ड्रैगन को तगड़ा झटका:चीन से बोरिया-बिस्तर समेट रहे जापानी बैंक,भारत बना नया इकोनॉमिक बॉस!

ड्रैगन को तगड़ा झटका:चीन से बोरिया-बिस्तर समेट रहे जापानी बैंक,भारत बना नया इकोनॉमिक बॉस!

बीजिंग के सत्ता के गलियारों में इस वक्त एक अजीब सी बेचैनी और घबराहट का माहौल है। ड्रैगन की जिस इकॉनमी के दम पर शी जिनपिंग पूरी दुनिया को आंखें दिखाते थे, आज उसी इकॉनमी की जड़ें अंदर ही अंदर खोखली हो रही हैं। दुनिया भर की बड़ी-बड़ी आर्थिक ताकतें अब चीन का असली चेहरा पहचान चुकी हैं और वहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर एक नए ठिकाने की तलाश में निकल पड़ी हैं। और यह नया ठिकाना कोई और नहीं, बल्कि हमारा अपना देश, भारत है। जी हां, एशिया की पूरी की पूरी जियोपॉलिटिक्स और इकॉनमी की तस्वीर अब हमेशा के लिए बदलने वाली है। दशकों तक चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को पैसे से सींचने वाले जापानी बैंकों ने अब चीन से किनारा कर लिया है। जापान ने एक ऐसा साइलेंट और वजनदार मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिसने चीन की नींद उड़ा दी है। जापान का सारा का सारा फोकस, सारा का सारा पैसा अब भारत और साउथ-ईस्ट एशिया की तरफ शिफ्ट हो रहा है। आखिर चीन में ऐसा क्या हुआ कि जापानी बैंकों को वहां से भागना पड़ रहा है? और कैसे जापान का यह पैसा भारत को एशिया का नया सुपरपावर बनाने जा रहा है?

चीन का भ्रम टूटा: जापानी कंपनियों का महा-पलायन

दशकों से जापानी बैंकों की विदेश नीति और एक्सपेंशन स्ट्रेटेजी में चीन का एक बहुत बड़ा दबदबा रहा है। जब चीन ने खुद को ‘फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’ बनाना शुरू किया, तो जापानी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स ने वहां दिल खोलकर पैसा लगाया। जापानी मैन्युफैक्चरर्स ने चीन में फैक्ट्रियां लगाईं, और जापानी बैंकों ने उन फैक्ट्रियों को चलाने के लिए भारी-भरकम फाइनेंसिंग की। पूरी की पूरी सप्लाई चेन को जापानी कैपिटल का सपोर्ट मिला। लेकिन, अब यह पुराना मॉडल पूरी तरह से क्रैश हो चुका है। आज की तारीख में जापानी कंपनियां चीन में धीमी ग्रोथ, आसमान छूती लेबर कॉस्ट और सबसे बढ़कर, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं का सामना कर रही हैं। चीन की सरकार के मनमाने नियम और डिक्टेटरशिप वाले रवैये ने विदेशी कंपनियों का वहां टिकना मुश्किल कर दिया है।

नतीजा यह हुआ है कि जापानी कंपनियां अब चीन में अपने एक्सपोजर का दोबारा आंकलन कर रही हैं। यह सिर्फ एक छोटा-मोटा बदलाव नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़ा स्ट्रेटेजिक रीअलाइनमेंट है। यह हाई-लेवल डिप्लोमेसी और ग्लोबल इकोनॉमिक्स का वो शिफ्ट है, जहां आपका पैसा तय करता है कि भविष्य का लीडर कौन होगा। जापानी बैंकों ने समझ लिया है कि चीन अब डूबता हुआ जहाज है, और समझदारी इसी में है कि समय रहते वहां से निकल लिया जाए।

निक्केई एशिया की रिपोर्ट: चीन के लिए खतरे की घंटी

जापान की प्रतिष्ठित निक्केई एशिया रिपोर्ट ने जो आंकड़े सामने रखे हैं, वो चीन के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं। रिपोर्ट साफ बताती है कि जापानी लोकल और रीजनल बैंक चीन में अपने ऑपरेशंस को बहुत तेजी से सिकोड़ रहे हैं। पिछले पांच सालों में चीन के अंदर जापानी लोकल बैंकों के ब्रांच नेटवर्क में लगभग 20 फीसदी की भारी कमी आ चुकी है। हालांकि, बैंक वहां एक झटके में सब कुछ बंद करके नहीं भाग रहे हैं, लेकिन उनकी फिजिकल प्रेजेंस का लगातार कम होना और अपने रिसोर्सेज को चीन से बाहर निकालना इस बात का पक्का सबूत है कि ड्रैगन पर से दुनिया का भरोसा उठ चुका है।

चीन में काम करने वाले जापानी मैन्युफैक्चरर्स आज वहां बहुत बड़े संकट में हैं। खासकर ऑटोमोटिव सेक्टर यानी गाड़ियों की मैन्युफैक्चरिंग में। चीन की लोकल इलेक्ट्रिक व्हीकल बनाने वाली कंपनियों ने जापानी कंपनियों के लिए एक ऐसा कॉम्पिटिशन खड़ा कर दिया है, जिसे चीनी सरकार की भारी सब्सिडी का सीधा सपोर्ट मिला हुआ है। ऐसे में जापानी ऑटोमेकर्स अपनी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को चीन से निकालकर दूसरे देशों में डायवर्सिफाई करने पर मजबूर हो गए हैं। जब कंपनियां ही चीन छोड़ रही हैं, तो बैंक वहां रुक कर क्या करेंगे?

