दक्षिणी दिल्ली, देश की राजधानी का वो चमचमाता हिस्सा जिसे लोग ‘पॉश’ कहते हैं। जहाँ रहने का सपना हर कोई देखता है, जहाँ की हवा में रसूख और पैसा बोलता है। लेकिन क्या आपको पता है कि इसी ‘पॉश’ दिल्ली की संकरी गलियों में और चमचमाती इमारतों के पीछे मौत का एक ऐसा नेटवर्क चल रहा है, जिसे सिस्टम ने अपने खून-पसीने से सींचा है? 31 मई को साकेत और 3 जून को मालवीय नगर में जो हुआ, वो सिर्फ़ हादसा नहीं था। वो राष्ट्र की राजधानी के माथे पर एक ऐसा कलंक है, जिसे भ्रष्टाचार के सरकारी ‘बाबूओं’ ने लगाया है। मालवीय नगर के उस तथाकथित होटल में कई निर्दोष लोग एक ऐसी आग में झुलस गए, जिसका इंतज़ाम सरकारी अफसरों ने खुद अपनी जेबें भरने के लिए किया था। साकेत में एक इमारत भरभरा कर गिर गई और अपने मलबे में कई जिंदगियों को दफन कर गई। क्या यह सामान्य बात है? क्या इसे हम एक जागरूक राष्ट्र की पहचान मानेंगे?
बिल्डर गिरफ्तार हो गया, होटल का मालिक सलाखों के पीछे है। क्या सिस्टम का काम खत्म हो गया? क्या इंसाफ मिल गया? नहीं! यह तो सिर्फ़ एक पर्दा है, असली गुनहगार तो एसी कमरों में बैठे हैं। मालवीय नगर के उस होटल को सिर्फ़ 6 कमरों का लाइसेंस मिला था। लेकिन, वहाँ पर धड़ल्ले से 25 कमरे चल रहे थे। क्या दिल्ली के नगर निगम, क्या वहाँ की पुलिस और क्या स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं थी? अगर नहीं थी, तो उनकी तनख्वाह किस बात की है? और अगर थी, तो उन्होंने किस ‘तोहफे’ के बदले में अपनी आँखें बंद कर ली थीं? साकेत में भी यही खेल खेला गया। किराये के लालच में, बिल्डर और मालिक ने अनधिकृत निर्माण करवा दिया। यह कोई मामूली चूक नहीं है, यह देश के कानूनों के साथ, राष्ट्र की सुरक्षा के साथ और आम नागरिक के जीवन के साथ एक खुली गद्दारी है।
भ्रष्टाचार का वो ‘सिस्टम’ जो दीमक की तरह राष्ट्र को चाट रहा है
यह एक खुला रहस्य है कि दिल्ली में, चाहे वो कोई संकरी गली हो या कोई मुख्य सड़क, जब भी एक ईंट भी रखी जाती है, तो सिस्टम के रक्षक वहाँ पहुँच जाते हैं। लेकिन वो कानून लागू कराने नहीं पहुँचते, वो अपना ‘हिस्सा’ लेने पहुँचते हैं। आरोप तो यहाँ तक लगते हैं कि स्थानीय पुलिस और निगम के कुछ कर्मचारी हर अवैध निर्माण केfacilitator बन जाते हैं। जनता चिल्लाती रहती है, शिकायतें दर्ज होती हैं, लेकिन नतीजा क्या? सिर्फ़ सन्नाटा! क्योंकि फाइलें तो पैसे की भारी आवाज़ के नीचे दब जाती हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो दिल्ली के कई इलाकों में, जहाँ दो गाड़ियाँ नहीं गुज़र सकतीं, वहाँ ऊँचे-ऊँचे ‘सुसाइड टॉवर’ कैसे खड़े हो जाते? यह एक ऐसा आपराधिक गठजोड़ है, जो राष्ट्र के संसाधनों को और जनता के भरोसे को दीमक की तरह चाट रहा है।
हम एक राष्ट्र के रूप में, एक समाज के रूप में कब तक इन घटनाओं को ‘हादसा’ मानकर भूलते रहेंगे? हर बार कुछ लोग काल के गाल में समा जाते हैं, कुछ दिनों के लिए मीडिया में हंगामा होता है, नेता लोग संवेदना व्यक्त करते हैं और प्रशासन थोड़ा ‘मुस्तैद’ दिखने का नाटक करता है। लेकिन कुछ ही दिनों में, सब कुछ फिर से ‘नॉर्मल’ हो जाता है। अवैध निर्माण की दुकानें फिर से सज जाती हैं, और सिस्टम के ‘बाबू’ अपनी वसूली पर लौट आते हैं। क्या हमें एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की ज़रूरत नहीं है? क्या हमें इन ‘पॉश’ इलाक़ों के पीछे छिपे हुए इस भयानक सच के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठानी चाहिए?
