सोमनाथ की राख से विकसित भारत का उदय: 75 साल पहले जब सरदार पटेल ने पलटा था इतिहास का पहिया

सोमनाथ की राख से विकसित भारत का उदय: 75 साल पहले जब सरदार पटेल ने पलटा था इतिहास का पहिया

समंदर की लहरें जब गुजरात के तट से टकराती हैं, तो वो सिर्फ शोर नहीं करतीं, बल्कि एक ऐसी दास्तान सुनाती हैं जिसे सदियों तक इतिहास की किताबों में दबाने की कोशिश की गई। ये दास्तान है सोमनाथ की। ये कहानी है उस जिद्दी स्वाभिमान की, जिसे न महमूद गजनी की तलवारें झुका पाईं और न ही अलाउद्दीन खिलजी का खौफ मिटा पाया। आज जब हम सोमनाथ के पुनर्निर्माण की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो हमें समझना होगा कि सोमनाथ महज एक मंदिर नहीं है, बल्कि ये भारत की वो रूह है जिसे बार-बार कुचलने की कोशिश हुई, लेकिन हर बार ये राख से उठकर और भी भव्य होकर सामने खड़ा हुआ।

सोमनाथ का इतिहास भारत के अतीत का वो आईना है जिसमें हमारी सभ्यता का लहू और पसीना दोनों शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्सर इस बात पर जोर दिया है कि सोमनाथ को नष्ट करने के पीछे का मकसद सिर्फ सोना-चांदी लूटना नहीं था। सोचिए, अगर मकसद सिर्फ लूटपाट होता, तो गजनी एक बार आता और चला जाता। लेकिन सोमनाथ पर बार-बार हमले हुए। इसकी पवित्र मूर्ति को अपवित्र किया गया, इसके ढांचे को बार-बार बदला गया। आखिर क्यों? क्योंकि हमलावर जानते थे कि भारत की शक्ति उसके किलों में नहीं, बल्कि उसके मंदिरों और उसकी आस्था में बसती है। वो हमारी पहचान को मिटाना चाहते थे। और अफसोस की बात ये है कि आजादी के बाद भी हमें यही पढ़ाया गया कि ये हमले सिर्फ दौलत के लिए थे। उस नफरत, उस अत्याचार और उस आतंक के असली चेहरे को हमसे दशकों तक छिपाया गया।

सरदार पटेल का संकल्प और नेहरू का विरोध

1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब देश के सामने हजारों चुनौतियां थीं। लेकिन लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जानते थे कि जब तक सोमनाथ फिर से खड़ा नहीं होगा, भारत की आत्मा आजाद नहीं कहलाएगी। उन्होंने प्रण लिया कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस नेक काम में भी अड़चनें डाली गईं? देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस प्रोजेक्ट के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि यह ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ है। जब 11 मई 1951 को मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का समय आया, तो नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को वहां जाने से औपचारिक तौर पर मना किया था।

लेकिन डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल का संकल्प हिमालय की तरह अडिग था। राष्ट्रपति वहां गए और उन्होंने साफ कहा कि सोमनाथ का मंदिर इस बात का प्रतीक है कि निर्माण की शक्ति विनाश की शक्ति से हमेशा बड़ी होती है। आज 75 साल बाद, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो समझ आता है कि वो पल सिर्फ एक मंदिर के उद्घाटन का नहीं था, बल्कि वो आधुनिक भारत की सांस्कृतिक आजादी का पहला दिन था।

मोदी सरकार का ‘विकास भी, विरासत भी’ मॉडल

आज प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत उसी सोमनाथ वाली भावना को आगे बढ़ा रहा है। पिछले दस सालों में हमने जो देखा, वो किसी चमत्कार से कम नहीं है। काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प हो या उज्जैन में महाकाल लोक की भव्यता, केदारनाथ का पुनर्जीवन हो या फिर अयोध्या में 500 वर्षों के इंतजार के बाद प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण—यह सब उसी कड़ी का हिस्सा है। ये सिर्फ धार्मिक काम नहीं हैं, बल्कि ये भारत की इकोनॉमी के नए इंजन हैं। आज इन केंद्रों पर करोड़ों टूरिस्ट आ रहे हैं, जिससे लोकल लोगों को रोजगार मिल रहा है, होटल इंडस्ट्री चमक रही है और छोटे-छोटे दुकानदारों का बिजनेस बढ़ रहा है। यही तो है ‘विकास भी और विरासत भी’।

