लाल सागर में भारत का सीक्रेट ऑपरेशन: INS त्रिशूल ने कैसे फेल किया पाकिस्तान का प्लान?

लाल सागर में भारत का सीक्रेट ऑपरेशन: INS त्रिशूल ने कैसे फेल किया पाकिस्तान का प्लान?

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच भारतीय नौसेना के युद्धपोत INS त्रिशूल ने अपनी रणनीतिक तैनाती की है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सुरक्षा के लिए 40,000 सैनिकों का प्रस्ताव दिया था, लेकिन भारत ने ‘ऑपरेशन संकल्प’ के तहत क्षेत्र में अपनी स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज की। INS त्रिशूल ने अपने एडवांस रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का इस्तेमाल कर व्यापारिक समुद्री रास्तों को सुरक्षित किया। इसके बाद, युद्धपोत ने भूमध्य सागर में प्रवेश कर फ्रांस के साथ ‘वरुण’ युद्धाभ्यास में हिस्सा लिया और स्पेन के वालेंसिया बंदरगाह तक पहुंच बनाई।रियाद के बंद कमरों में एक बहुत बड़ा सीक्रेट गेम खेला जा रहा था। पाकिस्तान का जीएचक्यू एक ऐसा जाल बुन रहा था जिससे न सिर्फ सऊदी अरब को बेवकूफ बनाया जा सके, बल्कि भारत को समंदर में घेरा जा सके। हूती विद्रोहियों के हमलों से डरे सऊदी अरब को खुश करने के लिए पाकिस्तान ने अपने चालीस हजार सैनिकों, कमांडोज और एयर डिफेंस यूनिट्स का दांव चल दिया। उसका असली मकसद हूतियों को रोकना नहीं था, बल्कि लाल सागर से लेकर अरब सागर तक अपने सैन्य अड्डे बनाना था। पाकिस्तान एक तीर से दो शिकार करना चाहता था। पहला, सऊदी से मोटा कैश और सस्ता तेल लेना और दूसरा, भारत के समुद्री व्यापार मार्ग पर चोकपॉइंट बनाना। लेकिन पाकिस्तान यह भूल गया कि अब दिल्ली में फाइलें दबाई नहीं जातीं, बल्कि सीधे एक्शन लिया जाता है।

गहरे समंदर की लहरों को चीरता हुआ भारत का एक ऐसा जंगी जहाज सामने आया जिसने पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि चीन और अमेरिका तक के होश उड़ा दिए। यह था भारतीय नौसेना का गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट आईएनएस त्रिशूल। चार हजार टन का यह भीमकाय स्टील मॉन्स्टर बिना कोई शोर मचाए बाब अल मंदेब के मुहाने पर पहुंच गया। इसके वर्टिकल लॉन्च सिस्टम में दुनिया की सबसे घातक सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइलें लोड थीं। यह जहाज वहां कोई पट्रोलिंग करने नहीं गया था, बल्कि यह भारत का एक ऐसा कड़ा संदेश था जिसने पूरी जियोपॉलिटिक्स की बिसात को एक झटके में पलट कर रख दिया।

लाल सागर कोई आम जगह नहीं है। यहां से दुनिया का बारह प्रतिशत व्यापार गुजरता है। अगर स्वेज नहर और यह रूट ब्लॉक हो जाए तो यूरोप और एशिया की अर्थव्यवस्था चंद दिनों में क्रैश हो जाएगी। जब यमन के हूती विद्रोहियों ने इस रूट पर सुसाइड ड्रोन और एंटी शिप बैलिस्टिक मिसाइलें दागनी शुरू कीं, तो दुनिया भर में पैनिक मच गया। अमेरिका ने अपने वॉरशिप वहां भेज दिए और पच्चीस लाख डॉलर की मिसाइलें फायर करके दो हजार डॉलर के ड्रोनों को गिराने लगा। यह सीधे तौर पर अमेरिका का दिवालियापन था। पेंटागन से दिल्ली फोन घुमाए गए। कहा गया कि भारत भी अमेरिका के ऑपरेशन प्रोस्पेरिटी गार्जियन में शामिल हो जाए और उनके झंडे के नीचे काम करे। लेकिन भारत ने दो टूक जवाब दे दिया। भारत ने साफ कह दिया कि हम किसी विदेशी झंडे के पीछे नहीं चलते, हम अपना ऑपरेशन खुद लीड करते हैं और समंदर में हमारी सुरक्षा की गारंटी हम खुद हैं।

