जोधपुर में उतरा अमेरिका का खूंखार F-35, ड्रैगन की उड़ी नींद!

जोधपुर में उतरा अमेरिका का खूंखार F-35, ड्रैगन की उड़ी नींद!

कैमरे के सामने भारत को भारी भरकम टैरिफ की धमकियां देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आखिर बंद कमरों में भारत की कड़ी शर्तों के आगे घुटने क्यों टेक दिए? आखिर 99 जेट इंजनों की वो कौन सी सीक्रेट और अभूतपूर्व डील है जिसने रातों रात अमेरिका के दशकों पुराने कड़े नियम ही बदल डाले? आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया का सबसे घातक, सबसे टॉप सीक्रेट और रडार से पूरी तरह अदृश्य रहने वाला फाइटर जेट F-35 अचानक पाकिस्तान बॉर्डर से महज 200 किलोमीटर दूर राजस्थान के जोधपुर में उतर गया? लड़ाकू विमानों के इंजन से लेकर सी-130जे सुपर हरक्यूलिस तक, क्या अमेरिका ने भारत को वो क्रिटिकल तकनीक दे दी है जो वो अपने सबसे खास NATO देशों को भी आसानी से नहीं देता? न्यूयॉर्क के उस बंद कमरे में भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बीच ऐसी कौन सी ऐतिहासिक डील फिक्स हुई, कि रूस से तेल खरीदने पर भारत को आर्थिक रूप से बर्बाद करने वाला नया अमेरिकी कानून एसआरआईए रातों रात भारत के लिए सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा बनकर रह गया?

दोस्तों, एक तरफ वाशिंगटन के व्हाइट हाउस से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट का आक्रामक उद्घोष और टैरिफ की धमकियां पूरी दुनिया में गूंज रही हैं। लेकिन ठीक उसी वक्त, दूसरी तरफ राजस्थान के जोधपुर में थरथराते आसमान को चीरते हुए अमेरिका के सबसे उन्नत स्टील्थ फाइटर जेट्स एफ-35 लाइटनिंग टू भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों के साथ साझा मिशन में बेखौफ उड़ान भर रहे हैं। यह कोई साधारण समय नहीं है। आम जनता और दुनिया भर की मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए राजनैतिक बयानबाजी अपने चरम पर चल रही है। लेकिन अगर हम पेंटागन और नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक के भीतर की कूटनीतिक हलचलों का गहराई से विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि दोनों देश एक दूसरे की सैन्य और तकनीकी नसों में इस कदर घुल मिल रहे हैं जैसा दुनिया के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में सितंबर 2026 से लेकर अक्टूबर 2026 तक भारत अमेरिका संबंधों में एक ही हफ्ते के भीतर 10 से ज्यादा ऐसे बड़े भू-राजनीतिक, रक्षा और तकनीकी समझौते हुए हैं, जो भविष्य में एशिया के अंदर चीन की विस्तारवादी नीतियों को हमेशा के लिए कुचल कर रख देंगे।

तो सवाल यह उठता है कि लड़ाकू विमानों के इंजन से लेकर विशालकाय सी-130जे सुपर हरक्यूलिस तक, अमेरिका अचानक अपनी सबसे घातक और क्रिटिकल मिलिट्री टेक्नोलॉजी भारत की झोली में क्यों डाल रहा है? अमेरिका का वो कौन सा सबसे बड़ा स्वार्थ है जो वो पूरी दुनिया से छिपा रहा है? 26 सितंबर 2026 का दिन भारतीय वायुसेना के गौरवशाली इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना का गवाह बना। पाकिस्तान की सीमा से महज 200 किलोमीटर दूर राजस्थान के जोधपुर एयरफोर्स स्टेशन पर दुनिया का सबसे अत्याधुनिक और खूंखार फिफ्थ जनरेशन का लड़ाकू विमान एफ-35 भारतीय धरती पर उतरा। यह कोई आम नुमाइश या एयर शो बिल्कुल नहीं था। यह तरंग शक्ति 2026 का आगाज था। यह भारतीय वायुसेना द्वारा आयोजित अब तक का दूसरा सबसे बड़ा बहुराष्ट्रीय महा युद्धाभ्यास है। यह युद्धाभ्यास 26 सितंबर से शुरू होकर 12 अक्टूबर 2026 तक आसमान में अपनी ताकत दिखाएगा। इस युद्धाभ्यास की अहमियत और भारत के बढ़ते वैश्विक कद का अंदाजा आप सिर्फ इसी बात से लगा सकते हैं कि अमेरिका ने इसमें अपने 6 एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स और उन्हें आसमान में ही उड़ान के दौरान ईंधन देने वाले 2 विशाल केसी-135 टैंकर विमान भारत भेजे हैं। सैन्य इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब अमेरिकी एफ-35 विमानों ने किसी भारतीय बेस से उड़ान भरी है। इन एडवांस विमानों ने भारतीय वायुसेना के स्वदेशी तेजस, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000 और राफेल जैसे सिद्ध लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर टैक्टिकल और कॉम्बैट मिशन को अंजाम दिया है।

