क्यों पत्थर की तरह गिर रहा है भारतीय रुपया? MNCs की मुनाफाखोरी और ईरान युद्ध ने बढ़ाई टेंशन

क्यों पत्थर की तरह गिर रहा है भारतीय रुपया? MNCs की मुनाफाखोरी और ईरान युद्ध ने बढ़ाई टेंशन

97 रुपये! जी हां, ठीक सुना आपने। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया इतिहास के सबसे काले दौर से गुजर रहा है। एक डॉलर की कीमत अब करीब-करीब 97 रुपये तक जा पहुँची है। यह महज़ एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता पर एक सीधा प्रहार है। सवाल यह नहीं है कि रुपया गिर रहा है, सवाल यह है कि इसे गिराने वाली ताकतें कौन हैं और क्या हमारा सिस्टम इन ताकतों के सामने बेबस हो गया है? 2025 की शुरुआत में जो रुपया 85.8 पर था, वह 2026 आते-आते 90 हुआ और अब रिकॉर्ड निचले स्तर पर ‘पत्थर की तरह’ गिर गया है। आखिर कहाँ गड़बड़ हो गई? कौन है जो भारत की तरक्की को नज़र लगा रहा है? आज हम इस गिरते रुपये की ऐसी ‘इनसाइड स्टोरी’ खोलेंगे, जिसे सुनकर आपका खून खौल उठेगा। यह कहानी सिर्फ़ अर्थशास्त्र की नहीं है, यह कहानी है वैश्विक साजिशों की, विदेशी फंड मैनेजर्स की चालाकी की और इन सबके बीच चट्टान की तरह खड़े भारतीय मिडिल क्लास की।

विदेशी लुटेरों का ‘एक्ज़िट प्लान’ और महंगे बाजार का सच

इस गिरावट की सबसे बड़ी और कड़वी हकीकत यह है कि हमारे शेयर बाजार विदेशी निवेशकों के लिए महज़ एक चारागाह बनकर रह गए हैं। वे आते हैं, हमारे देश की ग्रोथ स्टोरी का फायदा उठाते हैं और जब बाजार शिखर पर होता है, तो सारा माल बेचकर निकल जाते हैं। विशेषज्ञ स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार इस समय दुनिया के अन्य उभरते बाजारों की तुलना में ‘जरूरत से ज्यादा महंगे’ यानी ओवरवैल्यूड हो गए हैं। और इसी का फायदा उठाकर वैश्विक निवेशक भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर दूसरे देशों की ओर भाग रहे हैं जहाँ उन्हें सस्ती संपत्ति मिल रही है।

आँकड़े गवाही दे रहे हैं। पिछले 18 महीनों में, जी हां, सिर्फ़ डेढ़ साल में, इन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर बाजारों से करीब 53 अरब डॉलर की निकासी की है। 53 अरब डॉलर! यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। यह हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर एक बहुत बड़ा बोझ है। विडंबना देखिए, हमारे बाजार की मजबूती ही इन विदेशी लुटेरों को ऊंचे दाम पर मुनाफावसूली करके बाहर निकलने का सुनहरा मौका दे रही है। वे हमारे ही खून-पसीने से बने बाजार को लूटकर ले जा रहे हैं और हमारा रुपया दम तोड़ रहा है।

घरेलू मिडिल क्लास: ‘आत्मानिर्भर भारत’ का असली योद्धा

अगर यही विदेशी निकासी आज से दस साल पहले हुई होती, तो हमारा शेयर बाजार ताश के पत्तों की तरह ढह गया होता। लेकिन आज कहानी बदल चुकी है। आज भारत का मिडिल क्लास जाग चुका है। जब विदेशी निवेशक भगोड़ों की तरह पैसा निकाल रहे थे, तब भारत के आम आदमी ने, मिडिल क्लास ने अपनी जमा पूँजी से बाजार को सहारा दिया। यह ‘आत्मानिर्भर भारत’ की असली तस्वीर है। लोग सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए हर महीने नियमित निवेश कर रहे हैं। उन्हें रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता कि बाजार ऊपर जा रहा है या नीचे, उनका भरोसा भारत की अर्थव्यवस्था पर अटूट है।

इस देशभक्तिपूर्ण निवेश का असर देखिए। 2025 की शुरुआत में जहाँ हर महीने SIP के जरिए 20,000 करोड़ रुपये बाजार में आ रहे थे, वहीं मार्च 2026 तक यह आँकड़ा बढ़कर 32,087 करोड़ रुपये प्रति माह पहुँच गया। इस एतिहासिक और रिकॉर्ड तोड़ घरेलू निवेश ने विदेशी निकासी के ‘शॉक’ को सोख लिया। साल की शुरुआत में सेंसेक्स जहाँ 85,444 पर था, वह गिरकर 75,415 पर तो आया, लेकिन यह गिरावट अन्य उभरते बाजारों के मुकाबले बहुत कम है। अगर आज हमारा बाजार खड़ा है, तो सिर्फ़ और सिर्फ़ भारतीय मिडिल क्लास के दम पर। विदेशी फंड मैनेजर्स को यह बात समझ लेनी चाहिए कि अब भारत उनकी उंगलियों पर नहीं नाचेगा।

क्यों विदेशी फंड्स के लिए ‘लालच की खदान’ बना भारत?