यहीं से शुरू हुआ भारत का स्वतंत्र और बेहद आक्रामक मिशन जिसका नाम है ऑपरेशन संकल्प। लाल सागर में जहां अमेरिकी नेवी हूतियों के सस्ते ड्रोनों पर अपनी महंगी मिसाइलें बर्बाद कर रही थी, वहीं आईएनएस त्रिशूल ने अपना स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सुइट ऑन कर दिया। त्रिशूल पर लगा एडवांस थ्रीडी रडार तीन सौ किलोमीटर दूर से ही दुश्मन के ड्रोनों की लोकेशन लॉक कर लेता था। जैसे ही कोई सुसाइड ड्रोन त्रिशूल के दायरे में आता, भारत के पावरफुल जैमर्स उसके जीपीएस और सैटेलाइट लिंक को काट देते। कनेक्शन टूटते ही ड्रोन दिशा भटककर सीधे समंदर के खारे पानी में गिरकर नेस्तनाबूद हो जाते। और अगर कोई इक्का दुक्का ड्रोन बच भी जाता, तो त्रिशूल पर लगा काश्तनान क्लोज इन वेपन सिस्टम एक्टिव हो जाता। इसकी रोटरी तोपें एक मिनट में दस हजार राउंड फायर करती हैं। हवा में गोलियों की ऐसी लोहे की दीवार बनती है कि कोई भी मिसाइल या ड्रोन पलक झपकते ही राख में तब्दील हो जाता है। बिना एक भी महंगी मिसाइल बर्बाद किए भारत ने लाल सागर में सुरक्षा की एक ऐसी अभेद्य दीवार खड़ी कर दी, जिसे देखकर अमेरिकी नेवी के एडमिरल भी हैरान रह गए।

आईएनएस त्रिशूल की ताकत सिर्फ इसके हथियार नहीं हैं, बल्कि इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका स्टील्थ डिजाइन है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि दुश्मन के रडार सिस्टम इसे पकड़ ही नहीं पाते। इसके पूरे ढांचे पर खास रडार एब्जॉर्बिंग पेंट किया गया है और इसका एग्जॉस्ट सिस्टम गर्म गैसों को ठंडी हवा में मिलाकर बाहर फेंकता है जिससे इन्फ्रारेड सेंसर्स को भी चकमा दिया जा सके। यही वजह थी कि जब यह युद्धपोत हॉर्न ऑफ अफ्रीका में जिबूती में बने चीन के सबसे बड़े विदेशी नौसैनिक अड्डे के सामने से गुजरा, तो बीजिंग के करोड़ों डॉलर वाले एडवांस रडार पूरी तरह फेल हो गए। चीनी कमांडरों के सिस्टम पर त्रिशूल का सिग्नल एक छोटी सी लकड़ी की नाव जैसा दिख रहा था। लेकिन जब उन्होंने विजुअल पहचान की और अपनी आंखों से देखा कि चार हजार टन का एक घातक भारतीय फ्रिगेट उनके दरवाजे पर सीना ताने खड़ा है, तो उनके पसीने छूट गए।

त्रिशूल की रफ्तार और मारक क्षमता किसी भी दुश्मन की रीढ़ की हड्डी तोड़ने के लिए काफी है। छप्पन हजार हॉर्सपावर का इसका टर्बाइन सिस्टम इसे साठ किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार देता है। लेकिन असली खौफ इसके हथियारों का है। इसके साइलो में जो ब्रह्मोस मिसाइलें तैनात हैं, वो आवाज से तीन गुना ज्यादा तेजी से उड़ती हैं। समंदर की सतह से सिर्फ पांच से दस मीटर ऊपर सी स्किमिंग करते हुए जब ब्रह्मोस दुश्मन के युद्धपोत की तरफ बढ़ती है, तो दुनिया का कोई भी एयर डिफेंस उसे इंटरसेप्ट नहीं कर सकता। तीन सौ किलो का वॉरहेड जब तीन हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से टारगेट को हिट करता है, तो भारी से भारी जंगी जहाज बीच से दो टुकड़े हो जाता है। इसके अलावा हवा से आने वाले खतरों से निपटने के लिए त्रिशूल पर श्टिल वन एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है जो 32 किलोमीटर के दायरे में किसी भी फाइटर जेट को हवा में ही खाक कर सकता है। गहरे पानी में छिपी पनडुब्बियों का शिकार करने के लिए इसके पास टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर हमेशा लोड रहते हैं।

लाल सागर में अपना दबदबा कायम करने के बाद आईएनएस त्रिशूल का मिशन यहीं नहीं रुका। त्रिशूल स्वेज नहर को पार करता हुआ सीधे भूमध्य सागर में दाखिल हो गया। भूमध्य सागर को ऐतिहासिक रूप से नाटो का सुरक्षित घर माना जाता है, लेकिन वहां भी भारत ने अपनी धमक दिखा दी। भारतीय युद्धपोत सीधे फ्रांस के सबसे बड़े तूलों नेवल बेस पहुंचा और वहां फ्रांसीसी नेवी के साथ वरुण युद्धाभ्यास में हिस्सा लिया। समंदर में नकली मिसाइल हमले रोके गए और पनडुब्बी रोधी युद्धाभ्यास किए गए। फ्रांस में अपनी ताकत का लोहा मनवाने के बाद त्रिशूल ने स्पेन के वालेंसिया बंदरगाह पर जाकर लंगर डाल दिया। यूरोप के पश्चिमी किनारे पर भारतीय नौसेना के इस शक्ति प्रदर्शन ने तुर्की के अंकारा और पाकिस्तान के रावलपिंडी में सन्नाटा पसार दिया। तुर्की जो खुद को भूमध्य सागर का सुल्तान समझता है, उसे भारत ने उसके घर के पास जाकर दिखा दिया कि हमारी पहुंच अब कहां तक हो चुकी है।

