और दक्षिण कोरिया के प्रति बदले की भावना, दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। अमेरिका, जो कभी फ्री वर्ल्ड का मसीहा हुआ करता था, आज एक विशुद्ध व्यापारी बन चुका है। वह अपनी ही रक्षा संधियों और वादों को मोल-भाव के तराजू पर तौल रहा है। लेकिन इस पूरी उथल-पुथल का सबसे बड़ा और सकारात्मक परिणाम यह हुआ है कि भारत एक विश्वमित्र की छवि से आगे बढ़कर अब नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर की भूमिका की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
दक्षिण चाइना सी के देश अब भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें खरीद रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि संकट के समय अमेरिकी बेड़े का इंतजार करना बेवकूफी होगी। जब चीन आक्रामक होगा, तब उन्हें वो हथियार चाहिए जो बिना किसी अमेरिकी परमिशन के फायर किए जा सकें, और भारत वह हथियार उन्हें दे रहा है। प्रशांत महासागर और हिंद महासागर की लहरों में अब जो नई भू-राजनीतिक सुबह हो रही है, उसकी दिशा वाशिंगटन के ओवल ऑफिस से नहीं, बल्कि नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक से तय हो रही है। भारत अब सिर्फ एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं है, बल्कि वह गुरुत्वाकर्षण का वह नया केंद्र बन चुका है जिसके चारों ओर अब एशिया की नई सुरक्षा और कूटनीति की कक्षाएं घूमेंगी।





