जब पहाड़ों की चोटियों पर अचानक शांति छा जाए तो समझ लेना चाहिए कि तूफान अब समंदर से उठने वाला है। भारतीय रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को गहरी सोच में डाल दिया है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि उत्तरी सीमाओं के विपरीत चीनी सेना की तैनाती में महत्वपूर्ण कमी देखी गई है। जो चीन 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद से लगातार सीमा पर अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा था वह अचानक अपने सैनिकों को पीछे क्यों हटा रहा है? सच्चाई यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी कोई शून्य नहीं होता। हिमालय के मोर्चे पर जो सैन्य शून्यता दिखाई दे रही है उसे असल में एक नए और बेहद खतरनाक युद्ध क्षेत्र में शिफ्ट किया जा रहा है और वह क्षेत्र है बंगाल की खाड़ी और इंडो-पैसिफिक महासागर। भारत की खुफिया एजेंसियों को ऐसे इनपुट मिले हैं जिन्होंने दिल्ली को बता दिया है कि असल खेल पहाड़ों पर नहीं बल्कि पानी के भीतर खेला जाने वाला है। यह भारत के उस ग्रैंड मास्टरप्लान का हिस्सा है जिसके तहत चीन को उसी की भाषा में घेरने की तैयारी हो रही है।
सीमा पर सैनिकों की कमी या नया तकनीकी जाल
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि एलएसी पर चीनी सैनिकों की संख्या में कमी आई है लेकिन अगर आप इसे शांति की वापसी समझ रहे हैं तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। यह युद्ध लड़ने के तरीके में एक रणनीतिक बदलाव है। रिपोर्ट बताती है कि एलएसी के साथ वाले क्षेत्रों में अभी भी कई कंबाइंड-आर्म्स ब्रिगेड तैनात हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि चीन ने सैनिकों को हटाया नहीं है बल्कि उन्हें फॉरवर्ड पोस्ट से हटाकर त्वरित सुदृढीकरण दूरी पर रीलोकेट कर दिया है। पहाड़ों की बर्फीली ऊंचाइयों पर बारह महीने सैनिकों को तैनात रखना आर्थिक और शारीरिक रूप से बेहद खर्चीला होता है। चीन ने अब सैनिकों की जगह इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी को अपना नया हथियार बना लिया है।
तिब्बत के पठार पर चीन ने सड़कों, सुरंगों, एयरफील्ड्स और लॉजिस्टिक्स हब का ऐसा जाल बिछा दिया है जो उसे सैनिकों को सीमा से दूर रखने की पूरी सुविधा देता है। अब युद्ध सैनिकों की संख्या से नहीं बल्कि मोबिलिटी से लड़ा जाएगा। क्या चीन ने इंसानी सैनिकों की जगह सीमा पर ड्रोन स्वार्म्स और इलेक्ट्रॉनिक हथियारों का जाल बिछा दिया है? बिल्कुल। चीन ने सैटेलाइट्स और एआई को सीमा पर सक्रिय कर दिया है। अगर कल को कोई विवाद होता है तो चीन के सैनिक अपनी नई सुरंगों के जरिए कुछ ही घंटों में वापस फॉरवर्ड पोस्ट पर पहुंच सकते हैं। इसलिए सैनिकों की यह वापसी कोई शांति का प्रतीक नहीं बल्कि चीन की सैन्य दक्षता का एक नया और उन्नत संस्करण है।
कूटनीतिक छलावा और वैश्विक परिस्थितियां