सामरिक घेराबंदी और चीन को कड़ा संदेश

यह सिर्फ एक अभ्यास नहीं है, यह एक बेहद गहरा, आक्रामक और रणनीतिक संदेश है। अमेरिका अपने एफ-35 विमान सिर्फ और सिर्फ उन गिने चुने देशों के साथ युद्धाभ्यास में भेजता है जिन पर उसे सौ प्रतिशत सामरिक विश्वास होता है, क्योंकि इस विमान का डेटा और इसके रडार सिग्नेचर दुनिया के सबसे बड़े रहस्य हैं। जोधपुर में इन विमानों की तैनाती पाकिस्तान के इस्लामाबाद और चीन के बीजिंग को दिया गया एक सीधा और अल्टीमेटम भरा संदेश है। चीन की पीएलए जो लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर लगातार अपनी आक्रामकता दिखाती रही है, उसके लिए यह एक स्पष्ट चेतावनी है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत अब बिल्कुल अकेला नहीं खड़ा है। भारत को दशकों तक पश्चिमी और रूसी हथियारों के घालमेल वाली एक पुरानी सोच वाली सेना के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन जोधपुर के आसमान में अमेरिकी स्टील्थ फाइटर्स के साथ भारतीय पायलटों की रणनीतिक कॉम्बैट ब्रीफिंग इस बात का सबसे बड़ा और पक्का सबूत है कि भारतीय सेना अब पश्चिमी नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध प्रणाली के साथ पूरी तरह से इंटरऑपरेबल हो चुकी है। इस महा युद्धाभ्यास में अमेरिका के अलावा फ्रांस अपने राफेल और ए-330 टैंकर के साथ, यूएई अपने एफ-16 के साथ, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, श्रीलंका और बांग्लादेश समेत कुल 8 देश सीधे तौर पर लड़ाकू उड़ान भर रहे हैं। जबकि दुनिया के 32 अन्य देश ऑब्जर्वर के रूप में इस महाशक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बने हैं। यह मोदी सरकार की उस कूटनीति का नतीजा है जहां भारत दुनिया के हर गुट का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है।

जेट इंजन महा डील और आत्मनिर्भर भारत

लेकिन पर्दे के पीछे की असली कहानी तो आसमान से उतरकर जमीन पर और रक्षा कारखानों के भीतर लिखी जा रही थी। जब आसमान में लड़ाकू विमान दुश्मन के छक्के छुड़ाने का अभ्यास कर रहे थे, ठीक उसी समय 24 सितंबर 2026 को भारत और अमेरिका के बीच एक ऐसा खुफिया और क्रिटिकल समझौता हुआ, जिसकी गूंज आने वाले कई दशकों तक ग्लोबल डिफेंस इंडस्ट्री में सुनाई देगी। यह समझौता भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमानों तेजस मार्क-2 और भविष्य के फिफ्थ जनरेशन फाइटर एएमसीए के लिए जेट इंजन निर्माण का था। भारत की एचएएल और अमेरिकी कंपनी जीई के बीच 99 जीई एफ414 इंजनों के को-प्रोडक्शन की महा डील को अंतिम रूप दे दिया गया। आम इंसान को शायद इसकी अहमियत समझ न आए, लेकिन रक्षा सौदों की रहस्यमयी दुनिया में जेट इंजन का कोर बनाना एक ऐसी जटिल कला और विज्ञान है, जिस पर आज भी पूरी दुनिया के केवल 4 देशों का पक्का एकाधिकार है। ये देश हैं अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन। चीन आज तक एक भरोसेमंद जेट इंजन नहीं बना पाया है। अमेरिका अपनी यह क्रिटिकल तकनीक अपने सबसे करीबी नाटो सहयोगियों तक को आसानी से ट्रांसफर नहीं करता है। लेकिन 24 सितंबर 2026 को जिस एमएएल यानी मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस एग्रीमेंट और डीएसपी-83 पर वाशिंगटन और नई दिल्ली ने हस्ताक्षर किए, वह इस बात की पक्की गारंटी है कि भारत अब हॉट एंड कोटिंग, सिंगल क्रिस्टल ब्लेड्स और लेजर ड्रिलिंग जैसी अति संवेदनशील और प्रतिबंधित तकनीक भारत की सरजमीं पर ही हासिल करेगा।