जिस समय समंदर में आईएनएस त्रिशूल गरज रहा था, ठीक उसी वक्त नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में एक दूसरी बड़ी कूटनीतिक जीत लिखी जा रही थी। सऊदी अरब और यूएई के टॉप मिलिट्री डेलीगेशन भारत के रक्षा मंत्रालय के चक्कर काट रहे थे। वे अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम की नाकामी से बुरी तरह परेशान हो चुके थे और उन्हें भारत की ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और पिनाका रॉकेट सिस्टम में अपना भविष्य नजर आ रहा था। फिलीपींस पहले ही भारत से करोड़ों डॉलर की ब्रह्मोस बैटरियां खरीद चुका है। अब खाड़ी देशों को भी यह समझ आ गया है कि पाकिस्तान की खोखली फौज उन्हें कोई सुरक्षा नहीं दे सकती। भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि ग्लोबल पॉवर को टक्कर देने वाले हथियार बेचने वाला महाबली बन चुका है।

इस पूरी रणनीति के पीछे भारत का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है आईएमईसी यानी इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को सुरक्षित करना। चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर अरबों डॉलर खर्च किए ताकि वह हिंद महासागर को कंट्रोल कर सके। लेकिन भारत ने आईएमईसी के जरिए चीन के सीपेक प्रोजेक्ट का गला घोंट दिया है। आईएनएस त्रिशूल का लाल सागर से लेकर फ्रांस और स्पेन तक का सफर असल में इसी नए ट्रेड रूट की एक लाइव पेट्रोलिंग थी। भारत ने दुनिया को यह साफ संदेश दे दिया है कि अरब सागर से लेकर भूमध्य सागर तक इस पूरे इलाके की सुरक्षा करने की कुव्वत केवल और केवल भारतीय नौसेना में है। चीन के ग्वादर प्लान को समंदर में ही दफन कर दिया गया है।

यह इस बात का सबूत है कि भारत अब एक फुल फ्लेज्ड ब्लू वाटर नेवी बन चुका है। ब्लू वाटर नेवी वो होती है जो अपने देश के तटों से हजारों किलोमीटर दूर गहरे महासागरों में महीनों तक लगातार अपने ऑपरेशन्स चला सकती है। भारत के पास आईएनएस दीपक और आईएनएस शक्ति जैसे बड़े फ्लीट टैंकर हैं जो समंदर के बीच में ही युद्धपोतों को रिफ्यूल कर देते हैं। हमारे पास दो दो एयरक्राफ्ट कैरियर और परमाणु पनडुब्बियां हैं। इसके साथ ही आसमान से निगरानी के लिए रुक्मिणी मिलिट्री सैटेलाइट और पी एट आई पोसेडॉन जैसे टोही विमान मौजूद हैं। त्रिशूल जब स्पेन में खड़ा था तब भी उसका हर सिग्नल दिल्ली के वॉर रूम में लाइव मॉनिटर हो रहा था।

भारत ने ओमान के दुक्म पोर्ट से लेकर मेडागास्कर और मॉरीशस तक अपनी रणनीतिक चौकियां मजबूत कर ली हैं। फ्रांस के साथ मिलकर रीयूनियन आइलैंड से पूरे हिंद महासागर पर नजर रखी जा रही है। जहां पाकिस्तान दूसरों से कर्ज मांग कर गुजारा कर रहा है, वहीं भारत का एक युद्धपोत मिडिल ईस्ट से लेकर यूरोप तक भारत का परचम लहरा रहा है।

आईएनएस त्रिशूल के मस्तूल पर लहराता छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्रा वाला नया ध्वज इस बात का प्रतीक है कि यह नया भारत है। यह वो भारत है जो अपनी सीमाओं की रक्षा केवल अपने तटों पर नहीं करता, बल्कि समंदर की असीम गहराइयों और दुनिया के सबसे खतरनाक मोर्चों पर जाकर दुश्मनों को उनकी औकात याद दिलाता है।

भारत की इस आक्रामक और सशक्त समुद्री रणनीति पर आपकी क्या राय है। क्या भारत को ऐसे और युद्धपोत लाल सागर और भूमध्य सागर में स्थायी तौर पर तैनात कर देने चाहिए। कमेंट बॉक्स में अपनी राय पूरी ताकत से लिखकर बताइए।

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