बंगाल में सत्ता पलटते ही उल्टे पांव भागे घुसपैठिये, हकीमपुर बॉर्डर पर मची भारी भगदड़

बंगाल में सत्ता पलटते ही उल्टे पांव भागे घुसपैठिये, हकीमपुर बॉर्डर पर मची भारी भगदड़

पश्चिम बंगाल का हकीमपुर बॉर्डर। एक तरफ मुस्तैद सुरक्षा फोर्स के जवान, जिनकी आंखों में देश की रक्षा का जुनून है, तो दूसरी तरफ घबराहट में पसीने से तर-बतर हजारों लोगों की भारी भीड़। अपने सिरों पर सामान की गठरियां लादे ये लोग किसी मेले में नहीं जा रहे हैं। ये कोई सामान्य यात्रा भी नहीं है। ये रिवर्स माइग्रेशन है। जी हां, उल्टी गंगा बह रही है। जो लोग कल तक चोरी-छिपे, रात के घने अंधेरे में बॉर्डर की तारबंदी काटकर या दलालों को पैसे खिलाकर भारत में घुसे थे, आज वो दिन के उजाले में खुद गिड़गिड़ा रहे हैं कि उन्हें किसी भी तरह वापस बांग्लादेश जाने दिया जाए। सालों तक जो लोग कोलकाता के आलीशान रिहायशी इलाकों में, न्यू टाउन की गगनचुंबी इमारतों के साये में या केरल के बड़े प्रोजेक्ट्स में ‘भारतीय’ बनकर घूम रहे थे, आज उनकी पोल पूरी तरह से खुल चुकी है।

सत्ता का गियर बदलते ही पश्चिम बंगाल की जमीन पर वो हुआ है, जिसकी कल्पना इस खौफनाक सिंडिकेट को चलाने वालों ने अपने सबसे बुरे सपने में भी नहीं की होगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के एक सख्त और बिना किसी रहम वाले आदेश ने उस पूरे ईको-सिस्टम की जड़ें हिला कर रख दी हैं, जो पिछले डेढ़ दशक से भारत की छाती पर फल-फूल रहा था। लेकिन एक सवाल है जो अभी भी हर सच्चे हिंदुस्तानी के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा है। आखिर पूर्व सरकार के शासनकाल में ये घुसपैठिये 15-15 साल तक भारत के अंदर कैसे छिपे बैठे रहे? कैसे सिर्फ कुछ हजार रुपये देकर ये लोग भारत में बेखौफ घुस आए और एक पूरा का पूरा राजनीतिक तंत्र इन्हें अपनी पनाह देता रहा? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि हकीमपुर बॉर्डर पर रुके इन लोगों ने घुसपैठ का ऐसा क्या खौफनाक सच उगल दिया है, जिसने हमारी सुरक्षा एजेंसियों की नींदें उड़ा दी हैं? आज हम आपको उस अदृश्य और जहरीले नेटवर्क की असलियत बताएंगे, जो जमीन के नीचे-नीचे कैंसर की तरह पूरे देश में फैल चुका था।

डिटेंशन सेंटर का खौफ और सिंडिकेट का पतन

शुरुआत करते हैं सीधे ग्राउंड जीरो से। मुर्शिदाबाद और मालदा। ये बंगाल के वो संवेदनशील जिले हैं जिनकी सीमाएं हमेशा से घुसपैठियों के लिए रेड कार्पेट का काम करती रही हैं। लेकिन अब यहीं पर सरकार ने दो बड़े डिटेंशन सेंटर यानी हिरासत केंद्र खोल दिए हैं। हिरासत केंद्र का सीधा सा मतलब उन सुरक्षित जेलों से है, जहां अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों को पकड़कर रखा जाता है, ताकि वो देश में किसी और राज्य में छिपने के लिए न भाग सकें। जैसे ही इन सेंटर्स के भारी भरकम दरवाजे खुले और शुरुआत में सिर्फ 16 अवैध घुसपैठियों को पकड़कर इसके अंदर डाला गया, पूरे बंगाल में छिपे हुए अवैध नेटवर्क में हड़कंप मच गया। संदेश बिल्कुल साफ था। अब कोई राजनीतिक छतरी नहीं बचेगी, कोई नेता बचाने नहीं आएगा। इसी खौफ का नतीजा है कि आज हकीमपुर चेक पोस्ट पर बांग्लादेश लौटने वालों की मीलों लंबी कतारें लगी हैं। बीएसएफ के जवान पूरी तरह से हाई अलर्ट मोड पर हैं। हर एक चेहरे की, हर एक दस्तावेज की ऐसी बारीकी से स्कैनिंग हो रही है कि कोई भी फर्जीवाड़ा अब काम नहीं आ रहा।