इस डील के तहत अमेरिका ने 80 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की ऐतिहासिक मंजूरी दी है। यह डील लगभग 1 बिलियन डॉलर की है। इसके लिए एचएएल ने बेंगलुरु के पास एक नई इंजन उत्पादन इकाई के लिए जमीन भी चिन्हित कर ली है और काम युद्ध स्तर पर शुरू होने वाला है। यह समझौता भारत को जेट इंजन के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा, आक्रामक और निर्णायक कदम है। यह साबित करता है कि अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन भारत को सिर्फ एक हथियार खरीददार नहीं मानता, बल्कि एशिया में अपना सबसे बड़ा सामरिक और बराबर का साझेदार मान चुका है। अगर भविष्य में कोई युद्ध होता है और ग्लोबल सप्लाई चेन टूट जाती है, तो भारत को अपने फाइटर जेट्स के लिए किसी विदेशी ताकत के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। भारत के जेट इंजन भारत में ही बनेंगे। लेकिन भारत की रक्षा साझेदारी की यह ऐतिहासिक कड़ी सिर्फ लड़ाकू विमानों के इंजन तक ही सीमित नहीं रुकी। असली रणनीतिक खेल तो अभी शुरू हुआ था।

भारतीय वायुसेना को अपने पुराने हो चुके मध्यम दर्जे के सैन्य परिवहन बेड़े को बदलने के लिए एमटीए यानी मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम की सख्त जरूरत है। इस सुनहरे और रणनीतिक मौके को भांपते हुए अमेरिकी रक्षा और एयरोस्पेस दिग्गज कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने भारत सरकार को एक बंपर और दुनिया को हैरान करने वाला ऑफर दे दिया है। लॉकहीड मार्टिन ने अपने विश्व प्रसिद्ध और सबसे भरोसेमंद सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान के लिए भारत को पूर्ण तकनीक हस्तांतरण और भारत में ही उसके लोकल प्रोडक्शन यानी मेक इन इंडिया की खुली पेशकश कर दी है। भारतीय वायुसेना पहले से ही सी-130जे विमानों का शानदार इस्तेमाल कर रही है। यह वही महाकाय विमान है जो लद्दाख की बर्फीली और खतरनाक चोटियों से लेकर अरुणाचल प्रदेश की दुर्गम हवाई पट्टियों पर रातों रात सैनिकों, टैंकों और भारी साजो सामान को पलक झपकते पहुंचाने में भारतीय सेना की रीढ़ की हड्डी साबित हुआ है। अब इस एडवांस विमान का पूरा उत्पादन भारत में करने का अमेरिकी प्रस्ताव यह साफ दर्शाता है कि अमेरिका भारत को पूरे एशिया में अपनी हथियारों की सप्लाई चेन का एक प्रमुख और सुरक्षित हब बनाना चाहता है। अगर यह महा सौदा परवान चढ़ता है, तो भारत का घरेलू रक्षा उद्योग सीधे तौर पर दुनिया की सबसे एडवांस पश्चिमी एयरोस्पेस तकनीक से जुड़ जाएगा। भविष्य में भारत से ही निर्मित सी-130जे विमान दुनिया के अन्य मित्र देशों को निर्यात किए जा सकेंगे। यह भारत के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और मोदी सरकार के आत्मनिर्भर भारत विजन के लिए एक बहुत बड़ा गेम चेंजर साबित होने वाला है।

