वर्ष 1948 का समय था। श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 1200 किलोमीटर दूर हिंद महासागर के शांत पानी पर एक डच पनडुब्बी तैर रही थी। उस सबमरीन पर सवार वैज्ञानिक फेलिक्स वेनिंग मेनिज़ अपने खास गुरुत्वाकर्षण यंत्र से समंदर की गहराई की जांच कर रहे थे। तभी अचानक उनके उपकरण की सुई तेजी से नीचे गिरती है और रीडिंग देखकर उनके होश उड़ जाते हैं। ऐसा लग रहा था मानो समंदर के इस हिस्से के नीचे का गुरुत्वाकर्षण अचानक गायब हो गया हो। उस दौर में इस बात को किसी उपकरण की खराबी मानकर फाइलों में दबा दिया गया। लेकिन जब इक्कीसवीं सदी में नासा के जीआरएसीई और यूरोपियन स्पेस एजेंसी के गोसे सैटेलाइट्स ने अंतरिक्ष से पूरी पृथ्वी की थ्री-डी मैपिंग की, तो पूरी दुनिया के भूवैज्ञानिक सन्न रह गए। कन्याकुमारी से आगे निकलते ही, लगभग 30 लाख वर्ग किलोमीटर के दायरे में समंदर का पानी दुनिया के सामान्य समुद्री स्तर से पूरे 106 मीटर नीचे धंसा हुआ था।
यह कोई ऐसा गड्ढा नहीं था जिसमें पानी का कोई भयानक भंवर घूम रहा हो या जहां जहाज सीधे पाताल में समा जाते हों। यह पूरी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का सबसे बड़ा और अदृश्य पाताल था, जिसे विज्ञान की दुनिया में इंडियन ओशन जियोइड लो कहा जाता है। यहां पृथ्वी का अपना खिंचाव बाकी दुनिया के मुकाबले इतना कमजोर हो चुका है कि समंदर का अरबों टन पानी चारों तरफ छिटककर बाहर भाग गया है और बीच में एक विशालकाय कटोरा बन गया है। अगर आप आज किसी आधुनिक जहाज पर सवार होकर इस इलाके से गुजरेंगे, तो आपकी आंखों को सब कुछ सामान्य दिखेगा, लहरें वैसी ही उठती दिखेंगी, लेकिन आपके आधुनिक जीपीएस के आंकड़े चीख-चीख कर कहेंगे कि आप असल में समुद्र के 106 मीटर गहरे एक ढलान वाले गड्ढे के ऊपर तैर रहे हैं।
आखिर समंदर के बीच ऐसा क्या है जिसने पूरी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को ही सोख लिया है? क्या भारत के ठीक नीचे, 2900 किलोमीटर पाताल में कोई विशालकाय खाली गुफा बन चुकी है? या फिर करोड़ों साल पहले दफन हुआ टेथिस महासागर नीचे से धरती को खोखला कर रहा है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इसी समंदर की गहराइयों में वो डूबी हुई दुनिया छिपी है, जिसे प्राचीन तमिल इतिहास कुमारी कंदम और हमारे पुराण मत्स्य अवतार की प्रलय कहते हैं?
