नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में एक ऐसी वैश्विक बिसात बिछाई जा रही है, जिसने न केवल बीजिंग के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है, बल्कि अंकारा से लेकर इस्लामाबाद और बाकू तक में खलबली मचा दी है। यह अब नब्बे के दशक या दो हजार के दशक का रक्षात्मक भारत नहीं है। यह चाणक्य नीति का आधुनिक, आक्रामक और बहुआयामी संस्करण है, जहां भारत अपने दुश्मनों को उन्हीं के घर में घेरने की रणनीति पर पूरी ताकत से काम कर रहा है। रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है। यदि चीन हिमालय और हिंद महासागर में स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के जरिए भारत को घेरने की कोशिश करेगा, तो भारत चीन के पड़ोसियों को घातक हथियारों से लैस करके नेकलेस ऑफ डायमंड्स तैयार करेगा। वहीं, अगर पाकिस्तान और तुर्की कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जहर उगलेंगे, तो भारत उनके सबसे बड़े दुश्मनों, यानी ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ मिलकर उन्हें भूमध्य सागर और काकेशस क्षेत्र में ऐसा रणनीतिक दर्द देगा, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। इस पूरे महा-खेल में इज़रायल और रूस जैसी महाशक्तियां भारत के साइलेंट लेकिन सबसे प्रभावी पार्टनर के रूप में मजबूती से खड़ी हैं।
हिंद महासागर की अचूक किलेबंदी
सबसे पहले बात करते हैं हिंद महासागर की अचूक किलेबंदी की। चीन जिबूती और ग्वादर में नेवल बेस बनाकर हिंद महासागर में अपनी पैठ बढ़ाना चाहता था, लेकिन भारत ने इसके जवाब में एक अदृश्य समुद्री दीवार खड़ी कर दी है। मॉरीशस के उत्तरी अगालेगा द्वीप समूह में भारत ने रणनीतिक रूप से एक तीन हजार मीटर लंबी हवाई पट्टी और एक डीप-वाटर पोर्ट का निर्माण कर लिया है। यह कोई साधारण हवाई पट्टी नहीं है। यह इतनी लंबी है कि यहां से भारत के सबसे घातक समुद्री टोही विमान, बोइंग P-8I नेप्च्यून आसानी से उड़ान भर सकते हैं। इसके सक्रिय होने से पश्चिमी हिंद महासागर और मोजाम्बिक चैनल से गुजरने वाली हर चीनी पनडुब्बी और युद्धपोत सीधे भारत के रडार पर आ चुके हैं। इसी तरह सेशेल्स के असम्पशन द्वीप और वहां के कोस्टल रडार नेटवर्क को भारत ने पूरी तरह से अपग्रेड कर दिया है। आज हिंद महासागर क्षेत्र के लगभग तीस से अधिक रडार स्टेशन सीधे गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर को रियल-टाइम डेटा फीड कर रहे हैं। मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर स्वेज नहर तक, हिंद महासागर में पत्ता भी खड़कता है, तो उसकी पहली भनक भारतीय नौसेना को लगती है। और यह रणनीति केवल अपने समुद्री पड़ोस तक सीमित नहीं है। इंडोनेशिया के साथ मिलकर भारत मलक्का जलडमरूमध्य के ठीक मुहाने पर स्थित सबांग बंदरगाह को तेजी से विकसित कर रहा है। यह बंदरगाह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के इंदिरा पॉइंट से महज नब्बे समुद्री मील दूर है। मलक्का स्ट्रेट से चीन का सत्तर प्रतिशत से अधिक तेल और व्यापार गुजरता है। युद्ध की स्थिति में भारत, इंडोनेशिया के साथ मिलकर इस चोकपॉइंट को पलक झपकते ही बंद कर सकता है, जिससे चीन की अर्थव्यवस्था कुछ ही हफ्तों में घुटनों पर आ जाएगी। वहीं ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत ने मिलिट्री लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट साइन कर रखा है, जिससे भारतीय नौसेना के युद्धपोत दक्षिणी प्रशांत महासागर तक बिना रुके गश्त कर सकते हैं। जापान के साथ भारत न केवल धर्म गार्जियन जैसे युद्धाभ्यास कर रहा है, बल्कि सेमीकंडक्टर और हाई-टेक डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में भी अरबों डॉलर का निवेश आकर्षित कर रहा है।
चीन के आंगन में भारत का सीधा प्रहार
