डिगबोई की वो अनकही दास्तान: जब भारत के ‘काले सोने’ के दम पर जीता गया दूसरा विश्व युद्ध

डिगबोई की वो अनकही दास्तान: जब भारत के 'काले सोने' के दम पर जीता गया दूसरा विश्व युद्ध

आज जब पूरी दुनिया कच्चे तेल की भयंकर आग में झुलस रही है, मिडिल ईस्ट बारूद के ढेर पर बैठा है, और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के खतरे से वैश्विक अर्थव्यवस्था की सांसें अटकी हुई हैं, तब हर एक भारतीय को अपने अतीत के पन्नों को पलटने की सख्त जरूरत है। जब भारत कच्चे तेल के लिए रूस से लेकर अफ्रीका के जंगलों तक कूटनीतिक और आर्थिक ताकत झोंक रहा है, तब एक ऐसा कड़वा और झकझोर देने वाला सच सामने आता है जिसे सुनकर किसी भी देशभक्त का खून खौल उठेगा। एक ऐसा दौर भी था जब भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दुनिया के सामने हाथ फैलाने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं थी। हमारी अपनी पावन धरती से इतना बेहतरीन क्वालिटी का कच्चा तेल उबल-उबलकर बाहर आ रहा था कि उसे देखकर गोरे अंग्रेज इंजीनियरों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। जब दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था और दुनिया की बड़ी-बड़ी महाशक्तियां ईंधन की एक-एक बूंद के लिए तरस रही थीं, तब ब्रिटिश सेना के बख्तरबंद टैंक, अमेरिकी वायुसेना के लड़ाकू विमान और मित्र राष्ट्रों की पूरी की पूरी खतरनाक युद्धक मशीनरी सिर्फ और सिर्फ इसी भारतीय तेल के दम पर जंग के मैदान में हुंकार भर रही थी। लेकिन फिर अचानक इतिहास के पन्नों से भारत के इस विशाल काले खजाने की दास्तान को गायब क्यों कर दिया गया? क्या अंग्रेज भारत के इस सबसे कीमती खजाने को पूरी तरह से चूसकर खोखला कर गए या फिर आजाद भारत के साथ कोई बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय खेल खेला गया था? इतिहास की इस परत के पीछे एक ऐसा सच दबा है जिसके बारे में आज की पीढ़ी को भनक तक नहीं है।

जब हाथियों के पैरों में लगा ‘काला सोना’

इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाना होगा और चलना होगा भारत के खूबसूरत उत्तर-पूर्वी राज्य असम की तरफ। असम का एक ऐतिहासिक शहर है डिगबोई, जिसे आज भी भारत की तेल राजधानी के रूप में जाना जाता है। यह डिगबोई कोई साधारण शहर नहीं है, बल्कि यह वही जादुई और ऐतिहासिक जगह है जहां उस दौर में जमीन से कच्चा तेल उबल रहा था जब दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देशों को यह अंदाजा तक नहीं था कि जमीन के सीने के नीचे पेट्रोलियम नाम की कोई बला भी मौजूद होती है। इस खजाने की खोज की कहानी भी किसी हॉलीवुड थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। बात उस समय की है जब ब्रिटिश हुकूमत भारत पर राज कर रही थी और असम रेलवे एंड ट्रेडिंग कंपनी के अंग्रेज इंजीनियर असम के घने, डरावने और दुर्गम जंगलों के बीच से रेलवे लाइन बिछाने का काम करवा रहे थे। वहां पर काम करने के लिए बड़े-बड़े हाथियों का इस्तेमाल किया जा रहा था जो भारी-भरकम लकड़ियों और लोहे की पटरियों को खींचने का काम करते थे। एक दिन अंग्रेज इंजीनियरों ने एक बेहद अजीब चीज नोटिस की। उन्होंने देखा कि काम करके लौट रहे हाथियों के पैरों में एक गाढ़ा, चिपचिपा और गहरे काले रंग का पदार्थ लिपटा हुआ था। अंग्रेज कोई मूर्ख नहीं थे, वे तुरंत समझ गए कि यह कोई मामूली कीचड़ नहीं है बल्कि यह तो उस बहुमूल्य ईंधन का संकेत है जो आने वाले समय में पूरी दुनिया की किस्मत बदलने वाला था। इसके बाद अंग्रेज अधिकारियों ने बिना एक सेकंड गंवाए उस इलाके में खुदाई करने के सख्त आदेश जारी कर दिए। कहा जाता है कि जब वहां पर मजदूरों ने खुदाई शुरू की तो अंग्रेज इंजीनियर जोश में आकर चिल्लाने लगे— ‘डिग बॉय डिग’ यानी खोदो लड़के खोदो। बस इसी वाक्य से इस पूरे शहर का नाम ही डिगबोई पड़ गया और यहीं से शुरू हुई भारत के सबसे पहले तेल साम्राज्य की वो दास्तान जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया के युद्धों का रुख ही बदल कर रख दिया।