पृथ्वी का बेडौल आकार और गुरुत्वाकर्षण का खेल
आम तौर पर हम बचपन से किताबों में पढ़ते आए हैं कि हमारी पृथ्वी एक बिल्कुल गोल गेंद जैसी है। लेकिन असल में पृथ्वी ऐसी नहीं है। हमारी धरती अंतरिक्ष में घूमते हुए एक उबड़-खाबड़ और बेडौल आलू की तरह है। जहां जमीन के नीचे भारी धातुएं और घनी चट्टानें होती हैं, वहां गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव बहुत ज्यादा होता है और वह समंदर के पानी को अपनी तरफ खींच लेता है। लेकिन जहां नीचे का वजन कम होता है, वहां गुरुत्वाकर्षण कमजोर पड़ जाता है और पानी खिसककर आसपास के मजबूत इलाकों की तरफ भाग जाता है। इस गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव के हिसाब से अगर समुद्र के पानी का एक नक्शा खींचा जाए, तो उसे वैज्ञानिक भाषा में जियोइड कहा जाता है। हिंद महासागर के इस हिस्से में यही हुआ है। दशकों तक वैज्ञानिक सिर्फ अंधेरे में तीर चलाते रहे। किसी ने कहा कि यहां करोड़ों साल पहले कोई विशाल उल्कापिंड गिरा था जिसने मेंटल को हिला दिया, तो किसी ने दावा किया कि यहां धरती के भीतर कोई खाली जगह बन गई है।
लेकिन असल कहानी यहीं से एक नया और रोमांचक मोड़ लेती है। साल 2023 में बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिकों ने सुपरकंप्यूटर की मदद से पृथ्वी के पिछले 14 करोड़ साल का इतिहास खंगाला, तो जो सच सामने आया उसने भूविज्ञान की दुनिया में तहलका मचा दिया। इस रहस्य की जड़ें समंदर की सतह पर नहीं, बल्कि हमारे पैरों के ठीक नीचे, पृथ्वी के 2900 किलोमीटर गहरे पाताल में छिपी थीं, जहां पृथ्वी का मेंटल खत्म होता है और लोहे का बना हुआ धधकता कोर शुरू होता है। इस सीमा को वैज्ञानिक कोर-मेंटल बाउंड्री कहते हैं।
वैज्ञानिकों ने 19 अलग-अलग तरह के कंप्यूटर मॉडल चलाकर देखा कि आखिर भारत के नीचे ऐसा क्या गायब है जिससे गुरुत्वाकर्षण इतना कमजोर हो गया है। इसका सुराग तलाशने के लिए हमें समय के पहिए को लगभग 14 करोड़ साल पीछे घुमाना होगा। उस समय आज का भारत अपनी मौजूदा जगह पर नहीं था। भारत, अफ्रीका, मेडागास्कर और अंटार्कटिका एक साथ जुड़े हुए थे, जिसे गोंडवाना लैंड कहा जाता था। भारत और यूरेशिया यानी आज के एशिया के बीच एक बहुत बड़ा और अथाह महासागर लहराता था, जिसका नाम था टेथिस महासागर।
टेथिस महासागर की कब्रगाह और मैग्मा के फव्वारे
जैसे-जैसे समय बीता, भारत का भूखंड गोंडवाना से टूटकर उत्तर दिशा की ओर बहुत तेजी से भागने लगा। पृथ्वी के पूरे इतिहास में किसी भी महाद्वीप के खिसकने की यह सबसे तेज रफ्तार थी, लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर प्रति वर्ष। जब भारत उत्तर की ओर बढ़ा, तो टेथिस महासागर का पूरा समुद्री तल टूटकर पृथ्वी के अंदर यानी मेंटल में धंसने लगने लगा। करोड़ों सालों तक टेथिस समंदर की वो भारी, ठंडी और पथरीली प्लेटें धरती के गर्भ में डूबती रहीं। डूबते-डूबते ये विशाल चट्टानें सीधे 2900 किलोमीटर नीचे जाकर कोर के मुहाने पर जमा हो गईं। यह इलाका टेथिस महासागर की एक कब्रगाह बन गया।
यहां पर भौतिकी का एक बहुत सीधा नियम काम करता है। जब आप पानी से भरी बाल्टी में कोई भारी पत्थर डालते हैं, तो नीचे का हल्का पानी ऊपर की तरफ उछलता है। ठीक ऐसा ही पृथ्वी के 2900 किलोमीटर नीचे हुआ। अफ्रीका के नीचे कोर के पास पहले से ही अत्यधिक गर्म और पिघले हुए मैग्मे का एक विशालकाय भंडार मौजूद था, जिसे वैज्ञानिक अफ्रीकन एलएलएसवीपी ब्लॉब्स कहते हैं। जब टेथिस सागर की भारी और ठंडी चट्टानें नीचे गिरीं, तो उन्होंने अफ्रीका के उस उबलते हुए मैग्मे को किनारे से बुरी तरह दबा दिया।