अब जरा उस कड़वे सच पर आते हैं जो इन लौटते हुए लोगों ने खुद अपने कांपते होंठों से कबूला है। ये कोई ऐसे लोग नहीं हैं जो कल या परसों रास्ता भटक कर भारत आ गए हों। इनमें से ज्यादातर पिछले एक या डेढ़ दशक से हमारे देश के संसाधनों को दीमक की तरह चाट रहे थे। कोलकाता का न्यू टाउन इलाका, जो अपनी चमचमाती बिल्डिंगों, बड़े मॉल्स और मल्टीनेशनल आईटी कंपनियों के लिए जाना जाता है, वहां की झुग्गियों और बस्तियों में ये लोग पूरी तरह से रच-बस गए थे।

खुखुमोनी बीबी और फहीम की कहानी: सिस्टम पर तमाचा

खुखुमोनी बीबी नाम की एक महिला, जो अपने पति और चार बच्चों के साथ हकीमपुर चौकी पर सिर झुकाए खड़ी है, उसकी कहानी हमारे पूरे सिस्टम पर एक जोरदार और करारा तमाचा है। वो मूल रूप से बांग्लादेश के सतखीरा जिले की रहने वाली है, लेकिन पिछले पांच साल से वो बेखौफ होकर कोलकाता के न्यू टाउन में रह रही थी। उसका पति कबाड़ बीनने का काम करता था और वो खुद घरों में कामवाली बाई बनकर घुस चुकी थी। सबसे ज्यादा हैरानी और गुस्से की बात तो ये है कि उसके बच्चे बकायदा कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा और मिड-डे मील जैसी सुविधाओं का फायदा उठा रहे थे। सोचिए, हमारा सिस्टम अंदर से कितना खोखला हो चुका था? एक विदेशी नागरिक, जो अवैध तरीके से सीमा पार करके आता है, वो न सिर्फ यहां बसता है, बल्कि उन सरकारी सुविधाओं पर डाका डालता है जिस पर इस देश के गरीब टैक्सपेयर का हक है। आखिर किसके इशारे पर इन विदेशी बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला मिल गया? वो कौन स्थानीय नेता थे जो इन लोगों को अपना परमानेंट और फिक्स वोट बैंक मानकर इनकी हर गैर-कानूनी हरकत पर बेशर्मी से पर्दा डाल रहे थे?

ये खौफनाक कहानियां सिर्फ कोलकाता या बंगाल तक सीमित नहीं हैं। इस घुसपैठ नेटवर्क की जहरीली जड़े दक्षिण भारत तक पहुंच चुकी थीं। फहीम मालिदा नाम का एक शख्स, जो अब वापसी की कतार में पसीना पोंछ रहा है, उसने चौंकाने वाला खुलासा किया। उसने बताया कि वो आठ महीने पहले बॉर्डर पर एक दलाल को 7 हजार रुपये देकर भारत में घुसा था। मुर्शिदाबाद के जलांगी इलाके से उसने सीमा पार की और ट्रेन पकड़कर सीधा केरल पहुंच गया। आप इस पूरी क्रोनोलॉजी को समझिए। बंगाल में एंट्री और सीधे हजारों किलोमीटर दूर केरल में काम। ऐसा क्यों? क्योंकि केरल में एक राजमिस्त्री को दिन का एक हजार रुपये मिलता है, साथ में एक वक्त का खाना मुफ्त। जबकि बांग्लादेश में यही काम करने पर बमुश्किल 500 टका मिलता है, जो भारतीय मुद्रा में सिर्फ 390 रुपये के बराबर है।

