जब ईरान की घातक मिसाइलें स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को दुनिया का सबसे खतरनाक जोन बनाने पर तुली थीं, ठीक उसी वक्त नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक और अबू धाबी के प्रेसिडेंशियल पैलेस में आधी रात को एक ऐसी सीक्रेट डील फाइनल हुई, जिसने रातों-रात पूरी दुनिया की जियो-पॉलिटिकल बाजी ही पलटकर रख दी। दुनिया का आठवां अजूबा कहे जाने वाले दुबई के विश्वप्रसिद्ध जेबेल अली पोर्ट को दरकिनार करके, शारजाह ने हॉर्मुज के उस खतरनाक घेरे से बाहर निकलकर अपनी तिजोरी की सबसे गुप्त और ताकतवर चाबी सीधे भारत के हाथों में थमा दी। क्या तेल के अथाह कुओं पर बैठे अमीर अरब मुल्क सचमुच जंग छिड़ते ही सिर्फ 21 दिनों के भीतर दाने-दाने को तरसने वाले थे? क्या भारत ने अपनी जामनगर और वाडिनार रिफाइनरियों का क्रूड ऑयल बचाने के बदले, पूरे मिडिल ईस्ट का पेट भरने की कोई विशालकाय रणनीतिक डील कर ली थी?
आज इन सभी सवालों के जवाब फारस की खाड़ी के उस तनावपूर्ण भूगोल में छिपे हैं, जहां इस वक्त पूरी दुनिया की सांसें अटकी हुई हैं। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच फंसा हुआ स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज कोई आम समुद्री रास्ता नहीं है। यह केवल 39 से 96 किलोमीटर चौड़ा एक ऐसा संकरा वॉटर-वे है, जहां से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा और पूरी दुनिया की लिक्विड पेट्रोलियम खपत का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गुजरता है। सैकड़ों विशालकाय वीएलसीसी ऑयल टैंकर और मेगा कंटेनर शिप दिन-रात यहां कतारबद्ध होकर चलते हैं। लेकिन आज के इस दौर में मिडिल ईस्ट का मिलिट्री टेंशन अपने चरम बिंदु पर पहुंच चुका है। लाल सागर में यमन के हूती विद्रोहियों ने बैलिस्टिक मिसाइलों और कामिकेज़ ड्रोनों के जरिए पहले ही ग्लोबल सप्लाई चेन में कोहराम मचा रखा है। स्वेज नहर का पूरा ट्रैफिक केप ऑफ गुड होप की तरफ मुड़ चुका है। जहाजों को 10 से 14 दिन का एक्स्ट्रा चक्कर लगाना पड़ रहा है और ग्लोबल इकॉनमी को करोड़ों डॉलर का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। लेकिन दुनिया के बड़े देशों का असली खौफ लाल सागर कभी था ही नहीं। असली खौफ था स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के चोकपॉइंट का पूरी तरह से बंद हो जाना।
तेहरान ने हमेशा अपनी डिफेंस स्ट्रेटजी में हॉर्मुज को अपना अंतिम ब्रह्मास्त्र माना है। ईरान की ताकतवर आईआरजीसी ने हॉर्मुज के मुहाने पर मौजूद तीन सबसे रणनीतिक द्वीपों—अबू मूसा, ग्रेटर ट्यूनब और लेसर ट्यूनब को एक अभेद्य मिलिट्री फोर्ट्रेस में तब्दील कर दिया है। इन द्वीपों पर नूर, कादर और खलीद फारस जैसी हाइपर-लीथल एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों की भारी तैनाती है। अगर आज ईरान और अमेरिका के बीच फुल-स्केल वॉर भड़कता है, तो ईरान को हॉर्मुज को पूरी तरह बंद करने के लिए कोई बहुत बड़ी नेवल फ्लीट की जरूरत भी नहीं है। वह केवल समंदर में कुछ दर्जन सी-माइन्स बिछाकर और दो-चार कार्गो जहाजों पर मिसाइल दागकर इस पूरे रास्ते पर हमेशा के लिए ताला लगा सकता है।