न्यूयॉर्क की सीक्रेट बैठक और ट्रंप का टैरिफ गेम

अब इस कहानी में एक बेहद खतरनाक और दिलचस्प ट्विस्ट आता है। जहां एक ओर सैन्य और तकनीकी मोर्चे पर भारत और अमेरिका एक जान हो रहे हैं, वहीं ग्लोबल कूटनीतिक मोर्चे पर स्थितियां उतनी आसान बिल्कुल नहीं दिखतीं। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद पर लौटने के बाद अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति में एक भयंकर आक्रामकता आ गई है। सितंबर 2026 में ही राष्ट्रपति ट्रंप ने एसआरआईए यानी द लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 पर हस्ताक्षर करके उसे एक कठोर अमेरिकी कानून बना दिया है। इस नए और आक्रामक कानून ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट में रातों रात भूचाल ला दिया है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को यह असीमित और तानाशाह अधिकार देता है कि वह रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष 5 देशों से आने वाले आयातों पर 100 प्रतिशत तक भारी भरकम टैरिफ लगा सकते हैं। इन 5 देशों की लिस्ट में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान शामिल हैं। ट्रंप का यह कदम भारत के लिए सीधे तौर पर एक बहुत बड़ा आर्थिक झटका हो सकता था। क्योंकि भारत अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भारी मात्रा में रियायती रूसी कच्चे तेल का आयात डंके की चोट पर करता रहा है।

इस भारी तनावपूर्ण और कड़वे माहौल के बीच न्यूयॉर्क में एक ऐसा कूटनीतिक खेल खेला गया जिसकी भनक दुनिया की मेनस्ट्रीम मीडिया को नहीं लगी। 23 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में यूएनजीए के हाई लेवल वीक के दौरान भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ एक बेहद अहम, गुप्त और आक्रामक बैठक की। इस बंद कमरे की हाई वोल्टेज बैठक में डॉ. एस जयशंकर ने बिना किसी लाग लपेट के, अपनी चिर परिचित आक्रामक शैली में, बेहद स्पष्ट शब्दों में एसआरआईए कानून और भारत पर पड़ने वाले इसके संभावित दुष्प्रभावों को लेकर नई दिल्ली की कड़ी चिंताओं को मेज पर रख दिया। डॉ. एस जयशंकर ने वाशिंगटन को दो टूक साफ कर दिया कि भारत की 1.4 बिलियन आबादी की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है। भारत किसी भी बाहरी सुपरपावर के दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अपनी ऊर्जा जरूरतें ग्लोबल बाजार की गतिशीलता के आधार पर विभिन्न स्रोतों से पूरी करता रहेगा, जिसमें रूस भी मजबूती से शामिल है। बाहर मीडिया में जो तल्खी और ट्रेड वॉर की खौफनाक बातें चल रही थीं, उस बंद कमरे के अंदर का कूटनीतिक माहौल उससे बिल्कुल अलग और भारत के पक्ष में झुका हुआ था।

बैठक के तुरंत बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बैकफुट पर आते हुए अपने आधिकारिक बयान में कहा कि अमेरिका भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को और ज्यादा मजबूत कर रहा है। मार्को रुबियो ने मीडिया के सामने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि ट्रंप प्रशासन टैरिफ को अपनी राष्ट्रीय नीति का अहम हिस्सा मानता है, लेकिन इस नए एसआरआईए कानून में नेशनल सिक्योरिटी वेवर का भी एक खास और सीक्रेट प्रावधान रखा गया है। इसका इस्तेमाल अमेरिकी राष्ट्रपति अपने विशेषाधिकार से व्यक्तिगत मामलों में कर सकते हैं। यह दुनिया और खासकर चीन के लिए एक सीधा कूटनीतिक इशारा था। इसका साफ मतलब था कि भारत को इस कड़े कानून के तहत विशेष छूट दी जाएगी, ताकि भारत अमेरिका की विस्तृत सामरिक साझेदारी पर कोई भी आर्थिक आंच न आए। इसके साथ ही दोनों दिग्गज नेताओं ने खाड़ी देशों के बिगड़ते सुरक्षा हालात और यूक्रेन संकट पर भी गहन कूटनीतिक चर्चा की। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति, स्ट्रैटेजिक ऑटोमी और कूटनीतिक बाहुबल का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अमेरिका अपने ही बनाए कानून में भारत के लिए पिछले दरवाजे से छूट का रास्ता निकाल रहा है।