एशिया की पहली रिफाइनरी और अंग्रेजों का एकछत्र राज

अंग्रेजों ने जैसे ही आधुनिक मशीनों से वहां पर गहराई तक ड्रिलिंग शुरू की, वैसे ही धरती मां का सीना चीरकर कच्चा तेल इस तरह से बाहर आने लगा मानो जमीन के नीचे कच्चे तेल का कोई अनंत महासागर बह रहा हो। हालत यह हो गई कि देखते ही देखते वहां से हर एक दिन में हजारों बैरल कच्चा तेल निकाला जाने लगा जो उस जमाने के हिसाब से एक अविश्वसनीय और आंखें फटी की फटी रह जाने वाला आंकड़ा था। जरा गहराई से सोच कर देखिए, उस दौर में जब पूरा भारत गुलामी की कड़वी जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब भी हमारे देश की धरती दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों को अपनी ऊर्जा से चला रही थी। साल 1901 में इसी डिगबोई में एशिया की सबसे पहली कमर्शियल रिफाइनरी की स्थापना की गई थी। यह रिफाइनरी तकनीकी रूप से इतनी एडवांस थी कि उस समय पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में इसके चर्चे होते थे। लंदन में बैठे बड़े-बड़े हुक्मरान असम से निकलने वाले इस तेल की रिपोर्ट्स देखकर हैरान रह जाते थे। इस कच्चे तेल को रिफाइन करके पेट्रोल, डीजल और केरोसिन जैसी चीजें बनाई जाती थीं, जो उस दौर की फैक्ट्रियों और गाड़ियों के लिए सबसे बड़ा ईंधन थीं। लेकिन अंग्रेजों की नजर सिर्फ व्यापार पर नहीं थी, वे तो भारत की इस अकूत संपदा को पूरी तरह से अपने कब्जे में लेकर पूरी दुनिया पर राज करने का प्लान बना चुके थे। डिगबोई का यह तेल क्षेत्र बहुत तेजी से एक बहुत बड़े औद्योगिक केंद्र में बदल गया और वहां पर ब्रिटिश कंपनियों का एकछत्र राज स्थापित हो गया। लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ा और रोमांचक मोड़ तब आया जब साल 1939 में दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हुई और पूरी दुनिया बारूद के ढेर पर बैठ गई।

दूसरा विश्व युद्ध और भारतीय तेल का पराक्रम

जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तो जर्मनी, जापान और इटली जैसे देशों का गठबंधन यानी एक्सिस पावर्स पूरी दुनिया में भारी तबाही मचा रहे थे। इस महायुद्ध में जीत और हार का फैसला केवल सैनिकों की संख्या या हथियारों की ताकत से नहीं बल्कि इस बात से होना था कि किस देश के पास अपनी सेना, टैंकों और लड़ाकू विमानों को चलाने के लिए कितना ज्यादा ईंधन मौजूद है। उस दौर में समुद्र के रास्ते से तेल का ट्रांसपोर्टेशन करना दुनिया का सबसे खतरनाक और जोखिम भरा काम बन चुका था, क्योंकि अटलांटिक महासागर में जर्मनी की खतरनाक यू-बोट पनडुब्बियां और हिंद महासागर में जापानी नौसेना तेल लेकर जाने वाले मित्र राष्ट्रों के जहाजों को निशाना बनाकर समुद्र की गहराइयों में डुबो रही थीं। ऐसे में ब्रिटेन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों के सामने ईंधन की सप्लाई पूरी तरह से ठप होने का एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया था। उनकी पूरी की पूरी सैन्य शक्ति बिना तेल के बेकार होने की कगार पर पहुंच चुकी थी। लेकिन ठीक उसी संकट के समय भारत का यही डिगबोई तेल क्षेत्र अंग्रेजों के लिए एक बहुत बड़ा वरदान साबित हुआ। चूंकि यह इलाका चारों तरफ से सुरक्षित जमीन से घिरा हुआ था, इसलिए यहां से तेल निकालना और उसकी सप्लाई करना समुद्री रास्तों के मुकाबले हजार गुना ज्यादा सुरक्षित था। डिगबोई की रिफाइनरी से निकलने वाला हाई-क्वालिटी तेल सीधे ब्रिटिश सेना के बख्तरबंद वाहनों, भारी टैंकों, लड़ाकू विमानों और सैन्य मशीनों में भरा जाने लगा। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जिस भारत को अंग्रेज सिर्फ एक गुलाम देश समझते थे, उसी भारत की धरती का तेल उनकी डूबती हुई नैया को पार लगा रहा था और उन्हें युद्ध के मैदान में टिके रहने की ताकत दे रहा था।