अब नजर डालते हैं चीन के आंगन में भारत के सीधे और आक्रामक प्रहार पर। बीजिंग की नाइन-डैश लाइन की आक्रामकता का जवाब देने के लिए भारत ने दक्षिण चीन सागर में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। फिलीपींस ने भारत से पौने चार सौ मिलियन डॉलर की लागत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की तीन बैटरियां खरीदी हैं। ढाई मैक यानी ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज रफ्तार से उड़ने वाली इस मिसाइल को रडार से पकड़ना मौजूदा चीनी वायु रक्षा प्रणालियों के लिए लगभग असंभव है। वियतनाम के साथ तो भारत का खेल और भी ज्यादा गहरा है। भारत ने वियतनाम की नौसेना को पूरी तरह से ऑपरेशनल मिसाइल कार्वेट आईएनएस कृपाण उपहार में दे दिया है। इतिहास में पहली बार भारत ने किसी मित्र देश को एक पूरा सक्रिय युद्धपोत तोहफे में दिया है। चीन की आपत्तियों के बावजूद भारत की ओएनजीसी विदेश वियतनाम के ब्लॉक-इन में तेल की खोज कर रही है, जो बीजिंग को एकदम स्पष्ट संदेश है कि यदि तुम पीओके में सीपीईसी बना सकते हो, तो हम तुम्हारे दावे वाले समंदर से तेल निकालकर रहेंगे।
काकेशस चक्रव्यूह और तुर्की की घेराबंदी
अब चलते हैं तुर्की और पाकिस्तान के काकेशस चक्रव्यूह की तरफ, जहां भारत ने असली और खतरनाक जाल बिछाया है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में तुर्की, पाकिस्तान और अज़रबैजान ने मिलकर थ्री ब्रदर्स नाम का एक त्रिकोण बनाया था, जिनका मकसद कश्मीर और नागोर्नो-काराबाख जैसे मुद्दों पर इस्लामी दुनिया को भड़काना था। सन दो हजार बीस के युद्ध में अज़रबैजान ने तुर्की के बायरकटार ड्रोन और पाकिस्तानी भाड़े के सैनिकों की मदद से आर्मेनिया को भारी नुकसान पहुंचाया था। इस त्रिकोण को पूरी तरह चकनाचूर करने के लिए भारत ने आर्मेनिया को अपना रणनीतिक बेस बना लिया है। भारत ने आर्मेनिया को ढाई सौ मिलियन डॉलर के पिनाक मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर की आपूर्ति की है। यह घातक सिस्टम केवल चौवालीस सेकंड में बहत्तर रॉकेट दागकर एक किलोमीटर के इलाके को पूरी तरह राख में बदल सकता है। अज़रबैजान के ड्रोन हमलों से बचाने के लिए छह सौ मिलियन डॉलर की लागत वाले आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, स्वाति रडार और जेन टेक्नोलॉजीज का एंटी-ड्रोन सिस्टम भी आर्मेनिया को सौंपा जा चुका है। इन हथियारों ने तुर्की और अज़रबैजान के होश उड़ाकर रख दिए हैं।
भूमध्य सागर में नया भूचाल और मिसाइल डील
लेकिन असली गेम तो भूमध्य सागर में तुर्की की घेराबंदी का है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन लगातार भारत के खिलाफ कश्मीर पर जहर उगलते रहे हैं, और इसके जवाब में भारत ने तुर्की के धुर विरोधी ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया है। साइप्रस, जो तुर्की से महज पैंसठ से सत्तर किलोमीटर दूर है और जिसके उत्तरी हिस्से पर तुर्की ने अवैध कब्जा कर रखा है, उसके साथ भारत ने चौदह ऐतिहासिक रक्षा और व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों में आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाना, उच्च शिक्षा, रिसर्च, और सबसे महत्वपूर्ण अगले पांच सालों के लिए डिफेंस क्षेत्र में सहयोग तेजी से बढ़ाना शामिल है। इसके अलावा ग्रीस और साइप्रस में भारत की यूपीआई प्रणाली की शुरुआत हो चुकी है, जिससे भुगतान बेहद तेज, सुरक्षित और सस्ता हो गया है।
