प्रोजेक्ट विष्णु: भारत की इस ‘हाइपरसोनिक’ मिसाइल से कांप उठा चीन और अमेरिका!

प्रोजेक्ट विष्णु: भारत की इस 'हाइपरसोनिक' मिसाइल से कांप उठा चीन और अमेरिका!

16 नवंबर 2024 की शाम। समय था शाम के 5 बजकर 45 मिनट। जगह थी बंगाल की खाड़ी का समंदर। ओडिशा के तट से कुछ मील दूर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आइलैंड पर एक मोबाइल लॉन्चर का काउंटडाउन शून्य पर पहुंचा और कुछ ही पलों में मल्टी-स्टेज सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट ने समताप मंडल की ओर अपनी पहली गरज भरी। सैकड़ों किलोमीटर दूर गहरे समंदर में तैनात भारत के सबसे खुफिया मिसाइल ट्रैकिंग शिप INS Dhruv के विशाल AESA रडार ने जैसे ही उस चमकीले बिंदु को लॉक किया, कंट्रोल रूम की स्क्रीन पर दर्ज हुआ टेलीमेट्री डेटा सामान्य फिजिक्स के सारे पुराने पैमाने ध्वस्त करने लगा। वह मिसाइल आसमान के किसी तय बैलिस्टिक पैराबोला पर नहीं बढ़ रही थी, बल्कि 40 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचते ही उसका अगला हिस्सा अलग हुआ और उसने समंदर की सतह के पैरेलल लगभग 11,000 किलोमीटर प्रति घंटे यानी Mach 8 से भी अधिक की भयानक स्पीड पकड़ ली। जब वह हथियार बंगाल की खाड़ी के निर्जन पानी में ठीक अपने टारगेट पॉइंट पर गिरा, तो समंदर में उठा शॉकवेव कई मील दूर तक दर्ज हुआ। और दिल्ली के साउथ ब्लॉक के बंद कमरों में बैठी रणनीतिक लीडरशिप एकदम से उछल पड़ी।

ये जो टेस्ट किया गया था, ये कोई नॉर्मल मिसाइल टेस्ट नहीं था, बल्कि यह उस स्ट्रेटेजिक पर्दे का अनावरण था जिसे दुनिया की नजरों से वर्षों तक बेहद शातिराना तरीके से छिपाकर रखा गया था। सवाल उठता है कि जिस समय पूरी दुनिया भारत के मिसाइल शस्त्रागार को केवल Agni-5 की बैलिस्टिक लिमिट, Akash एयर डिफेंस की क्षेत्रीय परिधि और BrahMos की सुपरसोनिक स्पीड तक सीमित मानकर बैठी थी, उस समय बंद लैब्स के भीतर ऐसा कौन सा प्रोजेक्ट पक रहा था जिसकी भनक वाशिंगटन और बीजिंग के सबसे मॉडर्न सैटेलाइट्स तक को नहीं लगी?

क्या पेंटागन जिस हाइपरसोनिक तकनीक पर अरबों डॉलर फूंकने और दर्जनों परीक्षण फेल होने के बाद हताश खड़ा था, उसे भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने पहले ही फुल-सिस्टम फ्लाइट टेस्ट में समंदर की छाती पर सटीक उतार दिया? और सबसे बड़ा सामरिक सवाल यह कि क्या S-400, Patriot PAC-3 और THAAD जैसे खरबों डॉलर के ग्लोबल मिसाइल शील्ड इस Mach 8 की आग के सामने महज लोहे के अंधे खिलौने बनकर रह गए हैं?

भू-राजनीति का एक यूनिवर्सल नियम है कि किसी भी देश की फॉरेन पॉलिसी और उसकी मिलिट्री डेस्टिनी सीधे तौर पर उसके भूगोल से तय होती है। भारत के भूगोल को अगर स्ट्रेटेजिक नजरिए से देखा जाए, तो यह दुनिया के सबसे सेंसिटिव और बिजी समुद्री व्यापार मार्ग यानी इंडियन ओशन रीजन के सेंटर में बैठा एक विशाल नेचुरल एयरक्राफ्ट कैरियर है। हिंद महासागर की ये लहरें केवल बिजनेस का रूट नहीं हैं, बल्कि यह ग्लोबल एनर्जी सिक्योरिटी की लाइफलाइन हैं, जहां Strait of Malacca, Bab-el-Mandeb और Strait of Hormuz जैसे संकरे समुद्री चोकपॉइंट्स दुनिया की सुपरपावर्स के शिप्स को निकलने पर मजबूर करते हैं। बीजिंग अपनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स पॉलिसी और जिबूती तथा ग्वादर में मिलिट्री बेस के जरिए भारत को उसी के समुद्री आंगन में घेरने का पूरा मास्टरप्लान बना रहा था।

लेकिन नक्शों पर जो दिखता रहा, असली गेम उससे कहीं ज्यादा गहरा और पेचीदा था। इंडियन स्ट्रेटेजिस्ट्स को भली-भांति पता था कि कन्वेंशनल वॉरशिप्स या केवल भारी-भरकम बैलिस्टिक मिसाइलों के दम पर समंदर और जमीनी बॉर्डर पर परमानेंट डोमिनेंस हासिल नहीं किया जा सकता। बैलिस्टिक मिसाइलें जब दागी जाती हैं, तो वे स्पेस में 200 से 300 किलोमीटर ऊंची छलांग लगाती हैं, जहां पृथ्वी के किसी भी कोने में बैठा अर्ली वार्निंग रडार उनके रास्ते का कैलकुलेशन पहले ही मिनट में कर लेता है। इसके उलट, हाइपरसोनिक वेपन वॉरज़ोन की फिजिक्स को ही बदल देते हैं, और इसी जरूरत ने जन्म दिया उस टॉप-सीक्रेट प्रोग्राम को जिसे खुफिया डिफेंस कॉरिडोर्स में Project Vishnu के नाम से जाना जाने लगा।