यहीं पर अरब मुल्कों की सबसे कमजोर नस दुनिया के सामने आ जाती है। दुबई का महाकाय जेबेल अली पोर्ट हो, सऊदी अरब का रास तनूरा और दम्माम हो, बहरीन का मीना सलमान हो, कुवैत का शुवैख पोर्ट हो या कतर का रास लफ्फान—मिडिल ईस्ट के ये सारे मेगा पोर्ट्स हॉर्मुज के अंदर फारस की खाड़ी में कैद हैं। अगर हॉर्मुज का यह संकरा दरवाजा बंद हो गया, तो फारस की खाड़ी एक विशाल बंद झील बन जाएगी। न कोई तेल टैंकर बाहर आ सकेगा, और न ही दुनिया का कोई मालवाहक जहाज अंदर जा सकेगा। खाड़ी के ये रेगिस्तानी देश अपनी जरूरत का 80 से 90 प्रतिशत खाद्यान्न विदेशों से इंपोर्ट करते हैं। हॉर्मुज बंद होने का सीधा मतलब था कि अरब देशों के सुपरमार्केट्स सिर्फ तीन हफ्तों में पूरी तरह खाली हो जाते और वहां भुखमरी की नौबत आ जाती। यह एक ऐसा नाइटमेयर था, जिससे बचने के लिए अरब देश किसी भी हद तक जाने को तैयार थे।
दूसरी तरफ नई दिल्ली में भी खतरे के रेड अलर्ट बज चुके थे। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल इंपोर्ट करता है। इसमें से लगभग 50 से 55 प्रतिशत तेल और एलएनजी सीधे इसी हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर भारत के पश्चिमी तटों तक आती है। भारत की दिग्गज रिफाइनरियां, चाहे वह जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज हो, वाडिनार में नायरा एनर्जी हो, या फिर मंगलूरु और कोच्चि की विशाल सरकारी रिफाइनरियां—इन सभी के पास नॉर्मल ऑपरेशंस के लिए एक लिमिटेड क्रूड स्टॉक ही होता है। इतना ही नहीं, जीसीसी देशों के साथ भारत का 160 अरब डॉलर से अधिक का भारी-भरकम सालाना व्यापार दांव पर लगा था। खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और रोजी-रोटी पर सीधा संकट खड़ा हो गया था।
और ठीक इसी नाजुक मोड़ पर, भारत और यूएई के कूटनीतिक गलियारों में एक ऐसी सीक्रेट प्लानिंग तैयार की गई, जिसने ग्लोबल लॉजिस्टिक्स के सारे पुराने नियम तोड़ दिए। यूएई के प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की पर्सनल केमिस्ट्री और मजबूत रणनीतिक साझेदारी से एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक निकला, जिसने चीन से लेकर अमेरिका तक सबको हैरान कर दिया। यूएई के सात अमीरातों में से एक—शारजाह ने भारत सरकार और भारतीय उद्योगपतियों के सामने 3 अरब डॉलर यानी लगभग 25,000 करोड़ रुपये का एक ऐसा मेगा ऑफर रख दिया, जिसने पूरे खाड़ी क्षेत्र के ट्रेड मैप को ही री-राइट कर दिया। यह ऐतिहासिक प्रस्ताव था शारजाह के पूर्वी तट पर स्थित खोरफक्कन पोर्ट के अभूतपूर्व विस्तार और रणनीतिक नियंत्रण में भारत की सीधी हिस्सेदारी का।
