कूटनीति की शतरंज पर जब कोई देश अपने सबसे बड़े विरोधी मोहरे को सीधे सामने वाले की सरजमीं पर बिठा दे, तो इसे इत्तेफाक नहीं कहा जाता। इसे कहते हैं सीधी चुनौती! बांग्लादेश की सरकार ने दिल्ली के दिल में एक ऐसे पत्रकार को मिनिस्टर प्रेस बनाकर भेज दिया है, जिसका पूरा करियर ही भारत के खिलाफ जहर उगलने में बीता है। नाम है सैदुर रहमान। लेकिन क्या ढाका में बैठे आकाओं को लगता है कि नई दिल्ली उनके इस बचकाने दांव से घबरा जाएगी? शायद वो भूल रहे हैं कि आज का भारत अपनी रेड लाइन्स बहुत साफ खींचता है। जब तक ढाका में भारत-विरोधी चक्रव्यूह रचा जा रहा था, तब तक गृह मंत्री अमित शाह ने बॉर्डर पर ऐसा सीक्रेट हंटर चला दिया कि बांग्लादेश की पूरी इकॉनमी की सांसें अटक गईं। बिना एक भी गोली चले, बिना एक भी बयान जारी किए, बांग्लादेश को उसकी औकात और हैसियत दोनों समझ आने लगी है।
दिल्ली में भारत-विरोधी मोहरे की एंट्री
द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश के पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन मिनिस्ट्री ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। सैदुर रहमान को भारत स्थित बांग्लादेश हाई कमीशन में मिनिस्टर प्रेस अपॉइंट किया गया। यह वही सैदुर रहमान हैं जो ढाका यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं और बीएनपी के मुखपत्र डेली डिंकल से लेकर डेली इत्तेफाक तक में काम कर चुके हैं। लेकिन इनकी असली पहचान पत्रकारिता नहीं, बल्कि इनका भारत-विरोधी एजेंडा है। सोशल मीडिया पर इनके पुराने पोस्ट्स उठाकर देख लीजिए, भारत के रवैये को हमेशा ‘हेजेमोनिक’ और ‘बिग ब्रदर’ बताना इनका पसंदीदा शगल रहा है। यह महाशय 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत के ऐतिहासिक योगदान को सरेआम खारिज करते हैं और इनकी भाषा सीधे तौर पर जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों से मेल खाती है। भारतीय एक्सपर्ट्स और वरिष्ठ पत्रकारों ने भी इस नियुक्ति पर सवाल खड़े किए हैं कि जो शख्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के खिलाफ लगातार जहर उगलता रहा हो, उसे कूटनीतिक पद पर दिल्ली भेजना सीधे तौर पर रिश्तों में आग लगाने जैसा है।
चीन-पाकिस्तान का डेडली नेक्सस और बांग्लादेश का मुहावरा
लेकिन अगर आप समझ रहे हैं कि यह सिर्फ एक पत्रकार की कूटनीतिक नियुक्ति का मामला है, तो आप जियो-पॉलिटिक्स की बहुत बड़ी तस्वीर मिस कर रहे हैं। पर्दे के पीछे असल खेल तो ढाका, बीजिंग और इस्लामाबाद के उस नए नेक्सस का है जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को अस्थिर करने का सपना देख रहा है। दक्षिण एशिया की स्थापित परंपरा रही है कि बांग्लादेश का कोई भी नया प्रमुख सबसे पहले भारत का दौरा करता है। लेकिन मौजूदा निजाम ने इस परंपरा को तोड़ा। यह कोई भूल नहीं थी, यह एक सीधा मैसेज था कि ढाका अब पुरानी शर्तों पर बात नहीं करेगा। वे इंडिया-फर्स्ट पॉलिसी को खत्म करके उसी रास्ते पर निकल पड़े हैं जिस पर मालदीव के मुइज्जू चलने की कोशिश कर रहे थे।
और इस पूरे ड्रामे में चीन और पाकिस्तान की एंट्री भारत के लिए एक कड़ी रेड लाइन है। ढाका की सरकार चीन के साथ डिफेंस और इकॉनमिक डील्स बढ़ा रही है। बांग्लादेशी नौसेना के लिए चीन से सबमरीन्स खरीदी गईं और कॉक्स बाजार के पास पेकुआ में ‘बीएनएस शेख हसीना’ नाम का सबमरीन बेस सीधे तौर पर चाइनीज मदद से तैयार किया गया। इतना ही नहीं, तीस्ता रिवर प्रोजेक्ट में चीन को शामिल करने की धमकियां दी जाने लगीं। दूसरी तरफ, जो पाकिस्तान 1971 के नरसंहार के बाद बांग्लादेश में अछूत बना हुआ था, उसका हाई कमिश्नर अब ढाका में हद से ज्यादा एक्टिव है। दोनों देशों के बीच सीधी सी शिपिंग लाइन्स शुरू करने के वादे हो रहे हैं। हमारी खुफिया एजेंसियों के रडार पर यह साफ दिख रहा है कि आईएसआई एक बार फिर बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद को हवा देने के लिए करना चाहती है।
