तारीख 20 अक्टूबर 2026, सुबह के ठीक 06:00 बजे। मध्य एशिया के ऐतिहासिक बॉर्डर शहर तर्मेज़ में अमु दरिया के बर्फीले पानी पर घना कोहरा छाया हुआ था। इसी सन्नाटे को चीरते हुए रूसी सेना के भारी बख्तरबंद वाहनों के कैटरपिलर ट्रैक्स ने ज़मीन को हिला दिया। आसमान में एमआई-24 अटैक हेलीकॉप्टरों के रोटर ब्लेड्स की गड़गड़ाहट गूंज रही थी और उज़्बेकिस्तान की सीमा पर आधुनिक तोपें अफगानिस्तान की सीमा पर तबाही के लिए तैयार थीं। ऊपर से देखने पर यह सिर्फ एक मिलिट्री एक्सरसाइज लग सकता है। लेकिन दुनिया भर के डिफेंस स्ट्रेटजिस्ट्स जानते हैं कि अमु दरिया के इस किनारे पर बारूद की गंध अचानक यूं ही नहीं फैली है।
क्या व्लादिमीर पुतिन ने उज़्बेकिस्तान की सीमा पर सेना उतारकर अफगानिस्तान को नहीं, बल्कि पाकिस्तान को अपना आखिरी संदेश भेज दिया है?
जिस तालिबान को मॉस्को ने पूरे 23 साल तक आतंकवादी मानकर बैन रखा था, क्या आज रूसी सेना उसी तालिबान के साथ खड़े होकर नया सिक्योरिटी आर्किटेक्चर तैयार कर रही है?
क्या काबुल से लेकर मॉस्को तक बिछाई जा रही इस बारूदी बिसात का असली रिमोट कंट्रोल चुपचाप भारत ने अपने हाथ में ले लिया है?
7 बिलियन डॉलर के आधुनिक नाटो हथियार और सोवियत दौर की भारी तोपें, क्या डूरंड लाइन पर पाकिस्तानी सेना के ताबूत की आखिरी कील साबित होने जा रही हैं?
चाबहार पोर्ट से लेकर आईएनएसटीसी तक, क्या भारत ने बिना एक भी गोली चलाए पाकिस्तान के 40 साल पुराने कराची पोर्ट ब्लैकमेल का खेल हमेशा के लिए खत्म कर दिया है?
तारीख 20 अक्टूबर से 27 अक्टूबर 2026 के बीच उज़्बेकिस्तान के ऐतिहासिक सीमावर्ती शहर तर्मेज़ में जो कुछ चल रहा है, वह कोई सामान्य सैन्य अभ्यास नहीं है। यह कोल्ड वॉर के बाद यूरेशिया की जमीन पर खेला जा रहा सबसे बड़ा और निर्णायक जियोपॉलिटिकल पावर गेम है। रूसी सेना की स्पेशल माउंटेन असॉल्ट यूनिट्स ने ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के बेहद दुर्गम पठारों से होकर 300 किलोमीटर का लंबा सैन्य मार्च पूरा किया। यह मिलिट्री कॉन्टिनेंट सीधे अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा से चंद किलोमीटर दूर तर्मेज़ ट्रेनिंग सेंटर पर मोर्चा संभाल चुका है। इस पूरे ऑपरेशन को नाम दिया गया है ‘ऑपरेशन सहयोग 2026’।
आसमान में गरजते एमआई-24 ‘हाइंड’ अटैक हेलीकॉप्टर, हवा में चक्कर काटते इलेक्ट्रॉनिक टोही ड्रोन और जमीन पर रेंगते रोबोटिक कॉम्बैट सिस्टम्स इस बात का सबूत हैं कि मध्य एशिया का पावर बैलेंस अब पूरी तरह बदल चुका है। तर्मेज़ का यह इलाका कोई साधारण भूगोल नहीं है। यह वही जगह है जहाँ प्रसिद्ध अमु दरिया मध्य एशिया को अफगानिस्तान से अलग करती है। इसी नदी पर बना है ऐतिहासिक ‘फ्रेंडशिप ब्रिज’। यह वही पुल है जहाँ से 25 दिसंबर 1979 को सोवियत संघ की 40वीं आर्मी ने अफगानिस्तान में कदम रखा था। ठीक 9 साल बाद 15 फरवरी 1989 को जनरल बोरिस ग्रोमोव के नेतृत्व में आखिरी सोवियत सैनिक इसी पुल से वापस लौटा था।
लेकिन 2026 में इतिहास ने 180 डिग्री का यू-टर्न ले लिया है। आज रूसी सेना अफगानिस्तान पर हमला करने नहीं आई है। आज वह अफगानिस्तान की सीमा पर खड़े होकर पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा संदेश दे रही है। इस 300 किलोमीटर के माउंटेन मार्च में रूसी सैनिकों ने पामीर और तियान शान के बेहद ऊंचे दर्रों को पार किया। जहाँ ऑक्सीजन बेहद कम थी और तापमान शून्य से नीचे जा चुका था। इस युद्धाभ्यास में रूस ने अपने सबसे आधुनिक ओरलान-30 और फोर्पोस्ट-आर ड्रोन तैनात किए हैं। ये ड्रोन संकरी घाटियों में लेज़र टार्गेट बनाकर 24 घंटे लाइव मॉनिटरिंग कर रहे हैं।