फर्जी पहचान पत्र बनाने की फैक्ट्री

ये सिर्फ रोजगार की तलाश में भटकते हुए गरीबों का मामला नहीं था, बल्कि ये एक पूरा वेल-ऑर्गेनाइज्ड और संगठित व्यापार बन चुका था। बॉर्डर पर मौजूद दलालों का एक ऐसा नेक्सस काम कर रहा था, जिसका सीधा संपर्क बड़े शहरों में बैठे ठेकेदारों से था। 7 हजार रुपये दो, रात के अंधेरे में सीमा पार करो, रातों-रात फर्जी पहचान पत्र बनवाओ और ट्रेन में बैठकर देश के किसी भी कोने में चले जाओ। क्या ये सब बिना किसी बड़े राजनीतिक संरक्षण के संभव था? बिल्कुल नहीं। स्थानीय स्तर पर एक पूरा इकोसिस्टम काम कर रहा था जो इन्हें रातों-रात ‘भारतीय’ बनाने की फैक्ट्री चला रहा था।

उल्टाडांगा इलाके में पिछले 15 साल से रह रहे मुहम्मद सादिक और न्यू टाउन में 15 साल गुजार चुके अब्दुल हसन जैसे लोग इस बात का जीता-जागता और खौफनाक सबूत हैं। 15 साल एक बहुत लंबा अरसा होता है। इतने सालों में इन लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे अपना पूरा साम्राज्य खड़ा कर लिया। राशन, पानी, बिजली, सब्सिडी सब कुछ इन्हें उसी तरह मिल रहा था जैसे एक आम हिंदुस्तानी टैक्सपेयर को मिलता है। बल्कि सच्चाई तो ये है कि कई मामलों में तो ये घुसपैठिये स्थानीय नेताओं के इतने चहेते बन गए थे कि इन्हें असली भारतीय नागरिकों से ज्यादा तवज्जो दी जाने लगी थी। सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की गंदी राजनीति ने हमारे बॉर्डर की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया था।

ये एक खुला रहस्य था कि बंगाल के कुछ खास इलाकों में अवैध एंट्री का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट काम करता था। दलाल सीमा के उस पार से लोगों को लाते, उन्हें सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाते और फिर शुरू होता था असली पहचान बदलने का खेल। फर्जी पतों पर सिम कार्ड खरीदे जाते। कुछ ही दिनों में सरकारी आईडी और पहचान पत्र तैयार हो जाते। और एक बार जब आपके हाथ में वो सरकारी कार्ड आ गया, तो आप आधिकारिक रूप से भारत के नागरिक बन गए। कोई पुलिसवाला, कोई अधिकारी आपसे सवाल नहीं पूछेगा।

प्रशासन का चाबुक और मकान मालिकों में दहशत

लेकिन अब सत्ता बदलते ही ये पूरा भ्रष्ट खेल ताश के पत्तों की तरह ढह गया है। सरकार के सत्ता में आते ही जो सबसे पहला और बड़ा प्रहार हुआ, वो इसी अवैध नेटवर्क की रीढ़ पर था। प्रशासन को सख्त और क्लीयर निर्देश दिए गए कि अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान युद्धस्तर पर की जाए। इसका असर इतना भयंकर हुआ कि जिन मकान मालिकों ने चंद रुपयों के लालच में या सस्ते मजदूरों के चक्कर में इन्हें अपने घरों में पनाह दे रखी थी, वो खुद बुरी तरह डर गए। स्थानीय अधिकारियों और पुलिस की सख्ती को देखकर मकान मालिकों ने इन्हें रातों-रात अपने घरों से बाहर निकालना शुरू कर दिया।