पीएम मोदी का ‘विकसित भारत 2047’ का मिशन इसी सांस्कृतिक नींव पर टिका है। एक ऐसा भारत जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो, लेकिन जिसकी नजरें आसमान पर हों। आज दुनिया भारत को सिर्फ एक मार्केट के तौर पर नहीं, बल्कि एक विश्व गुरु के तौर पर देख रही है। 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई, तो पहला बड़ा बदलाव हमारे कॉन्फिडेंस में आया। संयुक्त राष्ट्र में जब भारत ने योग दिवस का प्रस्ताव रखा, तो रिकॉर्ड 175 देशों ने उसका समर्थन किया। आज योग सिर्फ एक्सरसाइज नहीं, बल्कि एक ग्लोबल वेलनेस ब्रांड बन चुका है।

ग्लोबल मार्केट में भारतीय संस्कृति का डंका

भारत अब सिर्फ सामान एक्सपोर्ट नहीं कर रहा, बल्कि अपनी नॉलेज और अपनी परंपराओं को भी ग्लोबल बना रहा है। हाल ही में न्यूजीलैंड के साथ जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) हुआ है, वो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस समझौते में खास तौर पर आयुष डॉक्टर्स और योग प्रशिक्षकों के लिए कोटा तय किया गया है। यानी अब हमारे ट्रेडिशनल हीलर्स और योग गुरु न्यूजीलैंड जाकर काम कर पाएंगे। यही नहीं, ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन और ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली डील्स में भी हमारी संस्कृति और ज्ञान आधारित प्रोफेशनल्स को अहमियत दी जा रही है।

भारत के कारीगरों, किसानों और स्टार्टअप्स के लिए आज दुनिया के दरवाजे खुल रहे हैं। ये सब इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि आज की सरकार को अपनी विरासत पर शर्म नहीं, बल्कि गर्व है। हम डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर हो रहे हैं, स्पेस में झंडे गाड़ रहे हैं और साथ ही अपनी धरोहरों को भी संजो रहे हैं।

सुरक्षा की चुनौतियां और ‘नया भारत’

लेकिन ये सफर इतना आसान भी नहीं है। जैसे सोमनाथ को निशाना बनाया गया था, वैसे ही आज भी कुछ कट्टरपंथी ताकतें भारत की इस तरक्की और एकता से चिढ़ी हुई हैं। सीमा पार बैठे आका आतंकवाद और घुसपैठ के जरिए हमारी शांति को भंग करना चाहते हैं। लेकिन ये 1947 या 1990 वाला भारत नहीं है। ये प्रधानमंत्री मोदी का ‘नया भारत’ है, जो घर में घुसकर मारना जानता है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे मिशनों के जरिए हमने साफ मैसेज दे दिया है कि अगर हमारी विरासत या हमारी सुरक्षा पर आंच आई, तो अंजाम बहुत बुरा होगा।

सोमनाथ की कहानी असल में राजनीति से बहुत ऊपर है। यह उस सभ्यता की कहानी है जिसने कभी हार नहीं मानी। ये उस जज्बे की कहानी है जिसने खंडहरों से महल खड़े कर दिए। आज जब भारत अपनी आजादी के 100वें साल की ओर बढ़ रहा है, तो सोमनाथ का वो शिखर हमें याद दिलाता है कि हम कौन हैं और हमें कहां जाना है।

निष्कर्ष: सोमनाथ से विकसित भारत तक

अंत में, पीयूष गोयल की कही वो बात सबसे सटीक बैठती है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत के गौरव की वापसी का वो टर्निंग पॉइंट था, जिसने हमें सिखाया कि अपनी पहचान के लिए लड़ना और उसे संवारना ही राष्ट्र निर्माण है। सोमनाथ आज सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक है। जो लोग कहते थे कि भारत कभी उठ नहीं पाएगा, उन्हें आज का सोमनाथ और आज का भारत देख लेना चाहिए।

हम बढ़ रहे हैं, हम बदल रहे हैं, और हम अपनी विरासत को साथ लेकर एक ऐसे भविष्य की ओर जा रहे हैं जहां भारत फिर से जगत गुरु बनेगा। सोमनाथ का वो दिया जो 75 साल पहले जला था, आज पूरे विश्व को रास्ता दिखा रहा है। विकसित भारत का सपना अब हकीकत बनने की राह पर है, क्योंकि हमारे पास सोमनाथ जैसा इतिहास है और मोदी जैसा संकल्प।

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