अमित शाह की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी और आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक
पर क्या भारत सिर्फ हाथ पर हाथ धरकर तमाशा देख रहा है? बिल्कुल नहीं। भारत ने अपनी पुरानी सॉफ्ट डिप्लोमेसी और तुष्टीकरण की पॉलिसी को डस्टबिन में फेंक दिया है। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में 4096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर एक ऐसा सीक्रेट हंटर चला है जिसने ढाका के एलीट क्लास की रात की नींद उड़ा दी है। इसे कहते हैं—जीरो टॉलरेंस बॉर्डर पॉलिसी। सबसे पहला और सख्त कदम था बीएसएफ को खुली छूट देना। बीएसएफ के ज्यूरिस्डिक्शन को बॉर्डर से 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर अंदर तक कर दिया गया। अब बीएसएफ लोकल पुलिस के भरोसे बिना ही सीधे तस्करों और घुसपैठियों के नेटवर्क को ध्वस्त कर रही है। जिन नदियों और दलदली इलाकों में बाड़ लगाना नामुमकिन था, वहाँ सीआईबीएमएस यानी कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम लागू कर दिया गया। लेजर वॉल्स, इन्फ्रारेड कैमरे, थर्मल इमेजिंग और ड्रोन्स की ऐसी अभेद्य दीवार खड़ी की गई है कि अब परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
लेकिन इस पूरी स्ट्रेटजी का सबसे घातक प्रहार था कैटल स्मगलिंग पर सर्जिकल स्ट्राइक। एक वक्त था जब हर रोज हजारों मवेशी गैर-कानूनी तरीके से सीमा पार भेजे जाते थे। यह अरबों रुपये की अवैध बीफ इकॉनमी थी, जो बांग्लादेश के अंडरवर्ल्ड और सिंडिकेट्स की रीढ़ थी। इसी काले धन से भारत-विरोधी ताकतों और कट्टरपंथियों को फंडिंग मिलती थी। गृह मंत्रालय के सख्त ऑर्डर्स के बाद आज यह तस्करी लगभग जीरो हो चुकी है। रातों-रात ढाका के इन सिंडिकेट्स का कैश फ्लो सूख गया। उन्हें समझ आ गया है कि भारत अगर सिर्फ अपने नियमों को सख्ती से लागू कर दे, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर आ जाएगी। भारत ने बहुत साफ शब्दों में मैसेज दे दिया है कि अगर आईएसआई या उग्रवादियों को पनाह दी गई, तो इकॉनमिक ब्लॉकैड होने में एक सेकंड का भी वक्त नहीं लगेगा।
राज्यों का कड़ा रुख और तीस्ता नदी का चक्रव्यूह
केंद्र के इस कड़े रुख के साथ-साथ राज्यों के स्तर पर भी ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया गया है जिसने ढाका को चारों खाने चित कर दिया है। एक तरफ असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने डेमोग्राफिक चेंज और इललीगल इनfiltration के खिलाफ फुल-स्केल मोर्चा खोल रखा है। असम पुलिस ने लगातार ऐसे स्लीपर सेल्स को बेनकाब किया है जिनके तार सीधे अंसारुल्लाह बांग्ला टीम यानी एबीटी जैसे खतरनाक बांग्लादेशी कट्टरपंथी गुटों से जुड़े थे। अवैध मदरसों की फंडिंग पर क्रैकडाउन और प्रवासियों पर जीरो-टॉलरेंस ने ढाका को बता दिया है कि भारत अपनी डेमोग्राफी के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।
वहीं दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल के स्तर पर तीस्ता जल समझौते को लेकर जो रुख अपनाया गया है, वह बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा धर्मसंकट बन चुका है। बांग्लादेश की सबसे बड़ी लाइफलाइन तीस्ता नदी है, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार का स्टैंड एकदम क्लियर है कि राज्य के किसानों के हितों की कीमत पर कोई समझौता नहीं होगा। डिप्लोमैटिक लेवल पर यह भारत के लिए एक मास्टरस्ट्रोक का काम करता है। दिल्ली बहुत आराम से ढाका को कह सकती है कि हम तो बात करने को तैयार हैं, लेकिन हमारे फेडरल स्ट्रक्चर में हम अपने राज्यों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