अब हालात ये हैं कि ये घुसपैठिये अपने ही बिछाए जाल में बुरी तरह फंस गए हैं। वापस बांग्लादेश जाने पर इनके सामने सबसे बड़ा संकट रोजी-रोटी का पैदा हो गया है। भारत की मजबूत इकॉनमी और यहां मिलने वाली मोटी दिहाड़ी की लत इन्हें लग चुकी थी। अब वहां जाकर 300-400 रुपये में गुजारा करना इनके लिए नामुमकिन सा हो गया है। उधर, बांग्लादेश की बॉर्डर गार्ड ने भी अपनी गश्त अचानक बढ़ा दी है। उन्हें अब ये डर सता रहा है कि भारत की सख्ती के बाद हजारों-लाखों लोग अचानक उनके देश में घुसेंगे, जिससे वहां एक बहुत बड़ा आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो जाएगा।

असली मगरमच्छ अभी भी अंडरग्राउंड हैं

लेकिन दोस्तो, इस पूरी कहानी में असली और सबसे डरावनी बात तो अभी बाकी है। जो लोग आज हकीमपुर बॉर्डर पर खड़े होकर वापसी की गुहार लगा रहे हैं, ये तो वो छोटी मछलियां हैं जिनके पास भारत में टिके रहने के पुख्ता फर्जी दस्तावेज नहीं बन पाए थे या जो अभी हाल ही में कुछ महीने पहले भारत आए थे। असली खतरा वो बड़े मगरमच्छ हैं जो पिछले बीस सालों से यहां रचे-बसे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों की मानें तो बंगाल के गली-मोहल्लों में अभी भी ऐसे हजारों-लाखों लोग मौजूद हैं, जिनके पास पूरी तरह से वैध दिखने वाले फर्जी दस्तावेज मौजूद हैं। उनके पास इस देश के वो तमाम सरकारी कागजात हैं जो उन्हें कानूनी रूप से बचाने की सबसे बड़ी ढाल बन चुके हैं। ये वो नेटवर्क है जो अब सरकार की सख्ती देखकर पूरी तरह से अंडरग्राउंड हो गया है। क्या ये अंडरग्राउंड नेटवर्क इतनी आसानी से खत्म हो जाएगा? क्या सिर्फ दो डिटेंशन सेंटर खोलने से वो लाखों लोग वापस चले जाएंगे जो इस देश की डेमोग्राफी को बदलने का खतरनाक खेल खेल रहे थे?

पूर्व सरकार पर हमेशा से ये गंभीर आरोप लगते रहे कि उन्होंने सत्ता से चिपके रहने के लिए इस घुसपैठ को न सिर्फ नजरअंदाज किया, बल्कि उसे खाद-पानी देकर पाला-पोसा और बड़ा किया। पिछले शासनकाल में बंगाल, भारत का सबसे बड़ा एंट्री गेट बन गया था। एक ऐसा गेट जहां कोई ताला नहीं था, कोई पहरेदार नहीं था, बस दलाल को उसकी तय फीस दो और अंदर आ जाओ।

आज जब पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाती हुई सड़कों पर घूम रही हैं, जब एक-एक घर की बारीकी से तलाशी हो रही है, तब जाकर इस महा-फर्जीवाड़े की परतें एक-एक करके खुल रही हैं। केरल से लेकर कश्मीर तक, देश के हर कोने में जो अवैध बस्तियां बस गई हैं, उनका रूट इसी बंगाल के बॉर्डर से होकर गुजरता था। ये सिर्फ एक राज्य की समस्या नहीं थी, ये पूरे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ किया गया एक बहुत बड़ा और अक्षम्य खिलवाड़ था। अब आप खुद सोचिए, जिस देश में एक आम भारतीय नागरिक को अपना एक मामूली सा प्रमाण पत्र बनवाने के लिए हफ्तों सरकारी दफ्तरों के धक्के खाने पड़ते हैं, पसीने बहाने पड़ते हैं, वहां दूसरे देश से आए इन विदेशी लोगों को रातों-रात सारी सुविधाएं कैसे मिल जाती थीं? इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है भयंकर करप्शन और वोटबैंक का जहरीला कॉकटेल। स्थानीय स्तर पर वार्ड मेंबर से लेकर ऊपर बैठे रसूखदार नेताओं तक, सबकी जेबें गर्म होती थीं। ये एक बहुत बड़ा इको-सिस्टम था, जहां सस्ते मजदूर चाहने वाले ठेकेदार, वोट चाहने वाले भ्रष्ट नेता और पैसा चाहने वाले दलाल तीनों मिलकर इस देश को दीमक की तरह चाट रहे थे।