अब सवाल यह है कि हमारे बाजार इतने महंगे क्यों हैं कि विदेशी भाग रहे हैं? तकनीकी भाषा में कहें तो भारत का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो, यानी शेयर की कीमत और मुनाफे का अनुपात, इस समय आसमान छू रहा है। ट्रेलिंग आधार पर यह 22.5 है और अगले साल के अनुमान के हिसाब से 18.8 है। इसके मुकाबले अन्य उभरते बाजारों का औसत सिर्फ़ 15-16 है। हमारे पड़ोसी देश चीन का P/E सिर्फ़ 12-14 है, दक्षिण कोरिया का 10-12 और ब्राजील का तो महज़ 8-10 है।

इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय बाजार चीन से 70-90 प्रतिशत, कोरिया से 100 प्रतिशत से ज्यादा और ब्राजील से करीब 150 प्रतिशत प्रीमियम पर कारोबार कर रहे हैं। बेशक, भारत की विकास क्षमताएं बेहतर हैं, हम दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हम अपने एसेट्स को इतना महंगा कर दें कि विदेशी निवेशक उसे बेचकर भागने लगें? हमारे घरेलू निवेशकों के अत्यधिक उत्साह ने बाजार को इतना महंगा बना दिया है कि यह अब एक ‘जोखिम’ बन गया है। यही वह पॉइंट है जहाँ गड़बड़ हो गई है और वैश्विक पूंजी भारत छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर जा रही है।

MNCs की गंदी चाल: FDI के नाम पर धोखा!

चिंता की बात सिर्फ़ शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। यह विदेशी निकासी अब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की जड़ों तक फैल गई है। यह देश के साथ एक बड़ा धोखा है। RBI की रिपोर्ट देखें तो FY26 में सकल FDI यानी ग्रॉस FDI 95 अरब डॉलर था, जो सुनने में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन, जब आप शुद्ध प्रवाह यानी नेट FDI देखते हैं, तो सिर्फ़ 7.7 अरब डॉलर ही बचता है। बाकी पैसा कहाँ गया? बाकी पैसा विदेशी कम्पनियाँ और निवेशक अपने देश वापस ले गए।

FDI के नाम पर भारत में महज़ एक ‘चक्रव्यूह’ रचा जा रहा है। भारतीय कंपनियों का विदेशों में निवेश करना (आउटवर्ड FDI) तो समझ में आता है, यह सकारात्मक संकेत है कि हमारी कम्पनियाँ मल्टीनेशनल बन रही हैं। यह 2021 के 11 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 33 अरब डॉलर हो गया है, जिस पर हमें गर्व होना चाहिए।

लेकिन ज्यादा चिंता की बात विदेशी कंपनियों द्वारा भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना है। ऊंचे वैल्यूएशन का फायदा उठाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNC) भारत से पैसा निकाल रही हैं। उदाहरण के लिए, हुंडई इंडिया ने भारत में ऊंचे दाम पर आईपीओ (IPO) लॉन्च किया, भारतीय निवेशकों से पैसा बटोरा और उसे अपने देश कोरिया भेज दिया। यह क्या है? क्या भारत सिर्फ़ इन कंपनियों के लिए पैसा छापने की मशीन है? अन्य MNCs भी आईपीओ या प्राइवेट इक्विटी बिक्री के जरिए यही कर रही हैं। प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल फंड्स ने हमारे स्टार्टअप्स को ऊंचे वैल्यूएशन पर पहुँचाया और अब आईपीओ के जरिए भारी मुनाफा कमाकर बाहर निकल रहे हैं। यह मुनाफाखोरी हमारे रुपये को कमजोर कर रही है।

ईरान युद्ध की आग और सिस्टम की चुनौतियाँ

जैसे कि ये आंतरिक चुनौतियाँ कम नहीं थीं, वैश्विक हालातों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। ईरान युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ गई हैं। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है। जब तेल महंगा होगा, तो हमें ज्यादा डॉलर देने पड़ेंगे, जिससे हमारा चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ना तय है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर यह युद्ध छह महीने तक चलता है, तो हमारा चालू खाता घाटा GDP के 0.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 2.5 प्रतिशत तक जा सकता है। यद्यपि यह संकट के स्तर तक नहीं है, लेकिन इससे रुपये पर दबाव और बढ़ेगा।

अल्पकाल में RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार और स्वैप सुविधाओं के जरिए रुपये को संभालने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन यह महज़ एक ‘बैंड-एड’ सॉल्यूशन है। जब तक विदेशी निकासी नहीं रुकती और वैश्विक हालात नहीं सुधरते, दबाव बना रहेगा। असल जरूरत यह है कि भारत अधिक से अधिक शुद्ध FDI आकर्षित करे, सिर्फ़ कागजी ग्रॉस FDI नहीं। पिछले पांच वर्षों में सकल FDI में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। भारत अब भी दुनिया में कारोबार करने के लिहाज से एक कठिन देश माना जाता है। लालफीताशाही और जटिल नियम आज भी विदेशी निवेशकों को डराते हैं।

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