इतना ही नहीं, इस एक्सरसाइज में ग्राउंड-बेस्ड रोबोटिक कॉम्बैट सिस्टम्स का भी इस्तेमाल हो रहा है। ये मानवरहित रोबोटिक गाड़ियां एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों और 7.62 एमएम मशीनगनों से पूरी तरह लैस हैं। हवा में एमआई-24 और एमआई-8एएमटीएसएच टर्मिनेटर हेलीकॉप्टर रडार से बचकर बहुत नीचे उड़ान भर रहे हैं। आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि यह 7 दिवसीय अभ्यास सीमा पार के विद्रोही गुटों को रोकने के लिए है। लेकिन कूटनीति के जानकार जानते हैं कि इसका असली निशाना आईएसकेपी यानी इस्लामिक स्टेट खुरासान है। रूस और उज़्बेकिस्तान का यह कड़ा पहरा तालिबान के खिलाफ नहीं, बल्कि तालिबान के दुश्मनों के खिलाफ है।
अब उस रहस्य से पर्दा हटाते हैं जिसने पूरी दुनिया के सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स को चौंका दिया है। साल 2003 में रूस की सुप्रीम कोर्ट ने तालिबान को आतंकवादी संगठन घोषित किया था। लेकिन 2026 में मॉस्को ने इस 23 साल पुराने फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। तर्मेज़ युद्धाभ्यास से ठीक पहले रूस के विशाल सैन्य अभ्यास ‘त्सेंट्र-2026’ में तालिबान के रक्षा मंत्रालय का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल आधिकारिक ऑब्जर्वर बनकर शामिल हुआ था। जिन तालिबानी लड़ाकों पर कभी रूसी हथियारों से हमले होते थे, आज वही कमांडर रूसी जनरल स्टाफ के साथ बैठकर आधुनिक एयर डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की ट्रेनिंग देख रहे थे।
रूस के इस बड़े यू-टर्न के पीछे तीन बहुत बड़े और ठोस कारण हैं। पहला कारण है सोवियत हथियारों की मरम्मत। तालिबान के पास आज भी बड़ी संख्या में सोवियत दौर के टी-55 और टी-62 टैंक, बीएमपी बख्तरबंद गाड़ियां और एमआई-17 हेलीकॉप्टर मौजूद हैं। अमेरिकी सेना जो हथियार छोड़कर भाग ई थी, उनके स्पेयर पार्ट्स अब खत्म हो रहे हैं। तालिबान को अपने सोवियत हथियारों को जिंदा रखने के लिए रूसी कलपुर्जों और तकनीकी मदद की सख्त जरूरत है।
दूसरा कारण है साझा दुश्मन आईएसकेपी। 22 मार्च 2024 को मॉस्को के क्रॉकस सिटी हॉल में हुए कायराना आतंकी हमले के तार सीधे आईएसकेपी से जुड़े थे। इससे पहले काबुल में रूसी दूतावास पर भी आत्मघाती हमला हुआ था। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि अफगानिस्तान की जमीन पर आईएसकेपी का खात्मा केवल तालिबान ही कर सकता है। इसलिए मॉस्को और काबुल के बीच खुफिया तालमेल अब अपने चरम पर पहुंच चुका है।
तीसरा कारण है औपचारिक कूटनीति। रूस की सरकार तालिबान को आतंकी ब्लैकलिस्ट से बाहर निकालने की कानूनी प्रक्रिया पूरी कर चुकी है। 2026 में रूस तालिबान को कोई खतरा नहीं, बल्कि अपनी यूरेशियन सिक्योरिटी का एक बेहद मजबूत और जरूरी ढाल मान रहा है।
अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए, जहाँ पाकिस्तान का सबसे बड़ा सपना जलकर राख हो चुका है। 15 अगस्त 2021 को जब काबुल में सत्ता बदली थी, तब इस्लामाबाद और रावलपिंडी के जीएचक्यू में जश्न मनाया जा रहा था। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के तत्कालीन चीफ फैज़ हमीद ने काबुल के सेरेना होटल में चाय पीते हुए मुस्कुराकर कहा था कि फिक्र मत करो, सब ठीक हो जाएगा। पाकिस्तानी जनरलों का 1980 के दशक से एक ही सपना था, जिसे वे ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ कहते थे। जनरल जिया-उल-हक से लेकर परवेज मुशर्रफ तक का मानना था कि भारत के साथ जंग की सूरत में वे अफगानिस्तान की जमीन को अपने मिलिट्री बेस की तरह इस्तेमाल करेंगे।
लेकिन 2026 तक आते-आते यह स्ट्रैटेजिक डेप्थ पाकिस्तान के लिए एक भयानक दुस्वप्न बन चुकी है। 1893 में ब्रिटिश अफसर सर मोर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर के बीच खींची गई 2640 किलोमीटर लंबी डूरंड लाइन को किसी भी अफगान सरकार ने कभी स्वीकार नहीं किया। आज के तालिबान ने भी इस लकीर को मानने से साफ इनकार कर दिया है। सत्ता संभालते ही तालिबानी लड़ाकों ने पाकिस्तान की लगाई अरबों डॉलर की कटीली बाड़ को बुलडोज़रों से उखाड़ फेंका। तालिबान के रक्षा मंत्री मुल्ला मोहम्मद याकूब ने खुलेआम ऐलान कर दिया कि डूरंड लाइन सिर्फ एक फर्जी लकीर है और इस पर कोई भी दीवार बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस आग में सबसे बड़ा घी डाला टीटीपी यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने। अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में 7 बिलियन डॉलर से ज्यादा के घातक हथियार छोड़ गई थी। इनमें एम4 और एम16 असॉल्ट राइफलें, थर्मल नाइट-विज़न गॉगल्स और लंबी दूरी की स्नाइपर राइफलें शामिल थीं। ये सारे हथियार आज टीटीपी के हाथों में हैं। जब टीटीपी के हमलों में खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के अंदर पाकिस्तानी सैनिक भारी तादाद में मारे जाने लगे, तो घबराकर रावलपिंडी ने अपने जेएफ-17 फाइटर जेट्स से अफगानिस्तान के पक्तिका, खोस्त और कुनार में एयरस्ट्राइक कर दी।
इस एयरस्ट्राइक के जवाब में तालिबान ने कोई कागजी विरोध नहीं जताया। उन्होंने सीधे सोवियत दौर की डी-30 तोपों के मुंह पाकिस्तान की चौकियों की तरफ खोल दिए। तोरखम, चमन, स्पिन बोल्डक और डांड-ए-पाटन सेक्टरों में घंटों तक चले सीधे तोपखाने के मुकाबले ने पाकिस्तानी सेना के पसीने छुड़ा दिए। बदले की आग में अंधी होकर पाकिस्तानी हुकूमत ने 15 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को जबरन देश से बाहर निकाल दिया। महीनों तक ट्रेड रूट्स बंद कर दिए। नतीजा यह निकला कि आज काबुल का बच्चा-बच्चा और तालिबान का हर लड़ाका पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा धोखेबाज दुश्मन मानता है।
अब सवाल उठता है कि इस पूरे महायुद्ध में भारत कहाँ खड़ा है? क्या यह सब भारत के इशारे पर हो रहा है? इस खेल की असली मास्टरक्लास नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में रची गई है। जब पूरी दुनिया अफगानिस्तान को सिर्फ बारूद और जंग के चश्मे से देख रही थी, तब भारत ने बंदूकों की जगह डेवलपमेंट का रास्ता चुना। भारत ने अफगानिस्तान में कभी बूट्स ऑन द ग्राउंड नहीं भेजे, बल्कि बिल्डिंग्स ऑन द ग्राउंड खड़ी कीं।