इंडस-पैसिफिक में चीन की घेराबंदी और QUAD का आक्रामक रुख

अब रुख करते हैं समंदर की उन उफनती लहरों का, जहां एशिया के असली महायुद्ध की खामोश तैयारी चल रही है। क्या अमेरिका मान चुका है कि ड्रैगन को कुचलने का इकलौता रिमोट कंट्रोल अब सिर्फ नई दिल्ली के पास है? अमेरिका और भारत की इस तेजी से बढ़ती सामरिक नजदीकी का सबसे बड़ा कारण वह चीनी ड्रैगन है, जो साउथ चाइना सी से लेकर इंडियन ओशियन तक अपने खूनी पैर पसारने की दुस्साहसिक कोशिश कर रहा है। चीन को समंदर में गाड़ने के लिए जिस क्वाड का गठन किया गया था, वह अब 2026 में पूरी तरह से एक आक्रामक, मारक और एकजुट सैन्य ताकत में तब्दील हो चुका है। सितंबर के आखिरी सप्ताह में ग्रीस की राजधानी एथेंस में क्वाड देशों के राजदूतों की एक बेहद अहम और सीक्रेट बैठक हुई। इसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की प्राथमिकताओं और यूरोप एशिया के बीच सुरक्षित समुद्री रास्तों को लेकर आक्रामक रणनीति बनाई गई। क्वाड अब सिर्फ एक कूटनीतिक बयानबाजी का मंच नहीं रह गया है। यह अब जमीनी और समुद्री स्तर पर चीन की भयानक घेराबंदी कर रहा है।

इसका सबसे बड़ा, सजीव और खौफनाक उदाहरण 25 सितंबर 2026 को देखने को मिला। जब भारतीय तटरक्षक बल का विशालकाय और अत्याधुनिक पोत आईसीजीएस शौणक चेन्नई से ऑस्ट्रेलिया के पर्थ के लिए सीना तानकर रवाना हुआ। यह कोई साधारण समुद्री गश्त या शांति यात्रा नहीं थी। यह क्वाड एट सी शिप ऑब्जर्वर मिशन का एक बेहद क्रिटिकल और रणनीतिक हिस्सा थी। इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि भारतीय पोत आईसीजीएस शौणक पर 6 घातक सी राइडर्स सवार थे। इनमें भारत और जापान के 2 अधिकारी, तथा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का 1 अधिकारी शामिल था। यह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मिशन भारत के महासागर विजन का सीधा विस्तार है। यह पूरी दुनिया को साबित करता है कि क्वाड देशों की नौसेनाएं और तटरक्षक बल अब किसी भी समुद्री खतरे, विशेष रूप से चीनी नेवी की किसी भी घुसपैठ से पलक झपकते निपटने के लिए रियल टाइम इंटरऑपरेबिलिटी का एडवांस युद्ध अभ्यास कर रहे हैं।

लेकिन चीन के लिए असली मिर्ची तो इससे कुछ दिन पहले ही लग चुकी थी। ठीक चीन के दरवाजे पर, फिलीपींस के सुबिक बे में एक ऐसा महा शक्ति प्रदर्शन हुआ जिसने बीजिंग के सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी और शी जिनपिंग की नींद उड़ा दी। 20 सितंबर 2026 को भारतीय नौसेना के 2 बेहद घातक युद्धपोत, स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस सह्याद्री और खतरनाक मिसाइल कार्वेट आईएनएस कुलिश, समंदर का सीना चीरते हुए सुबिक बे पहुंच गए। मौका था एडीएमएम-प्लस के तहत मैरीटाइम सिक्योरिटी ज्वाइंट कोऑपरेशन एक्टिविटी का। इस बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में भारतीय जहाजों ने अमेरिकी नौसेना के लिटोरल कॉम्बैट शिप यूएसएस कैनबरा और दुनिया के सबसे घातक पनडुब्बी शिकारी पी-8ए पोसीडन टोही विमान के साथ मिलकर खूंखार युद्धाभ्यास किया। साथ ही जापान के शक्तिशाली हेलीकॉप्टर डिस्ट्रॉयर जेएस इसे, ऑस्ट्रेलिया के एचएमएएस पर्थ और फिलीपींस के युद्धपोतों ने भी मिलकर चीन के खिलाफ समंदर में एक ऐसा अभेद्य चक्रव्यूह रच दिया, जिसे भेदना पीएलए नेवी के बस की बात नहीं। सुबिक बे, जो कभी एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा विदेशी नौसैनिक अड्डा हुआ करता था और जो विवादित साउथ चाइना सी के ठीक मुहाने पर स्थित है, वहां भारतीय नौसेना की यह दहाड़ एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक भू-राजनीतिक शिफ्ट है। भारत की आक्रामक एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत भारतीय युद्धपोत अब मलक्का जलडमरूमध्य को पार करके साउथ चाइना सी में अपनी स्थायी, निडर और मारक उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। उस समंदर में जिसे चीन अपनी बपौती और निजी तालाब मानता है, वहां अब भारतीय नौसेना का तिरंगा शान से लहरा रहा है।