चाइना कार्ड का इल्यूजन और भारत की बदलती कूटनीति
सवाल यह उठता है कि जो बांग्लादेश अपनी फूड सिक्योरिटी, अपनी इकॉनमी और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर है, वह यह दुस्साहस कर ही क्यों रहा है? इसका जवाब है—चाइना कार्ड का इल्यूजन। सालों से हमारे पड़ोसी देश भारत को ब्लैकमेल करने के लिए यही टूल इस्तेमाल करते आए हैं कि अगर हमारी बात नहीं मानी, तो हम चाइना की गोद में बैठ जाएंगे। ढाका को भी लगता है कि चीनी पैसे और सैन्य ताकत के साये में वे भारत को प्रेशराइज कर सकते हैं। उन्हें लगता है कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक की संवेदनशीलता के कारण भारत चुप रहेगा।
लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल है। आज का भारत 90 के दशक का भारत नहीं है। आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमिक पावर है, जिसके पास अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी है। एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारतीय विदेश मंत्रालय अब डिफेंसिव मोड में नहीं, बल्कि फ्रंटफुट पर खेलता है। भारत ने बांग्लादेश को श्रीलंका का हश्र याद दिला दिया है, जो चीन के डेट ट्रैप में फंसकर पूरी तरह कंगाल हो गया था। भारत की रेड लाइन्स बहुत क्लियर हैं—अगर बांग्लादेश ने अपनी जमीन पर चीन को ऐसा कोई मिलिट्री एक्सेस दिया जिससे भारत की नेशनल सिक्योरिटी को खतरा हो, तो भारत अपनी पावर प्रोजेक्ट करने में एक पल की भी देरी नहीं करेगा। जब ढाका ने तीस्ता प्रोजेक्ट चीन को देने की धमकी दी, तो भारत ने गिड़गिड़ाने के बजाय अपना बॉर्डर और टाइट कर दिया। सीधा स्टैंड है—अगर चीन के पास जाना है तो शौक से जाइए, लेकिन फिर भारत से गेहूं, चावल, प्याज, बिजली और लाखों मेडिकल वीजा की उम्मीद छोड़ दीजिए।
छटपटाहट में फंसा बांग्लादेश
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि बांग्लादेश का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व रसातल में जा रहा है। उनकी गारमेंट इंडस्ट्री, जो पूरे देश की अर्थव्यवस्था को खींचती है, भारी मंदी और संकट से गुजर रही है। देश चलाने के लिए उन्हें आईएमएफ के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है। ऐसे दौर में सैदुर रहमान जैसे भारत-विरोधी मोहरे को दिल्ली में बिठाना कुछ और नहीं, बल्कि ढाका की हताशा और फ्रस्ट्रेशन का सबूत है। यह उस सरकार की छटपटाहट है जो जानती है कि वह भूगोल, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के मामले में भारत के बिना एक कदम भी नहीं चल सकती, लेकिन अपनी घरेलू राजनीति में कट्टरपंथी वोट बैंक को खुश करने के लिए उसे भारत-विरोध का नाटक करना पड़ रहा है।
अमित शाह की बॉर्डर सिक्योरिटी, हिमंत बिस्वा सरमा का डेमोग्राफिक एक्शन, वाटर डिप्लोमेसी का कड़ा रुख और विदेश मंत्रालय की नो-नॉनसेंस अप्रोच—इन सबने मिलकर ढाका के चाइना कार्ड को उसी के गले की फांस बना दिया है। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि रिश्तों में इज्जत दोनों तरफ से होगी। अब देखना यह है कि सैदुर रहमान दिल्ली में बैठकर क्या खुराफात करते हैं और हमारी एजेंसियां उनके हर खेल को कैसे नाकाम करती हैं। आने वाले कुछ महीने साउथ एशिया की जियो-पॉलिटिक्स में नया मोड़ लाने वाले हैं!