‘द हंप’: जब भारतीय ईंधन ने बदला चीन का भाग्य

इस पूरे युद्ध के दौरान असम के इस तेल का इस्तेमाल सिर्फ ब्रिटिश सेना तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारे पड़ोसी देश चीन तक भी पहुंचाया गया। अब इस बात को थोड़ा विस्तार से समझना होगा कि असम से चीन तक तेल कैसे पहुंचता था, क्योंकि इसके पीछे भी एक बहुत ही रोमांचक और खतरनाक इतिहास छुपा हुआ है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने चीन के जमीनी रास्तों को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया था, जिससे चीन की सेना को रसद और ईंधन मिलना बंद हो गया था। ऐसी स्थिति में अमेरिकी वायुसेना ने भारत के असम में स्थित विभिन्न एयरबेस, जैसे चाबुआ, मोहनबारी और दिनजान से अपनी उड़ानें शुरू कीं। ये अमेरिकी विमान असम की रिफाइनरी से निकले हुए ईंधन को अपने टैंकों में भरते थे और फिर दुनिया के सबसे खतरनाक हवाई मार्ग को पार करके चीन तक जरूरी सामान और हथियार पहुंचाते थे। इस हवाई मार्ग को इतिहास में ‘द हंप’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह रास्ता बेहद ऊंचे और खतरनाक पूर्वी हिमालय के पहाड़ों के ऊपर से होकर गुजरता था, जहां मौसम पल भर में बदल जाता था और बर्फीले तूफान विमानों को पलक झपकते ही नष्ट कर देते थे। इतिहासकार साफ शब्दों में कहते हैं कि अगर उस समय असम के डिगबोई का यह तेल उपलब्ध नहीं होता, तो अमेरिकी विमान कभी भी द हंप जैसे खतरनाक रास्ते पर उड़ान भरने की हिम्मत नहीं कर पाते और मित्र राष्ट्रों की पूरी की पूरी सप्लाई लाइन पूरी तरह से ध्वस्त हो जाती। यानी अप्रत्यक्ष रूप से भारत के इस काले खजाने ने ही दुनिया की महाशक्तियों को उस महायुद्ध में जीत की दहलीज तक पहुंचाया था।

अंग्रेजों की क्रूर नीतियां और तेल के कुओं की बर्बादी

लेकिन अब यहां पर आकर सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल खड़ा होता है कि अगर भारत की धरती के नीचे इतना बड़ा तेल का खजाना मौजूद था, तो आखिर वह खजाना समय के साथ गायब कैसे हो गया? क्या वह तेल अपने आप ही खत्म हो गया या फिर इसके पीछे ब्रिटिश हुकूमत की वो सोची-समझी नीतियां जिम्मेदार थीं जिन्होंने भारत को हर तरफ से लूटने का काम किया था? असल में जब तक दूसरा विश्व युद्ध चला, तब तक अंग्रेजों ने अपनी जान बचाने के लिए डिगबोई के कुओं से बेतहाशा और अंधाधुंध तरीके से तेल निकालना जारी रखा। उन्होंने केवल इस बात पर ध्यान दिया कि कैसे ज्यादा से ज्यादा कच्चा तेल बाहर निकाला जाए ताकि उनकी युद्ध की जरूरतें पूरी हो सकें। लेकिन एक जिम्मेदार देश या कंपनी की तरह उन्होंने कभी भी उन तेल के कुओं के संरक्षण, उनकी तकनीक को अपग्रेड करने या फिर नए तेल क्षेत्रों की खोज करने पर एक नया पैसा भी खर्च नहीं किया। किसी भी तेल क्षेत्र से लंबे समय तक उत्पादन लेने के लिए आधुनिक रिजर्व मैनेजमेंट और प्रेशर मेंटेनेंस तकनीक की जरूरत होती है, लेकिन अंग्रेजों का मकसद तो सिर्फ एक ही था कि जितना हो सके भारत के प्राकृतिक संसाधनों को निचोड़ लो और सारा का सारा फायदा समेटकर अपने देश ब्रिटेन भाग जाओ। नतीजा यह हुआ कि आजादी आते-आते ये पुराने कुएं पूरी तरह से कमजोर पड़ गए। जिन इलाकों से कभी हर दिन हजारों बैरल कच्चा तेल उगलता था, वहां का उत्पादन स्तर बहुत तेजी से नीचे गिरने लगा और भारत का यह समृद्ध तेल इतिहास धीरे-धीरे करके केवल फाइलों और किताबों के पन्नों में ही सिमट कर रह गया।