भारत ने हेरात में 42 मेगावाट का ऐतिहासिक सलमा डैम बनाया, जिसे भारत-अफगान फ्रेंडशिप डैम कहा जाता है। काबुल में 90 मिलियन डॉलर की लागत से अफगानिस्तान का शानदार संसद भवन तैयार किया, जिसके एक बड़े ब्लॉक का नाम भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया। हमारे जवानों ने अपनी जान पर खेलकर 218 किलोमीटर लंबा ज़रंज-देलाराम हाईवे बनाया, जिसे रूट 606 कहते हैं। काबुल के बच्चों के लिए इंदिरा गांधी बाल चिकित्सालय बनाया और शहर के पीने के पानी के लिए शहतूत डैम की नींव रखी।
जब 2021 में हालात बदले, तो कई वेस्टर्न कंट्रीज को लगा कि भारत का पूरा इन्वेस्टमेंट डूब गया। लेकिन भारत की फॉरेन पॉलिसी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की नीति पर टिकी थी। जब पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान के 9.5 बिलियन डॉलर के फॉरेन फंड्स फ्रीज कर दिए और वहां भुखमरी फैलने लगी, तब भारत ने मानवता का परिचय देते हुए 50000 मीट्रिक टन गेहूं की विशाल खेप काबुल भेजी। दर्जनों टन लाइफ सेविंग मेडिसिंस, कैंसर की दवाएं और टीबी के टीके भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमानों से सीधे काबुल उतारे गए।
जून 2022 में भारत ने एक साहसिक फैसला लेते हुए काबुल दूतावास में अपना टेक्निकल मिशन दोबारा शुरू कर दिया। विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी जे.पी. सिंह ने काबुल जाकर तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी, रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब और उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर से सीधी टेबल टॉक की। तालिबान के शीर्ष नेतृत्व ने कैमरे के सामने माना कि भारत ने कभी अफगानिस्तान का बुरा नहीं चाहा और वे भारत को अपना सच्चा दोस्त मानते हैं। तालिबान ने भारत को यह लिखित भरोसा भी दिया कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कभी भी लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसे भारत विरोधी आतंकी गुटों को नहीं करने दिया जाएगा।
इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के उस 40 साल पुराने ब्लैकमेल की कमर तोड़ दी, जिसे कराची पोर्ट मोनोपॉली कहा जाता था। पाकिस्तान हमेशा भारत के ट्रेड ट्रक्स को वाघा बॉर्डर पर रोक देता था। वह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से काट कर रखना चाहता था। लेकिन मई 2024 में भारत ने ईरान के साथ चाबहार पोर्ट के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन का ऐतिहासिक 10-वर्षीय अनुबंध साइन कर लिया।
आज कार्गो मुंबई और कांडला बंदरगाह से निकलता है और सीधे चाबहार पहुंचता है। वहां से रोड और रेल नेटवर्क के जरिए जाहेदान और मिलक बॉर्डर होते हुए भारत के बनाए ज़रंज-देलाराम हाईवे पर चढ़ जाता है। वहां से हेरात, काबुल, कंधार और मज़ार-ए-शरीफ़ तक पहुंचना बेहद आसान हो चुका है। 2026 के ताजा ट्रेड डेटा के मुताबिक, अफगानिस्तान का 70% से ज्यादा इंटरनेशनल ट्रेड अब पाकिस्तान के कराची पोर्ट को छोड़कर चाबहार और बंदर अब्बास के रास्ते हो रहा है। तालिबान ने अपने ट्रेडर्स को साफ हिदायत दी है कि कराची पोर्ट पर पाकिस्तानी कस्टम्स की रिश्वतखोरी झेलने की कोई जरूरत नहीं है।
यही रोड आगे चलकर 7200 किलोमीटर लंबे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी आईएनएसटीसी से जुड़ती है। तर्मेज़ से मज़ार-ए-शरीफ़ और हेरात होते हुए ईरान के चाबहार तक जाने वाला वेस्टर्न कॉरिडोर अब हकीकत बन चुका है। भारत को उज़्बेकिस्तान और कज़ाकिस्तान का यूरेनियम, ऑयल और रेयर अर्थ मिनरल्स चाहिए। सेंट्रल एशिया को भारत की मेडिसिंस, आईटी और बड़ा मार्केट चाहिए। इस ट्रेड कॉरिडोर में अफगानिस्तान एक सेफ ट्रांजिट हब बन चुका है और रूस इस पूरे रूट का सबसे बड़ा सिक्योरिटी गारंटर है।