दो हजार बीस की गलवान घटना ने भारत-चीन संबंधों की रूपरेखा को नष्ट कर दिया था। इसके बाद बैक-चैनल कूटनीति का जो दौर चला उसकी टाइमलाइन को समझना बहुत जरूरी है। यह एक ऐसा कूटनीतिक छलावा है जिसे भारतीय एजेंसियां बहुत करीब से मॉनिटर कर रही हैं। अक्टूबर चौबीस में वर्षों के तनाव के बाद गश्त और सैनिकों के पीछे हटने पर एक समझ बनी। इसके बाद अगस्त पच्चीस के बीच चीनी विदेश मंत्री ने भारत का दौरा किया। इस दौरे ने सीमा, व्यापार और आवाजाही पर चर्चा को फिर से खोल दिया। इसी दौरान भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीनी प्रतिनिधियों के बीच विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता हुई। इसके साथ ही कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने की कोशिशों ने दुनिया को यह संकेत दिया कि संबंध सामान्य हो रहे हैं। इसके कुछ ही दिन बाद सितंबर पच्चीस में सीनियर कमांडर-लेवल की फ्लैग मीटिंग हुई और अंततः नई दिल्ली में आयोजित शिखर सम्मेलन के मौके पर शीर्ष नेताओं के बीच मुलाकात हुई। प्रधानमंत्री ने सीमा पर शांति और स्थिरता के महत्व को रेखांकित किया जबकि दूसरी तरफ से साझेदारी पर जोर दिया गया।
इस पूरी कूटनीतिक टाइमलाइन को देखकर लगता है कि दोनों देश अपने विवादों को युद्ध में बदलने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। चीन ऐसा क्यों कर रहा है? क्योंकि विश्व पटल पर परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। अमेरिका में नए प्रशासन के नेतृत्व ने चीन पर चौतरफा दबाव बना रखा है। टैरिफ वॉर और ताइवान को लेकर अमेरिकी सख्त रुख के कारण चीन घबराया हुआ है। उसे दक्षिण चीन सागर और अपनी डगमगाती अर्थव्यवस्था पर फोकस करना है इसलिए वह भारत के साथ अपनी सीमा को मैनेज करना चाहता है। लेकिन भारत सरकार चीन के इस छलावे को अच्छी तरह समझ चुकी है। भारत को यह इनपुट बहुत पहले मिल चुका था कि चीन एलएसी पर उलझा कर असल में स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के तहत हिंद महासागर और विशेषकर बंगाल की खाड़ी में भारत की घेराबंदी कर रहा है।
म्यांमार से लेकर श्रीलंका तक रेड अलर्ट
म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश में चीनी निवेश और नौसैनिक गतिविधियों ने भारत के लिए रेड अलर्ट जारी कर दिया था। भारत को यह समझ आ गया था कि चीन को रोकने के लिए सिर्फ हिमालय पर सेना खड़ी करना काफी नहीं है। ड्रैगन की असली जीवन रेखा दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री रास्तों में मौजूद है जिसे कुचलना हर हाल में जरूरी है। और यहीं से जन्म होता है भारत के उस मास्टरस्ट्रोक का जिसने चीन की रातों की नींद उड़ा दी है। इस मास्टरस्ट्रोक का नाम है ब्रह्मपुत्र-चाओ फ्राया रणनीति। यह कोई साधारण योजना नहीं है बल्कि चीन को उसी के खेल में मात देने का एक ऐसा कूटनीतिक कदम है जिसे जमीन पर उतारा गया है।
भारत ने चीन को चौंकाते हुए थाईलैंड के साथ एक उच्च स्तरीय वार्ता का आयोजन किया। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि यह मीटिंग देश की राजधानी के सुरक्षित कमरों में नहीं हुई। यह सीक्रेट मीटिंग दिल्ली से दो हजार किलोमीटर दूर पूर्वोत्तर भारत के दो अहम शहरों, असम के गुवाहाटी और मेघालय की राजधानी शिलांग में की गई। आखिर पूर्वोत्तर को ही क्यों चुना गया? पूर्वोत्तर भारत सरकार की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का धड़कता हुआ हृदय है। इसकी भौगोलिक निकटता सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया से है। चीन की नजर हमेशा से अरुणाचल प्रदेश और सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर रही है। ऐसे में गुवाहाटी और शिलांग में थाईलैंड के नीति-निर्माताओं को बुलाकर भारत ने चीन को यह आक्रामक संदेश दिया है कि भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र अब रक्षात्मक मुद्रा में नहीं जीने वाला है।