दुनिया जब भी यूएई को देखती है, तो उसकी नजर सिर्फ दुबई के ऊंचे बुर्ज खलीफा या अबू धाबी के तेल के कुओं पर जाकर टिक जाती है। लेकिन शारजाह का भूगोल अपने आप में एक कुदरती करिश्मा है, एक स्ट्रैटेजिक गोल्डमाइन है। शारजाह का मुख्य शहर भले ही फारस की खाड़ी पर स्थित हो, लेकिन उसके तीन बड़े एन्क्लेव—खोरफक्कन, कलबा और दिब्बा अल-हिस्न देश के पूर्वी तट पर मौजूद हैं। और यह तट सीधे ओमान की खाड़ी यानी खुले हिंद महासागर में खुलता है। अगर आप खोरफक्कन पोर्ट की भौगोलिक स्थिति को नक्शे पर देखेंगे, तो आपको भारत का मास्टरमाइंड समझ आएगा। यह बंदरगाह स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के पूरी तरह से बाहर स्थित है।
लॉजिस्टिक्स और डिफेंस की दुनिया में इसका सामरिक अर्थ बहुत बड़ा है। मुंबई के जेएनपीटी, गुजरात के मुंद्रा या कोच्चि से चलने वाला कोई भी भारतीय मालवाहक जहाज सीधे अरब सागर और ओमान की खाड़ी को पार करके खोरफक्कन पोर्ट पर सुरक्षित लंगर डाल सकता है। उसे हॉर्मुज के उस खतरनाक, संकरे और मिसाइलों से भरे 39 किलोमीटर के कॉरिडोर में एक इंच भी घुसने की कोई जरूरत नहीं है। भारतीय जहाज खुले इंटरनेशनल वाटर्स में रहता है, ईरान की कोस्टल मिसाइल बैटरियों की सीधी रेंज से बाहर रहता है, और लंदन के लॉयड्स सिंडिकेट का 10 लाख डॉलर का भारी भरकम वॉर रिस्क प्रीमियम एक झटके में शून्य हो जाता है।
खोरफक्कन कोई साधारण या छोटा-मोटा बंदरगाह नहीं है। इसका संचालन दुनिया की सबसे बड़ी स्वतंत्र पोर्ट ऑपरेटर कंपनी गुलफटेनर करती है। इस पोर्ट की प्राकृतिक गहराई 16 मीटर से अधिक है। इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया के सबसे बड़े विशालकाय कंटेनर जहाज, जिनकी क्षमता 18,000 से 20,000 टीईयू तक होती है, वे बिना किसी रुकावट के सीधे यहां आकर डॉक कर सकते हैं। शारजाह के दूरदर्शी शासक डॉ. शेख सुल्तान बिन मुहम्मद अल कासिमी और शारजाह इन्वेस्टमेंट एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ने भारत की बढ़ती ग्लोबल ताकत को पहचानते हुए, अपने दरवाजे पूरी तरह भारत के लिए खोल दिए।
लेकिन ग्लोबल क्रिटिक्स ने तुरंत एक बड़ा सवाल उछाला। उनका कहना था कि अगर भारतीय जहाज खोरफक्कन पर अपना माल सुरक्षित उतार भी देगा, तो वह माल वहां से दुबई, अबू धाबी या सऊदी अरब की राजधानी रियाद तक कैसे पहुंचेगा? क्या उसे फिर से समुद्री रास्ते से हॉर्मुज पार करना होगा? और यहीं पर एंट्री होती है यूएई के सबसे बड़े गेम-चेंजर प्रोजेक्ट की—एतिहाद रेल।
यूएई ने 1,200 किलोमीटर लंबे अपने नेशनल रेलवे नेटवर्क का निर्माण पूरा कर लिया है। यह भीमकाय रेल नेटवर्क सऊदी अरब की सीमा पर स्थित घवैफत से लेकर ओमान सीमा पर फुजैरा तक फैला हुआ है। यह एक हेवी-हॉल फ्रेट नेटवर्क है जो अब सीधे खोरफक्कन पोर्ट की गोदी से जुड़ चुका है। इसके साथ ही हजर के ऊंचे पहाड़ों को चीरकर बनाई गई 5 आधुनिक टनल वाली नई माउंटेन हाईवे प्रणाली खोरफक्कन को मुख्य भूमि से डायरेक्ट कनेक्ट करती है। मिलिट्री लॉजिस्टिक्स की भाषा में इसे ‘सी-टू-लैंड ब्रिज’ कहा जाता है।
इस सी-टू-लैंड ब्रिज की स्पीड और एफिशिएंसी देखिए। मुंद्रा या जेएनपीटी से जहाज चला और सिर्फ 48 से 60 घंटे में खोरफक्कन पहुंच गया। फास्ट-ट्रैक डिजिटल कस्टम क्लियरेंस के बाद सारा माल सीधे एतिहाद रेल की मालगाड़ियों या हेवी ट्रेलरों पर लाद दिया गया। खोरफक्कन से दुबई और अबू धाबी तक यह माल सिर्फ 2 से 4 घंटे में पहुंच जाता है। खोरफक्कन से सऊदी अरब के रियाद तक माल पहुंचने में महज 24 से 36 घंटे लगते हैं। और बहरीन या कतर तक यह माल 36 से 48 घंटे में डिलीवर हो जाता है।