इस जबरदस्त दबाव के कारण अफ्रीका के नीचे से गर्म, हल्के और उबलते हुए पत्थरों के विशालकाय फव्वारे यानी मेंटल प्लूम्स उत्तर-पूर्व की तरफ उठे और सीधे हिंद महासागर के नीचे आकर जमा होने लगे। यह मैग्मा आसपास की सामान्य चट्टानों से बहुत ज्यादा गर्म और हल्का था। इसने नीचे की भारी चट्टानों की जगह ले ली। आसान भाषा में कहें तो, भारत के ठीक नीचे पृथ्वी के पेट में बहुत बड़े पैमाने पर वजन की कमी हो गई। जब नीचे वजन ही कम हो गया, तो ऊपर सतह पर गुरुत्वाकर्षण अपने आप घट गया। गुरुत्वाकर्षण कमजोर होते ही समुद्र का पानी इस जगह पर टिक नहीं पाया और वह उत्तर की ओर भारत की तरफ तथा दक्षिण की ओर ज्यादा खिंचाव वाले इलाकों की तरफ बह गया। नतीजा यह हुआ कि हिंद महासागर के बीच में 106 मीटर गहरा एक विशालकाय गड्ढा बन गया। वैज्ञानिकों के मॉडल बताते हैं कि यह गड्ढा आज से लगभग 2 करोड़ साल पहले बनना शुरू हुआ था और जब तक यह मेंटल प्लूम ठंडा होकर भारी नहीं हो जाता, यह गड्ढा ऐसे ही बना रहेगा।
जब भी हिंद महासागर के इस रहस्यमयी गड्ढे की बात आती है, तो कुछ लोग इसे किसी प्राचीन युद्ध, रामायण काल के ब्रह्मास्त्र या अंतरिक्ष से गिरे किसी उल्कापिंड से जोड़ने लगते हैं। लेकिन वैज्ञानिक जांच यह साफ कर चुकी है कि किसी भी उल्कापिंड या हथियार का असर पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी तक ही सीमित रहता है, जो मुश्किल से 30 से 40 किलोमीटर गहरी होती है। हिंद महासागर का यह गड्ढा 2900 किलोमीटर की भयानक गहराई में होने वाली हलचल का नतीजा है। लेकिन असली रोमांच तब शुरू होता है जब हम यह पूछते हैं कि क्या इस इलाके में समुद्र के स्तर के इस विचित्र व्यवहार का असर यहां रहने वाले प्राचीन इंसानों पर भी पड़ा था?
कुमारी कंदम और दक्षिण भारत का प्राचीन इतिहास
दस्तावेजों में जो दर्ज था, उसने इतिहासकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। भारत के दक्षिणी छोर पर कन्याकुमारी के आगे आज जहां सिर्फ हिंद महासागर की उफनती लहरें दिखाई देती हैं, प्राचीन तमिल संगम साहित्य को पढ़ें तो वहां एक बिल्कुल अलग ही दुनिया का नक्शा मिलता है। तमिल परंपराओं के अनुसार, प्राचीन काल में कन्याकुमारी के दक्षिण में एक अत्यंत विशाल, उपजाऊ और समृद्ध भूभाग मौजूद था, जिसे कुमारी कंदम कहा जाता था। तमिल महाकाव्य शिलप्पदिकारम में साफ शब्दों में लिखा है कि पहरूली नदी और अनेक पहाड़ों से घिरी कुमारी की उपजाऊ घाटियों वाली भूमि को एक क्रूर समंदर के उग्र जल ने लील लिया था।
प्राचीन तमिल ग्रंथों और टीकाकारों के अनुसार, पांड्य राजाओं ने तीन महान साहित्यिक सभाएं यानी संगम आयोजित किए थे। पहला संगम तेन मदुरै में आयोजित हुआ था। यह शहर कन्याकुमारी के काफी दक्षिण में समुद्र के अंदर स्थित था। यह संगम हजारों वर्षों तक चला, लेकिन एक भयानक समुद्री तूफान और जल प्रलय में यह पूरा शहर समुद्र में डूब गया। इसके बाद पांड्य राजाओं ने अपनी राजधानी पूर्व की ओर कपाटपुरम में बनाई और दूसरा संगम शुरू हुआ। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, समुद्र फिर से उफन पड़ा और कपाटपुरम भी लहरों में समा गया। अंत में जो विद्वान और राजा बचे, वे उत्तर की ओर खिसक आए और उन्होंने आज के तमिलनाडु के मदुरै शहर में तीसरे संगम की स्थापना की। तमिल साहित्य में इस समुद्री प्रलय को नाम दिया गया, कदल कोल, जिसका मतलब होता है समंदर द्वारा जमीन को निगल लिया जाना। सदियों तक पश्चिमी इतिहासकारों ने इसे कवियों की कोरी कल्पना माना। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने जब भारत और मेडागास्कर के जीवों में समानता देखी, तो उन्होंने इसे लेमूरिया का नाम देकर एक खोए हुए महाद्वीप की कहानी बना दी। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाली और वैज्ञानिक थी।
अंतिम हिमयुग और जल प्रलय का सच
आधुनिक भूविज्ञान ने जब पृथ्वी के जलवायु इतिहास की परतें खोलीं, तो पता चला कि पिछले कुछ लाख सालों में कोई ऑस्ट्रेलिया जितना बड़ा महाद्वीप तो अचानक नहीं डूबा, लेकिन आज से लगभग 20,000 साल पहले हमारी पृथ्वी अंतिम हिमयुग के दौर से गुजर रही थी। उस समय पूरी दुनिया में इतनी भीषण ठंड थी कि महासागरों का खरबों टन पानी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर विशाल ग्लेशियरों के रूप में बर्फ बनकर जमा हुआ था। चूंकि पानी बर्फ बनकर जमीन पर जम चुका था, इसलिए दुनिया भर के समुद्रों का जलस्तर आज के मुकाबले लगभग 120 से 130 मीटर नीचे था।
जरा सोचिए, अगर आज हिंद महासागर का पानी 120 मीटर नीचे चला जाए, तो भारत का नक्शा कैसा दिखेगा? कन्याकुमारी पर भारत खत्म नहीं होगा। भारत और श्रीलंका के बीच जो आज मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य का उथला समंदर है, वह पूरी तरह सूखी जमीन बन जाएगा। उस समय भारत और श्रीलंका एक ही विशाल भूखंड थे। कन्याकुमारी के दक्षिण में आज जो महाद्वीपीय शेल्फ समुद्र के नीचे 40 से 80 मीटर की गहराई पर डूबी हुई है, वह उस समय हरी-भरी, उपजाऊ और नदियों से सींची जाने वाली सूखी जमीन थी। यहां घने जंगल थे, नदियाँ बहती थीं और इंसानी बस्तियां फल-फूल रही थीं।
फिर आज से लगभग 14,000 साल पहले पृथ्वी का तापमान अचानक तेजी से बढ़ना शुरू हुआ। बड़े-बड़े ग्लेशियर पिघलने लगे। समुद्र वैज्ञानिकों ने पाया है कि उस दौरान मेल्टवाटर पल्स वन ए नाम की एक भयानक घटना घटी। केवल 400 से 500 वर्षों के भीतर समुद्र का स्तर 16 से 20 मीटर तक ऊपर चढ़ गया। इसके बाद लगभग 11,500 साल पहले मेल्टवाटर पल्स वन बी के दौरान पानी में फिर से एक बहुत बड़ा उछाल आया। जब ग्लेशियर पिघले और समुद्र 120 मीटर ऊपर चढ़ा, तो भारत के दक्षिणी तटों पर मौजूद लाखों वर्ग किलोमीटर की उपजाऊ जमीन, नदी घाटियां और तटीय बस्तियां एक के बाद एक समुद्र के पेट में समा गईं। कई बार समुद्री तूफानों और पानी के अचानक बढ़ते स्तर ने रातों-रात पूरे के पूरे इलाकों को डुबो दिया। जो लोग वहां से जान बचाकर भागे, वे उत्तर की ओर आज के तमिलनाडु और केरल की तरफ बढ़े। उनकी आने वाली पीढ़ियों ने इस महाविनाश को अपनी मौखिक परंपराओं में संजोकर रखा, जो आगे चलकर संगम साहित्य में कदल कोल और कुमारी कंदम बन गया।