शिलांग और गुवाहाटी में तैयार हुआ ब्लू-प्रिंट
इस डायलॉग का आयोजन एक प्रमुख थिंक टैंक द्वारा भारत के विदेश मंत्रालय और थाईलैंड के सहयोग से किया गया। इस दो दिवसीय महामंथन में सिर्फ कागजी वादे नहीं हुए बल्कि चीन की घेराबंदी का पूरा ब्लू-प्रिंट तैयार कर लिया गया। पहले दिन की बैठक में मुख्य फोकस लॉन्ग टर्म सर्वाइवल पर था। चीन दूसरे गरीब देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाता है। इसके उलट भारत ने थाईलैंड के साथ मानव पूंजी, हेल्थकेयर और युवाओं के एंटरप्राइज पर ध्यान केंद्रित किया। विशेषज्ञों ने खाका खींचा कि हमें चीन के प्रभाव को जड़ से खत्म करना है।
लेकिन असली भू-राजनीतिक भूचाल तो दूसरे दिन आना बाकी था। शिलांग की सर्द वादियों में जो चर्चा हुई उसकी गर्मी ने सीधे बीजिंग के गलियारों में आग लगा दी। दूसरे दिन का मुख्य एजेंडा था बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक साझेदारी और कनेक्टिविटी। जिन रणनीतियों पर मोहर लगी वे चीन के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं हैं। पहला कदम है सीधे हवाई कॉरिडोर और क्षेत्रीय ट्रांजिट लिंक बनाना। भारत के पूर्वोत्तर को म्यांमार के रास्ते सीधे थाईलैंड से जोड़कर चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को कड़ी टक्कर दी जा रही है। दूसरा बड़ा कदम है साफ ऊर्जा और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग। चीन पर दुनिया की सप्लाई चेन की निर्भरता खत्म करने के लिए भारत और थाईलैंड का संयुक्त विकास गति पकड़ रहा है।
तीसरा और सबसे खतरनाक मास्टरस्ट्रोक है आपदा प्रबंधन में संयुक्त पहल। यह सुनने में भले ही आम लगे लेकिन रक्षा विशेषज्ञों की नजर से देखें तो आपदा प्रबंधन के नाम पर दोनों देशों की नौसेनाएं और तटरक्षक बल बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में संयुक्त गश्त और बड़े सैन्य अभ्यास करेंगे। यह चीन की खामोश पनडुब्बियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर उनका शिकार करने का एक मारक तरीका है। अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस के बिना हिंद महासागर में चीन को नहीं रोका जा सकता और थाईलैंड के साथ मिलकर भारत ने यह चक्रव्यूह रच दिया है। चौथा कदम है क्षेत्रीय मंचों का एकीकरण। इन मंचों के जरिए भारत अब थाईलैंड, म्यांमार और श्रीलंका को एक मजबूत धागे में पिरोकर बंगाल की खाड़ी को चीन के प्रभाव से मुक्त करना चाहता है।
दो मोर्चों पर ड्रैगन की घेराबंदी