पारंपरिक समुद्री रास्ते से हॉर्मुज को पार करके दम्माम या कुवैत जाने में जहाजों को ट्रैफिक जाम, चेकिंग और कंजेशन के कारण 7 से 10 दिन का लंबा समय लगता था। लेकिन भारत और यूएई के इस नए अल्टरनेटिव रूट ने उस समय को घटाकर एक-तिहाई कर दिया है। जहाजों का लाखों गैलन ईंधन बच गया, भारी-भरकम युद्ध बीमा बच गया और सामान तीन गुना तेजी से सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुंचने लगा। ईरान के मिसाइल ब्लॉकेड की पूरी धमकी को, समंदर, जमीन और पटरी की इस अचूक जुगलबंदी ने तकनीकी और कूटनीतिक रूप से पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया।
भारत की इस कूटनीति ने आज ग्लोबल मैरीटाइम इकॉनमी में ‘रेज़िलिएंस पोर्ट’ के एक नए सिद्धांत को जन्म दे दिया है। पिछले तीन दशकों से दुनिया केवल कॉस्ट एंड एफिशिएंसी यानी सस्ते और ‘जस्ट-इन-टाइम’ मॉडल पर अंधी होकर चल रही थी। उसी सोच से दुबई का जेबेल अली पोर्ट बना था। लेकिन यूक्रेन युद्ध, हूती हमलों और हॉर्मुज के बढ़ते तनाव ने दुनिया को यह कड़वी सच्चाई सिखा दी कि सिक्योरिटी के बिना एफिशिएंसी सिर्फ एक कागजी शेर है। दुनिया अब ‘जस्ट-इन-टाइम’ से हटकर ‘जस्ट-इन-केस’ मॉडल पर आ चुकी है। जेबेल अली अगर शांति काल का मुख्य दरवाजा है, तो खोरफक्कन संकट काल की जीवन-रक्षक खिड़की बन चुका है।
यह पूरी स्ट्रैटेजी 1 मई 2022 से लागू हुए भारत-यूएई सीईपीए समझौते का अगला और सबसे बड़ा चरण है। भारत के कॉर्पोरेट दिग्गज भी इस जियो-पॉलिटिकल बिसात पर मजबूती से अपने मोहरे चल चुके हैं। दुनिया भर में रणनीतिक बंदरगाहों को अपने कंट्रोल में लेने वाला अडानी पोर्ट्स खोरफक्कन कॉरिडोर में गहरी दिलचस्पी ले रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज अपनी जामनगर रिफाइनरी के पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स के लिए खोरफक्कन में विशाल वेयरहाउसिंग बेस तैयार कर रहा है। इसके अलावा, जी-20 में घोषित आईएमईसी यानी इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर के लिए खोरफक्कन एक ऐसा सुरक्षित ईस्टर्न नोड बन चुका है जिसे दुनिया की कोई भी जंग रोक नहीं सकती।
इस पूरी राष्ट्रवादी कूटनीति का सबसे मानवीय पहलू है—सामरिक खाद्य गलियारा। कूटनीति का सीधा और निर्मम नियम है—तुम हमारी भूख मिटाओ, हम तुम्हारी ऊर्जा की प्यास बुझाएंगे। यूएई की 80 प्रतिशत जमीन बंजर रेगिस्तान है, वे भोजन के लिए पूरी तरह विदेशों पर निर्भर हैं। दूसरी तरफ भारत दुनिया की निर्विवाद खाद्य महाशक्ति है। आई2यू2 फ्रेमवर्क के तहत यूएई ने भारत के गुजरात और मध्य प्रदेश में 2 अरब डॉलर के फूड पार्क्स में भारी निवेश किया है। अब भारतीय खेतों का प्रसंस्कृत अनाज मुंद्रा से सीधे खोरफक्कन के मेगा साइलो में पहुंचता है, और वहां से 12 से 24 घंटे के भीतर पूरे मिडिल ईस्ट के घरों में सप्लाई हो जाता है।