हैरानी की बात यह है कि यही घटना केवल तमिल परंपरा में ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथों में भी हूबहू दर्ज है। मत्स्य पुराण और शतपथ ब्राह्मण में राजा सत्यव्रत की कथा आती है, जिन्हें हम वैवस्वत मनु के नाम से जानते हैं। जब भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर मनु को आने वाले प्रलय की चेतावनी दी थी, तो उस समय मनु कहां थे? मत्स्य पुराण में साफ लिखा है कि राजा सत्यव्रत कृतमाला नदी के जल में तर्पण कर रहे थे। आज का भूगोल बताता है कि यह कृतमाला नदी कोई काल्पनिक नदी नहीं, बल्कि तमिलनाडु की ऐतिहासिक वैगई नदी है, जो मदुरै से होकर बहती है। ग्रंथों के अनुसार, सत्यव्रत द्रविड़ देश के राजा थे। जब महाप्रलय का पानी उठा, तो समुद्र का पानी दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ा और उनकी नौका हिमालय की तरफ खींची गई। मेसोपोटामिया की गिलगमेश कथा से लेकर नूह की कश्ती और भारतीय पुराणों तक, हर जगह जिस वैश्विक जल प्रलय का जिक्र है, उसका वैज्ञानिक आधार वही 120 मीटर का समुद्री फैलाव था जिसने कन्याकुमारी के दक्षिणी मैदानों को जलमग्न कर दिया था।
पानी के नीचे दबी प्राचीन बस्तियां और इसरो की खोज
लेकिन क्या इस बात का कोई पुख्ता भौतिक सबूत है कि कन्याकुमारी और तमिलनाडु के तटों पर पानी के नीचे सचमुच कोई सूखी जमीन और बस्तियां मौजूद थीं? यहीं पर भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो और भारत के राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की खोजों ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने जब कार्टोसैट और ओशनसैट सैटेलाइट्स के हाई-रेजोल्यूशन डेटा और उपग्रह बाथिमेट्री की मदद से तमिलनाडु के पूर्वी और दक्षिणी तट का थ्री-डायमेंशनल नक्शा तैयार किया, तो वैज्ञानिक दंग रह गए।
तमिलनाडु में कावेरी, वैगई और ताम्रपर्णी जैसी नदियों के मुहाने आज जहां समुद्र में गिरते हैं, समुद्र के पानी के नीचे 20 से 40 मीटर की गहराई पर उनकी सूखी नदी घाटियां आज के तट से 30 से 40 किलोमीटर अंदर तक जाती हुई साफ दिखाई देती हैं। नदियां कभी भी समुद्र के खारे पानी के अंदर गहरी घाटियां नहीं काट सकतीं, वे घाटियां तभी बनाती हैं जब वे खुली हवा में सूखी जमीन पर बहती हैं। इसका सीधा और अचूक वैज्ञानिक प्रमाण यह है कि जहां आज 40 मीटर गहरा खारा समंदर हिलोरे मार रहा है, वहां कभी खुली धूप में नदियां बहती थीं और उनके किनारों पर उपजाऊ मैदान फैले हुए थे।
इस खोज का सबसे पुख्ता सबूत तमिलनाडु के मयिलादुथुरै में स्थित पूम्पुहार के तट पर मिला। संगम साहित्य के शिलप्पदिकारम में पूम्पुहार को चोल साम्राज्य का एक अत्यंत समृद्ध बंदरगाह बताया गया है, जो समुद्र में डूब गया था। जब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी और भारतीदासन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मल्टी-बीम इको-साउंडर और साइड-स्कैन सोनार से समुद्र के भीतर 10 से 23 मीटर की गहराई पर जांच की, तो उन्हें वर्तमान तट से 5 से 11 किलोमीटर दूर पानी के भीतर इंसानों द्वारा बनाई गई विशाल संरचनाएं मिलीं। पानी के नीचे यू-आकार की ईंटों की दीवारें, गोदी यानी डॉकयार्ड के अवशेष, पत्थर के चबूतरे और चौड़ी सड़कें दबी हुई पाई गईं। वैज्ञानिक डेटिंग ने साबित किया कि ये संरचनाएं ईसा पूर्व 300 से लेकर हजारों साल पुरानी हैं। ठीक ऐसा ही राम सेतु के 48 किलोमीटर लंबे गलियारे में देखने को मिलता है। मन्नार की खाड़ी का भूवैज्ञानिक सर्वे बताता है कि हिमयुग के दौरान भारत और श्रीलंका आपस में जुड़े हुए थे और दोनों तरफ एक ही तरह के पाषाण कालीन इंसानी औजार मिले हैं। समंदर के बढ़ते जलस्तर ने इस जमीनी संपर्क को तोड़कर पानी के नीचे धकेल दिया है।
भविष्य की चुनौतियां और डीप ओशन मिशन