अब उस खामोश खेल को समझिए जो बंद कमरों में चल रहा है। अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसी जीडीआई का नेतृत्व मुल्ला अब्दुल हक वासिक कर रहे हैं। जीडीआई ने सत्ता में आते ही अफगान सिक्योरिटी अप्पाराटस से पाकिस्तान की आईएसआई के पुराने वफादारों को चुन-चुनकर बाहर कर दिया। इसके बाद जीडीआई, रूस की खुफिया एजेंसी एफएसबी और इंडियन एजेंसीज के बीच एक अनऑफिशियल कोऑर्डिनेशन शुरू हुआ।
क्रॉकस सिटी हॉल हमले के बाद मॉस्को की एफएसबी और काबुल की जीडीआई के बीच सीधी हॉटलाइन खुली। तालिबान ने नॉर्थ अफगानिस्तान में आईएसकेपी के कमांडर्स का सफाया किया और उनसे मिले डिजिटल एविडेंस सीधे मॉस्को को सौंपे। बदले में रूस ने उन्हें सैटेलाइट इमेजरी और सिग्नल इंटेलिजेंस देना शुरू किया। उधर, इंडियन सिक्योरिटी एजेंसीज की चिंता थी कि पाकिस्तान कहीं लश्कर और जैश के ट्रेनिंग कैंप्स को पीओके से हटाकर ईस्ट अफगानिस्तान के कुनार या नंगरहार में शिफ्ट न कर दें। जब भारत ने इस पर पुख्ता इनपुट्स शेयर किए, तो तालिबान ने तुरंत सख्त एक्शन लेते हुए पाकिस्तानी प्रॉक्सी ऑर्गेनाइजेशन्स को अफगान धरती समेटने पर मजबूर कर दिया।
अब जरा नक्शे को गौर से देखिए। ईस्ट में इंडियन आर्मी अपनी पूरी ताकत के साथ एलओसी पर मुस्तैद खड़ी है। भारत के पास राफेल, एस-400 और अचूक ब्रह्मोस मिसाइलों का डिफेंस शील्ड है। वेस्ट में डूरंड लाइन पर अमेरिकी नाटो हथियारों और डी-30 तोपों से लैस अफगान तालिबान और टीटीपी के लड़ाके पाकिस्तानी सेना पर लगातार हमले बोल रहे हैं। नॉर्थ में अमु दरिया के किनारे रूस और उज़्बेकिस्तान की सेनाएं आधुनिक ड्रोन्स और रोबोटिक टैंक्स के साथ खड़ी हैं।
आज पाकिस्तान अपने ही बनाए भस्मासुर के चक्रव्यूह में घिर चुका है। पाकिस्तान की 60% से अधिक सेना और पैरामिलिट्री फोर्सेज अपनी ईस्टर्न बॉर्डर को छोड़कर वेस्टर्न फ्रंट पर अपने ही पाले हुए लड़ाकों से लड़ने में उलझ चुके हैं। देश इकोनॉमिक बैंकप्सि की कगार पर है और आईएमएफ के लोन्स की किस्तों पर सांसें गिन रहा है। उसका तथाकथित सदाबहार दोस्त चीन भी सीपीईसी प्रोजेक्ट्स पर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में चीनी इंजीनियर्स पर हो रहे हमलों से बुरी तरह खफा है।
भारत ने बिना एक भी सैनिक भेजे, बिना किसी देश की सोवरेनिटी का उल्लंघन किए, सिर्फ डिप्लोमेसी, डेवलपमेंट वर्क्स और स्ट्रैटेजिक विजन के दम पर वह मुकाम हासिल कर लिया जिसे अमेरिका 20 साल में 2 ट्रिलियन डॉलर फूंक कर भी हासिल नहीं कर पाया। आज काबुल से लेकर कंधार तक अफगान अवाम के दिल में भारत के लिए जो गहरा विश्वास है, वही भारत का सबसे बड़ा स्ट्रैटेजिक हथियार बन चुका है।
अमु दरिया के किनारे खड़ा हर रूसी टैंक और डूरंड लाइन पर गरजती हर तोप आज एक ही गवाही दे रही है कि यूरेशिया का नया इतिहास लिखा जा चुका है। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान अपने इस टू-फ्रंट्स के दलदल से कभी बाहर निकल पाएगा, या फिर इतिहास का यह चक्रव्यूह उसके सारे पुराने मंसूबों को हमेशा के लिए दफ्न कर देगा? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।