डीप टेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्पेस पार्टनरशिप

सामरिक और समुद्री सुरक्षा में चीन को बुरी तरह पछाड़ने के साथ साथ, 2026 का सितंबर महीना डीप टेक और स्पेस सेक्टर में भी भारत अमेरिका के महा-एकीकरण का गवाह बन चुका है। आज के दौर में महाशक्तियों की हथियारों की दौड़ केवल बैलिस्टिक मिसाइलों और टैंकों तक सीमित नहीं है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कोड्स और अंतरिक्ष की निचली कक्षा तक पहुंच चुकी है। 24 सितंबर 2026 को अमेरिकी सेमीकंडक्टर और एआई चिप बनाने वाली दिग्गज टेक कंपनी मिथिक एआई ने भारत की सिलिकॉन वैली, बेंगलुरु में अपना महात्वाकांक्षी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस शुरू करने का एक बहुत बड़ा ऐलान कर दिया। मिथिक एआई दुनिया की उन चुनिंदा और टॉप कंपनियों में से एक है जो एनालॉग कंप्यूट इन मेमोरी तकनीक पर काम करती है। यह कंपनी ऐसे ऊर्जा कुशल और सुपरफास्ट एआई चिप्स बनाती जिनका इस्तेमाल सीधे तौर पर अमेरिका के एडवांस डिफेंस सिस्टम, मिलिट्री रोबोटिक्स और ऑटोनॉमस व्हीकल्स में होता है। इस सेंटर के जरिए यह दिग्गज अमेरिकी कंपनी भारतीय इंजीनियरों और विशेषकर भारत के आईआईटी के ब्रिलियंट टैलेंट का इस्तेमाल चिप डिजाइन, फिजिकल डिजाइन और जटिल सिस्टम इंजीनियरिंग में करेगी। कंपनी ने अपने सबसे प्रमुख वांगार्ड प्लेटफॉर्म को भी अब बेंगलुरु से ही विकसित करने की योजना बनाई है। 2027 के पहले त्रैमासिक तक मिथिक एआई ने अपनी भारतीय टीम को 4 गुना करने का लक्ष्य रखा है। यह साफ दिखाता है कि अमेरिका अब अपनी सबसे क्रिटिकल एआई तकनीक के लिए चीन और ताइवान पर अपनी पुरानी निर्भरता खत्म करके पूरी तरह से भारत की मेधा पर दांव लगा रहा है।

उसी सप्ताह अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक और बड़ा धमाका हुआ। भारत के सबसे प्रमुख और तेजी से उभरते प्राइवेट स्पेसटेक स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस ने अमेरिकी निवेशकों से भारी भरकम फंड जुटाने की अपनी फाइनल बातचीत पूरी कर ली। हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस, अमेरिका के फिडेलिटी, जनरल कैटलिस्ट और बेंचमार्क जैसे दिग्गज ग्लोबल इन्वेस्टर्स से 280 से लेकर 300 मिलियन डॉलर की महा फंडिंग जुटाने के बेहद करीब पहुंच गया है। भारतीय रुपयों में अगर बात करें तो यह भारी भरकम रकम करीब 2600 से 2850 करोड़ रुपये बैठती है। यह ऐतिहासिक और विशाल निवेश भारतीय स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम में एक बड़ा भूचाल ला सकता है। यह साफ तौर पर पूरी दुनिया को दर्शाता है कि अमेरिकी पूंजी और ट्रिलियन डॉलर का ग्लोबल इन्वेस्टमेंट अब चीन के जोखिम भरे बाजार से पूरी तरह किनारा करके भारत के कोर स्पेस और टेक सेक्टर में अपना सबसे सुरक्षित, पारदर्शी और स्थायी ठिकाना ढूंढ रहा है।

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