चीन सोच रहा था कि वह सीमा पर थोड़ा तनाव कम करके भारत को शांत कर देगा और शांति से बंगाल की खाड़ी में अपना सैन्य प्रभुत्व स्थापित कर लेगा। लेकिन भारत की मौजूदा विदेश नीति ने उसे उसी के चक्रव्यूह में फंसा दिया है। भारत का प्लान अब दो मोर्चों पर एक साथ ड्रैगन की गर्दन मरोड़ने का है। पहला मोर्चा है हिमालय पर टेक्नोलॉजिकल और लॉजिस्टिकल पलटवार। भारत ने भी चीन की तरह सीमा पर अपनी सैन्य संरचना को आधुनिक कर लिया है। सड़क नेटवर्क और आधुनिक सुरंगों के निर्माण से भारतीय सेना की रैपिड मोबिलिटी चीन के बिल्कुल बराबर खड़ी है। अब भारत का मुख्य फोकस इंटीग्रेटेड इंटेलिजेंस और सर्विलांस पर है। स्वायत्त प्रणालियों और काउंटर-ड्रोन तकनीकों में भारत का विकास अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। भारतीय रणनीतिकार जानते हैं कि भविष्य में संचार प्रणालियों को साइबर अटैक से बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। भारत अब केवल पारंपरिक सेना पर निर्भर नहीं है बल्कि तकनीकी-सक्षम बलों को इतनी मजबूती दे रहा है कि चीन का कोई भी ड्रोन स्वार्म भारतीय सीमा में घुसने से पहले ही नष्ट हो जाएगा।
और दूसरा मोर्चा है महासागरों का गेटवे यानी थाईलैंड। थाईलैंड अंडमान सागर और गल्फ ऑफ थाईलैंड के बीच स्थित है। यह चीन के लिए सबसे बड़ा चोकपॉइंट है। भारत जानता है कि चीन अपने व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए मलक्का जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भर है। यदि भारत थाईलैंड के साथ गहरे रणनीतिक लिंक स्थापित कर लेता है तो इसका सीधा मतलब यह है कि भारत सीधे तौर पर दक्षिण चीन सागर के मुहाने पर जाकर बैठ जाएगा। अगर किसी भी ग्लोबल फ्लैशप्वाइंट पर चीन की टक्कर होती है तो मलक्का स्ट्रेट पर भारत की मजबूत पकड़ चीन की पूरी अर्थव्यवस्था की सांसें रोक सकती है। थाईलैंड के साथ यह डायलॉग सिर्फ एक सांस्कृतिक बातचीत नहीं है बल्कि यह एक अदृश्य सैन्य गठबंधन की नींव है। शहर-से-शहर की साझेदारी के बहाने भारत अपनी सॉफ्ट पावर और हार्ड पावर दोनों को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रोजेक्ट कर रहा है।
निष्कर्ष और भविष्य की चुनौती
यह घटनाक्रम यह साबित करते हैं कि भारत और चीन अपने संबंधों को स्थिर करने का प्रयास जरूर कर रहे हैं लेकिन भारतीय नीति-निर्माता किसी भी तरह की आत्मसंतुष्टि में नहीं जी रहे हैं। भारत को ड्रैगन की फितरत पता है। चीन द्वारा सैनिकों को पीछे हटाना एक सामरिक समायोजन हो सकता है या फिर प्रौद्योगिकी पर अधिक निर्भरता का परिणाम हो सकता है। इसलिए एलएसी पर भविष्य की शांति सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि सीमा पर कितने सैनिक दिखाई दे रहे हैं बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि वे सैनिक रडार, लॉजिस्टिक्स और निर्णय लेने की प्रक्रिया से कितनी मजबूती से जुड़े हुए हैं।
भारत ने अपनी रणनीति को पूरी तरह से परिपक्व कर लिया है। एक तरफ जहां भारत हिमालय की बर्फीली ऊंचाइयों पर ड्रैगन की आंखों में आंखें डालकर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए उसे खुली चुनौती दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ पूर्वोत्तर भारत के जंगलों से होते हुए बंगाल की खाड़ी और थाईलैंड तक एक ऐसा अभेद्य रणनीतिक कॉरिडोर तैयार कर रहा है जो चीन के समुद्री विस्तारवाद की रीढ़ को हमेशा के लिए तोड़ देगा। यह 21वीं सदी की वह महान भू-राजनीतिक बिसात है जिसमें भारत अब सिर्फ अपनी सीमाओं के अंदर बैठकर रक्षा नहीं कर रहा है बल्कि चीन को उसी के गेम में, उसके घर के पास जाकर चुनौती दे रहा है।