तकनीकी पहलू: ‘स्वीट क्रूड’ का जादुई सच

इस पूरी कहानी को अगर हम तकनीकी नजरिए से देखें तो क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल का निर्माण जमीन के नीचे लाखों सालों तक पेड़-पौधों और जीवों के अवशेषों के दबे रहने और उन पर अत्यधिक दबाव तथा तापमान के काम करने से होता है। असम की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि वहां की जमीन के नीचे पेट्रोलियम रिजर्व बहुत ही समृद्ध अवस्था में मौजूद थे। जब अंग्रेजों ने पहली बार इस क्षेत्र में ड्रिलिंग शुरू की, तो उन्हें बहुत ही उथली गहराई पर ही उच्च गुणवत्ता वाला तेल मिल गया था। इस तेल में सल्फर की मात्रा बहुत कम थी, जिसे तकनीकी भाषा में ‘स्वीट क्रूड’ कहा जाता है। इस प्रकार के कच्चे तेल को साफ करना यानी रिफाइन करना बहुत ही आसान और कम खर्चीला होता है। यही कारण था कि डिगबोई का तेल पूरी दुनिया के लिए सबसे पसंदीदा ईंधन बन गया था। अंग्रेजों ने इस प्राकृतिक उपहार का पूरा फायदा उठाया, लेकिन उन्होंने कभी भी इस क्षेत्र के सतत विकास के बारे में नहीं सोचा। अगर उन्होंने वैज्ञानिक तरीकों से तेल का निष्कर्षण किया होता और कुओं के भीतर प्राकृतिक गैस के दबाव को बनाए रखने के लिए वाटर इंजेक्शन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया होता, तो ये कुएं कई दशकों तक उसी उच्च क्षमता के साथ तेल उगलते रहते।

आधुनिक भारत और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का संकल्प

अगर हम आज के वर्तमान समय की बात करें, तो असम आज भी भारत के घरेलू तेल उत्पादन में अपना एक महत्वपूर्ण योगदान देता है। आज भी गुवाहाटी, बोंगाईगांव और नुमालीगढ़ की आधुनिक रिफाइनरियां दिन-रात काम कर रही हैं और देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में लगी हुई हैं। लेकिन जो ऐतिहासिक और बेमिसाल उत्पादन कभी डिगबोई के कुओं से होता था, वैसा स्वर्ण काल अब इतिहास बन चुका है। यही सबसे बड़ी वजह है कि आज के समय में भारत को अपनी कुल जरूरत का लगभग पचासी प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से भारी-भरकम कीमत चुकाकर इम्पोर्ट करना पड़ता है। और जरा इस विडंबना को देखिए कि जिस भारत की धरती का तेल कभी दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों की जंग का फैसला करता था, वही भारत आज के दौर में अपनी जरूरत के तेल के लिए दुनिया भर की जटिल और गंदी राजनीति को झेलने पर मजबूर है। कभी हमें रूस से अपनी शर्तों पर सस्ता तेल खरीदने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ता है, तो कभी अमेरिकी प्रतिबंधों की धमकियां सुननी पड़ती हैं, और कभी मिडिल ईस्ट में होने वाले तनाव की वजह से हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगते हैं। इतिहास इस बात का साफ गवाह है कि भारत की पावन भूमि के नीचे प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी कभी नहीं थी, कमी थी तो सिर्फ एक सही विजन की, एक दूरदर्शी रणनीति की और अपने खजानों को सही समय पर सुरक्षित रखने की।

तो दोस्तों, इस पूरे ऐतिहासिक सफरनामे को देखने के बाद आपको क्या लगता है? क्या अंग्रेजों की उस लालची नीति ने भारत के एक बहुत बड़े भविष्य को अंधकार में धकेल दिया था? या फिर आपको लगता है कि आज का नया भारत अपनी आधुनिक तकनीक और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के दम पर असम की इस धरती से एक बार फिर से वो जादुई काला सोना निकालने में कामयाब हो जाएगा जो हमें पूरी दुनिया में सबसे आगे खड़ा कर देगा? अपनी राय कमेंट बॉक्स में बिल्कुल साफ-साफ शब्दों में साझा करना मत भूलिएगा।

You Might Also Like

View More

Latest & Breaking Updates

All Stories
डिगबोई की वो अनकही दास्तान: जब भारत के 'काले सोने' के दम पर जीता गया दूसरा विश्व युद्ध | Live News Now