मेगाबैंकों का एक्शन: चीन में फंडिंग पर लगाई रोक

बात सिर्फ छोटे या रीजनल बैंकों की नहीं है। जापान के सबसे बड़े फाइनेंशियल ग्रुप्स, जिन्हें मेगाबैंक कहा जाता है, उन्होंने भी चीन के खिलाफ एक साइलेंट स्ट्राइक कर दी है। जापान के तीन सबसे बड़े मेगाबैंक—मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप, सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन और मिजुहो फाइनेंशियल ग्रुप—की कॉर्पोरेट लेंडिंग चीन में धड़ाम से नीचे गिरी है। पिछले सिर्फ पांच सालों में इन तीनों विशाल संस्थानों की लोन बुक्स में 40 फीसदी तक की भयानक गिरावट आई है। जरा सोचिए, जो बैंक कभी चीन की कंपनियों को अरबों डॉलर के लोन बांटते थे, आज उन्होंने अपनी तिजोरियों के ताले चीन के लिए बंद कर दिए हैं।

जब आपका विरोधी बिना वजह अपनी सैन्य और कूटनीतिक धमकियां दे रहा हो, तो आपको बस एक ऐसा शांत लेकिन अचूक आर्थिक कदम उठाना होता है, जो उसकी कमर तोड़ दे। जापान ने बिल्कुल यही किया है। चीन जो अपनी दादागिरी के दम पर ताइवान से लेकर साउथ चाइना सी तक अशांति फैला रहा है, उसे यह सबसे बड़ा जवाब है।

भारत बना नया ‘इन्वेस्टमेंट हब’

तो अब सवाल उठता है कि चीन से निकलने वाला यह अरबों-खरबों डॉलर का कैपिटल आखिर जा कहां रहा है? जवाब बहुत सीधा है—नया और आत्मनिर्भर भारत। जापानी बैंक अब तेजी से भारत और सिंगापुर की तरफ अपना रुख कर रहे हैं। जापान के बड़े फाइनेंशियल ग्रुप्स भारत के बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर में अब तक के अपने सबसे बड़े इन्वेस्टमेंट्स कर रहे हैं। यह कोई तुक्का नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया अब भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, प्रधानमंत्री मोदी की स्टेबल लीडरशिप और भारत के विशाल मार्केट पोटेंशियल पर सबसे ज्यादा भरोसा कर रही है।

जापान के रीजनल लेंडर्स जैसे चिबा बैंक और 77 बैंक ने सिंगापुर में अपने नए ऑपरेशनल हब बना लिए हैं। साइक्यो बैंक इंडोनेशिया में अपनी सब्सिडियरी लॉन्च कर रहा है। सिंगापुर जाने का सीधा मतलब यह भी है कि ये बैंक सिंगापुर के रास्ते भारत में ऑपरेट कर रही जापानी कंपनियों और भारतीय क्लाइंट्स को फाइनेंस करेंगे। भारत में जापानी बैंक भले ही सीधे तौर पर गली-गली में अपनी ब्रांच न खोल रहे हों, लेकिन वो बड़े स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और अपने रिप्रेजेंटेटिव ऑफिसेस के जरिए भारत के कॉरपोरेट सेक्टर में भारी पैसा झोंक रहे हैं।

एशिया की बदलती तस्वीर और भारत का डंका

आज भारत का युवा, भारत का कॉरपोरेट सेक्टर और भारत की नीतियां पूरी तरह से ग्लोबल कनेक्टिविटी के साथ सिंक हो चुकी हैं। आज हम सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हम दुनिया के लिए एक ‘लैंड-लिंक्ड’ और ‘इकॉनमी-लिंक्ड’ पावरहाउस बन चुके हैं। जापानी कंपनियों को पता है कि अगर उन्हें नौकरियां देनी हैं, शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लगाने हैं और दुनिया भर के मार्केट को कैप्चर करना है, तो यह सब भारत के मजबूत सपोर्ट सिस्टम के बिना बिल्कुल भी संभव नहीं है।

बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स, हाई-स्पीड रेलवे, अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट—हर जगह जापानी एक्सपर्टीज और जापानी कैपिटल भारत के विकास में एक मजबूत साझीदार बन रही है। चीन का जो पैसा कभी बीजिंग और शंघाई की इमारतें खड़ी करने में लगता था, वो अब मुंबई, दिल्ली, गुजरात और बेंगलुरु के फाइनेंशियल इकोसिस्टम को नई ताकत दे रहा है। यह एशियाई मैन्युफैक्चरिंग और इन्वेस्टमेंट फ्लो का वह ऐतिहासिक बदलाव है, जिसका सबसे बड़ा और मुख्य बेनिफिशियरी हमारा प्यारा भारत है।

चीन ने अपने घमंड, अपनी तानाशाही और अपनी विस्तारवादी नीतियों के चलते अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। जापानी बैंकों का यह शिफ्ट कोई सामान्य साइक्लिकल बदलाव नहीं है। यह ड्रैगन के अंत की शुरुआत है और भारत के सुपरपावर बनने की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग है।

दोस्तो, आपको क्या लगता है? क्या जापान का यह मास्टरस्ट्रोक चीन की इकॉनमी को हमेशा के लिए घुटनों पर ला देगा? और क्या आने वाले वक्त में भारत पूरी तरह से चीन को रिप्लेस करके ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और फाइनेंस का निर्विवाद किंग बन जाएगा? अपनी बेबाक और स्पष्ट राय हमें नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।

You Might Also Like

View More

Latest & Breaking Updates

All Stories
ड्रैगन को तगड़ा झटका:चीन से बोरिया-बिस्तर समेट रहे जापानी बैंक,भारत बना नया इकोनॉमिक बॉस! | Live News Now