लेकिन दोस्तो, अब ये गंदा खेल पूरी तरह खत्म हो चुका है। बंगाल की वर्तमान सरकार ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि रियायत की कोई गुंजाइश नहीं है। जो पकड़ा जाएगा, वो सीधा डिटेंशन सेंटर की सलाखों के पीछे जाएगा। इसी खौफ ने इस ऐतिहासिक रिवर्स माइग्रेशन को जन्म दिया है। लोग अपना सामान बांधकर, अपने बच्चों को लेकर उसी रास्ते से वापस भाग रहे हैं, जिस रास्ते से वो कभी चोरी-छिपे भारत में घुसे थे। भारत अब वो कोई लावारिस धर्मशाला नहीं रहा जहां कोई भी आकर अपना डेरा जमा ले और हमारे संसाधनों पर कब्जा कर ले। सख्त फैसलों का असर जमीन पर साफ दिखने लगा है और हकीमपुर बॉर्डर की ये एक्सक्लूसिव तस्वीरें इसी बदलते हुए नए भारत और नए वक्त की गवाही दे रही हैं।

ये तो बस एक शुरुआत है। जो गंदगी 15-20 सालों में इकट्ठी हुई है, उसे पूरी तरह साफ होने में थोड़ा वक्त जरूर लगेगा। लेकिन जिस तेजी से और जिस आक्रामकता के साथ कार्रवाई हो रही है, उसने इस देश विरोधी सिंडिकेट की कमर तोड़ कर रख दी है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि जो लोग अभी भी फर्जी दस्तावेजों के सहारे बिलों में चूहो की तरह छिपे बैठे हैं, उनका नंबर कब आएगा? क्या हमारी खुफिया एजेंसियां इस सिंडिकेट के असली सरगनाओं तक पहुंच पाएंगी, जो पर्दे के पीछे से करोड़ों रुपये का ये काला खेल चला रहे थे?

दोस्तों, आज जो आपने हकीमपुर बॉर्डर का सच जाना है, वो तो सिर्फ एक छोटी सी झांकी है। देश के अंदर ऐसे कई और बॉर्डर और चेकपोस्ट हैं, जहां से ये खतरनाक खेल अभी भी किसी न किसी रूप में चल रहा होगा। लेकिन आज एक बात पत्थर की लकीर की तरह तय हो चुकी है कि अब कोई भी राजनीतिक संरक्षण देश की सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकता। देश सर्वोपरि है।

तो क्या आपको लगता है कि सिर्फ बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश में ऐसे अवैध नागरिकों की पहचान के लिए एक बहुत बड़ा और सख्त राष्ट्रीय अभियान चलना चाहिए? क्या उन भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को भी सीधा जेल में डालना चाहिए जिन्होंने चंद रुपयों और वोटों के लालच में इन घुसपैठियों के फर्जी कार्ड बनवाए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में बेझिझक जरूर लिखें। और हां, जाने से पहले एक बड़ा सवाल छोड़कर जा रहा हूं—जो लोग आज डिटेंशन सेंटर पहुंच चुके हैं, उनके अंदर क्या चल रहा है? और कैसे उन सेंटर्स के अंदर से भी कुछ बड़े राज बाहर आने वाले हैं, जो कई सफेदपोशों के चेहरे बेनकाब कर देंगे? इस सबसे बड़े खुलासे के लिए इंतजार कीजिए हमारी अगली रिपोर्ट का। जय हिंद! वंदे मातरम!

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