पूरे राष्ट्र में फैला है मौत का यह नेटवर्क
यह सिर्फ़ दिल्ली की कहानी नहीं है। देश के कई हिस्सों में अवैध निर्माण, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही का यही खूनी खेल जारी है। पिछले साल गोवा के एक नाइट क्लब में ऐसी ही एक आपराधिक आग ने कई लोगों की जान ले ली थी। इस साल नोएडा के एक पानी भरे गड्ढे में डूबने से एक युवा इंजीनियर असमय चला गया। क्या हम एक ऐसे भारत का सपना देख रहे हैं, जहाँ हमारे युवा गड्ढों में डूबकर और आपराधिक आग में झुलसकर मरें? क्या यह आत्मनिर्भर भारत की पहचान है? हर हादसे के बाद, सिर्फ़ ‘थोड़ी देर’ की मुस्तैदी दिखती है, लेकिन आगे ठोस सुधार की कोई इच्छाशक्ति नज़र नहीं आती।
जब तक अफसरों की जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक उनकी नौकरी पर, उनकी पेंशन पर और उनकी आज़ादी पर ख़तरा नहीं मँडराएगा, तब तक ये हादसे नहीं रुकेंगे। आज अधिकारी बेफिक्र हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि कोई भी जाँच हो, सिर्फ़ बिल्डर और छोटे-मोटे कर्मचारी ही फँसेंगे। कई बार तो लापरवाही और नियमों के कमज़ोर पालन का बहाना बनाकर असली गुनहगारों को बचा लिया जाता है। इसका सीधा नतीजा मालवीय नगर और साकेत जैसी घटनाएँ हैं। अगर हमने समय रहते सबक लिया होता, तो 2024 के राजकोट गेम जोन अग्निकांड, 2022 के मोरबी पुल हादसे और दो साल पहले दिल्ली के राजेंद्र नगर के कोचिंग बेसमेंट जैसी घटनाओं से हम अपने बेगुनाह नागरिकों की जान बचा सकते थे। लेकिन, हमने सबक नहीं लिया। हमने भ्रष्टाचार को एक व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर लिया है।
असली सवालों के जवाब कौन देगा?
प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि वह जवाबदेह और संवेदनशील हो। लेकिन, सच्चाई यह है कि हमारे कई निकाय और उनके प्रतिनिधि इस कसौटी पर पूरी तरह फेल हैं। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़, अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ और प्रशासनिक लापरवाही के ख़िलाफ़ हमारी सामूहिक आवाज़ बहुत कमज़ोर है। हादसे के बाद, मालिक पर तो कार्रवाई होती है, लेकिन इन सवालों का जवाब कभी नहीं मिलता कि अवैध निर्माण की जानकारी क्या वास्तव में प्रशासन और नगर निकायों को नहीं थी? अगर सच में नहीं थी, तो उनकी कार्यशैली पर, उनकी खुफिया तंत्र पर और उनकी सक्षमता पर एक राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए। और अगर उन्हें पता था, तो उन्होंने कार्रवाई क्यों नहीं की?
हमें एक राष्ट्र के रूप में, एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जहाँ अतिक्रमण, कानून का उल्लंघन और सुरक्षा नियमों की अनदेखी के लिए प्रशासनिक जवाबदेही तय हो। जिस दिन संबंधित इलाके के प्रशासनिक तंत्र के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज होने शुरू हो जाएँगे, जिस दिन कमिश्नर से लेकर कांस्टेबल तक, हर किसी की जवाबदेही तय होगी, उस दिन भ्रष्टाचार की यह दुकान अपने आप बंद हो जाएगी। नोएडा के ट्विन टावर मामले में, कोर्ट के आदेश के बाद ही सही, लेकिन कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की तलवार लटकी थी। हमें सिर्फ़ एक उदाहरण नहीं, हमें एक पूरी व्यवस्था की ज़रूरत है। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सतर्कता और पारदर्शिता सिर्फ़ शब्द न हों, बल्कि एक हक़ीक़त हों।
अंत में, सवाल सिर्फ़ प्रशासन का नहीं है, सवाल हमारे राजनेताओं का भी है। क्या वो ऐसी जवाबदेही तय होने देंगे? क्या वो भ्रष्टाचार के इस नेटवर्क को तोड़ने की इच्छाशक्ति दिखाएँगे? या वो भी इसी ‘सिस्टम’ का हिस्सा बने रहेंगे? एक राष्ट्रवादी और जागरूक नागरिक के रूप में, ‘deccanline.com’ इन सवालों को तब तक पूछता रहेगा, जब तक कि हमें इंसाफ नहीं मिल जाता, जब तक कि हमारी दिल्ली, हमारा भारत, इन आपराधिक ‘हादसों’ से आज़ाद नहीं हो जाता। जय हिंद!