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या हिंद महासागर के 106 मीटर गहरे ग्रेविटी होल और कुमारी कंदम के डूबने के बीच कोई वैज्ञानिक रिश्ता है? भौतिकी में एक नियम होता है जिसे लोकल सी-लेवल फिंगरप्रिंटिंग कहते हैं। जब दुनिया भर के ग्लेशियर पिघलते हैं, तो समंदर का पानी हर जगह बराबर नहीं बढ़ता। पानी किस तरफ बहेगा और कहां कितना ऊंचा चढ़ेगा, यह उस इलाके के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव पर निर्भर करता है।
हिंद महासागर के इस इलाके में दो ताकतें एक साथ काम कर रही थीं। एक तरफ नीचे मेंटल प्लूम्स के उठने से भारतीय प्लेट में अंदरूनी खिंचाव पैदा हो रहा था, जिससे दक्षिणी तटीय जमीन लगातार धीमी गति से नीचे धंस रही थी। दूसरी तरफ ग्रेविटी होल के कारण समंदर की सतह की ढलान इतनी संवेदनशील थी कि जब भी हिंद महासागर में कोई बड़ा भूकंप आया या कोई प्लेट खिसकी, तो पानी का संतुलन बिगड़ने से उठने वाली सुनामी सामान्य समुद्र के मुकाबले कहीं ज्यादा विनाशकारी बन गई। साल 2004 में सुमात्रा में आई सुनामी ने जब तमिलनाडु के तटों पर तबाही मचाई थी, तो उसने कुछ ही मिनटों में महाबलीपुरम के तट पर सदियों से दबे प्राचीन मंदिरों के पत्थरों को पानी से बाहर निकाल दिया था। प्राचीन काल में जब समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ रहा था, तब इस ग्रेविटी होल के ऊपर स्थित हिंद महासागर की सूनामियों ने कुमारी कंदम के तटीय मैदानों को बार-बार जलमग्न किया।
भारत इस रहस्य की अंतिम तह तक पहुंचने के लिए समंदर के पाताल में उतर चुका है। भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का डीप ओशन मिशन और उसकी स्वदेशी पनडुब्बी मत्स्य 6000 इस दिशा में सबसे बड़ा कदम है। 80 मिलीमीटर मोटे टाइटेनियम एलॉय से बना यह मजबूत गोला तीन वैज्ञानिकों को लेकर समंदर की सतह से 6000 मीटर यानी 6 किलोमीटर नीचे पाताल में उतरने की क्षमता रखता है। जहां सतह से 600 गुना ज्यादा पानी का दबाव होता है, वहां मत्स्य 6000 मध्य हिंद महासागर रिज पर जाकर उन हाइड्रोथर्मल वेंट्स और मेंटल प्लूम्स की पड़ताल कर रही है जहां से खौलता हुआ मैग्मा निकलता है। वैज्ञानिक वहां से चट्टानों के ऐसे कोर सैंपल निकाल रहे हैं, जो यह साबित करेंगे कि 2900 किलोमीटर नीचे टेथिस सागर का मलबा और अफ्रीका का गर्म मैग्मा आज किस रफ्तार से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को बदल रहे हैं।
कन्याकुमारी के आगे फैला यह अथाह समंदर सिर्फ पानी का विस्तार नहीं है, बल्कि धरती के इतिहास का सबसे बड़ा जीवित संग्रहालय है। एक ऐसा चौराहा, जहां 2900 किलोमीटर पाताल में खौलता हुआ मैग्मा समंदर को 106 मीटर गहरे गड्ढे में दबा देता है, और उसी समंदर की 40 मीटर की गहराई में हमारे उन पूर्वजों की बस्तियां सो रही हैं जिन्होंने हजारों साल पहले हिमयुग के पिघलते पानी को अपनी आंखों से अपनी दुनिया को निगलते देखा था। विज्ञान जिसे इंडियन ओशन जियोइड लो कहता है, इतिहास उसे कुमारी कंदम की दास्तान मानता है, और हमारी प्राचीन स्मृतियां उसे महाप्रलय का नाम देती हैं। जैसे-जैसे आधुनिक विज्ञान और सैटेलाइट्स इस अथाह गहराई के नए राज खोल रहे हैं, वैसे-वैसे यह सवाल और बड़ा होता जा रहा है कि क्या हम जिस धरती पर खड़े हैं, उसके नीचे की आग कल फिर से समंदर का संतुलन बिगाड़कर इतिहास को दोहरा सकती है