अब बात करते हैं ग्रीस की, जो तुर्की का सबसे बड़ा काल बनता जा रहा है। ग्रीस अपनी रक्षा रणनीति में तुर्की को केंद्र में रखकर बड़े कदम उठा रहा है। ग्रीस इजरायल के साथ मिलकर अरबों यूरो के मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम को खरीदने के लिए समझौते कर रहा है। ग्रीस अपनी जीडीपी का साढ़े तीन प्रतिशत हिस्सा रक्षा पर खर्च कर रहा है। लेकिन तुर्की की सबसे बड़ी और असली चिंता भारत और ग्रीस के बीच चल रही संभावित मिसाइल डील को लेकर है। तुर्की मीडिया में इन दिनों भारत की स्वदेशी मिसाइल एलआर-एलएसीएम यानी लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल को लेकर भारी दहशत है। डीआरडीओ द्वारा विकसित यह मिसाइल एक हजार से पंद्रह सौ किलोमीटर की मारक क्षमता रखती है। इसमें स्वदेशी टर्बोफैन इंजन लगा है और यह बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरकर रडार को आसानी से चकमा दे सकती है। तुर्की के रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह मिसाइल ग्रीस को मिल गई, तो इस्तांबुल से लेकर अंकारा तक तुर्की के सभी अहम एयरबेस, रडार सेंटर और मिलिट्री कमांड ग्रीस के सीधे निशाने पर आ जाएंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ग्रीस के रक्षा मंत्री के बीच द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना पर पूरी सहमति बन चुकी है। ग्रीस ने गुरुग्राम के केंद्र में अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्क अधिकारी की भी तैनाती कर दी है।
IMEC कॉरिडोर और चाणक्य नीति का विस्तार
इस पूरी कूटनीति में इज़रायल पर्दे के पीछे से भारत का सबसे बड़ा और भरोसेमंद सहयोगी है। भारत, इजरायल और ग्रीस मिलकर भूमध्य सागर में एक मजबूत नौसैनिक और तकनीकी चतुर्भुज का निर्माण कर रहे हैं। अब आते हैं आईएमईसी यानी इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप कॉरिडोर पर। स्वेज नहर और होर्मुज स्ट्रेट के संकट को देखते हुए भारत ग्रीस के अलेक्जेंड्रोपोली पोर्ट का अधिग्रहण करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह पोर्ट सैन्य उपकरणों, तेल-गैस और यूरोप तक माल ढुलाई का एक बहुत बड़ा ग्लोबल हब है। चीन पहले ही ग्रीस के पिरियस बंदरगाह पर नियंत्रण रखे हुए है, लेकिन भारत का यह कूटनीतिक कदम चीन के प्रभाव को जड़ से खत्म कर देगा। आईएमईसी से लॉजिस्टिक लागत तीस प्रतिशत और जहाजों की आवाजाही का समय चालीस प्रतिशत तक कम हो जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी की ग्रीस यात्रा और ग्रीक प्रधानमंत्री की भारत यात्रा ने इस रणनीतिक साझेदारी पर मुहर लगा दी है।
मध्य एशिया और मंगोलिया में भी भारत ड्रैगन की पीठ पर पूरी ताकत से सवार है। ताजिकिस्तान में एयरबेस पर भारत की मौन उपस्थिति से पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर कड़ी नजर रखी जा रही है। मंगोलिया में भारत ने एक अरब डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट के तहत देश की पहली तेल रिफाइनरी बनाई है, जो मंगोलिया की चीन और रूस पर ऊर्जा निर्भरता को पचहत्तर प्रतिशत तक कम कर देगी। चीन के ठीक सिर पर बैठकर किया गया यह निवेश बीजिंग के लिए एक साइलेंट अलार्म है। इसके साथ ही, ईरान के चाबहार बंदरगाह के लिए दस साल का लॉन्ग टर्म एग्रीमेंट और बाहत्तर सौ किलोमीटर लंबा INSTC कॉरिडोर, माल ढुलाई का समय और लागत भारी मात्रा में कम कर रहा है, जो सीधे रूस और यूरोप से जुड़ता है।
भारत की वर्तमान भू-राजनीतिक रणनीति केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह प्रोएक्टिव-डिफेंस और ऑफेंसिव-डिप्लोमेसी का एक नया और बेहद आक्रामक युग है। तुर्की के दुश्मनों को हथियार देना, चीन के पड़ोसियों में सामरिक निवेश करना और कॉरिडोर बनाना एक सुविचारित ग्रैंड स्ट्रेटेजी का हिस्सा है। भारत अब वैश्विक शतरंज की बिसात पर केवल एक मोहरा नहीं है, बल्कि वह अब वो निर्दयी और अचूक खिलाड़ी बन चुका है, जो अपनी चालें खुद तय कर रहा है और दुश्मन देशों को उनके ही बुने हुए चक्रव्यूह में पूरी तरह उलझा रहा है। और यह तो अभी महज शुरुआत है!