साउथ ब्लॉक और DRDO भवन के भीतर इस प्रोग्राम को एक अभेद्य रणनीतिक अस्पष्टता यानी Strategic Ambiguity के पर्दे में लपेट कर रखा गया था। भारत जब तक Missile Technology Control Regime यानी MTCR का मेंबर नहीं बना था, तब तक इंटरनेशनल सैंक्शन्स और सर्विलांस का भारी रिस्क था। 2016 के बाद जब भारत को यह मेंबरशिप मिली, तब भी नई दिल्ली ने कभी अपने इस पत्ते को पब्लिक नहीं किया। इसके पीछे सॉलिड सामरिक कारण था। चाइनीज PLA Rocket Force ने 2019 की अपनी बीजिंग परेड में DF-17 हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल का अग्रेसिव डिस्प्ले करके यह मान लिया था कि इंडो-पैसिफिक रीजन में वह भारत से कम से कम बीस साल की वन-साइडेड टेक्नोलॉजिकल लीड बना चुका है। यदि भारत समय से पहले अपने इरादे जाहिर कर देता, तो दुश्मन अपने सेंसर नेटवर्क, रडार फ्रीक्वेंसी और काउंटर-मेजर टेक्निक्स को पहले ही अपग्रेड कर लेता।

इस पूरे मेगा प्रोजेक्ट की जड़ें हैदराबाद स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल कॉम्प्लेक्स की तीन सबसे सिक्योर लैब्स में चुपचाप सींची जा रही थीं। पहली थी Advanced Systems Laboratory यानी ASL, जिसने सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर्स और बेहद मजबूत कार्बन-फिलामेंट वाइंडिंग केसिंग पर काम किया। दूसरी थी Defence Research and Development Laboratory यानी DRDL, जिसने एयरोडायनामिक्स और हाई-स्पीड प्रोपल्शन के कॉम्प्लेक्स सिमुलेशन तैयार किए। और तीसरी थी Research Centre Imarat यानी RCI, जिसे डॉ. कलाम ने एवियोनिक्स और प्रिसिजन नेविगेशन का हब बनाया था। इन साइंटिस्ट्स के सामने चैलेंज नॉर्मल स्पीड अचीव करने का नहीं था, बल्कि साइंस की उन तीन सबसे खतरनाक दीवारों को तोड़ने का था जहां फिजिक्स के नॉर्मल रूल्स दम तोड़ने लगते हैं।

हाइपरसोनिक स्पीड की पहली दीवार है एरोथर्मल हीटिंग का प्रचंड संकट। जब कोई मिसाइल Mach 8 की स्पीड से एटमॉस्फियर की घनी परतों के ठीक ऊपर दौड़ती है, तो उसके आगे की हवा भयानक प्रेशर से कंप्रेस होती है और मिसाइल की नोज पर टेम्परेचर 2,500 से 3,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। यह वह टेम्परेचर है जहां टाइटेनियम और हाई-ग्रेड स्टील भी मोम की तरह पिघलकर बह जाते हैं। Defence Metallurgical Research Laboratory यानी DMRL के वैज्ञानिकों ने इसके लिए इंडिजिनस अल्ट्रा-हाई टेम्परेचर सिरेमिक्स यानी UHTCs और कार्बन-कार्बन कंपोजिट्स डेवलप किए, जिनमें हैफनियम और ज़िरकोनियम डाइबोराइड जैसे रेयर केमिकल्स का ऐसा मिक्सचर तैयार किया गया जो इस नरक जैसे टेम्परेचर में भी मिसाइल के स्ट्रक्चर को एक मिलीमीटर तक डैमेज नहीं होने देता।

दूसरी दीवार थी प्लाज्मा शीथ और कम्युनिकेशन ब्लैकआउट का भयानक बैरियर। इतनी एक्सट्रीम स्पीड पर हवा में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के मॉलिक्यूल्स टूटकर आयनाइज हो जाते हैं और मिसाइल के चारों ओर चार्ज्ड गैस यानी प्लाज्मा का एक चमकता हुआ बबल बन जाता है। यह प्लाज्मा शील्ड किसी भी रेडियो सिग्नल, GPS वेव या रडार फ्रीक्वेंसी को आर-पार नहीं जाने देती, जिससे मिसाइल बाहरी दुनिया से पूरी तरह अंधी और बहरी हो जाती है। अगर मिसाइल इस कंडीशन में एक सेकंड के हजारवें हिस्से में भी अपने ट्रैक से भटक जाए, तो वह हवा में ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएगी। DRDO ने इसके लिए डबल लेयर का सॉल्यूशन तैयार किया। इसमें बेहद सटीक रिंग लेजर जाइरोस्कोप बेस्ड इनर्शियल नेविगेशन के साथ-साथ स्पेशल RF-ट्रांसपेरेंट विंडोज के जरिए भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम NavIC के सिक्योर सिग्नल्स को प्लाज्मा के वीक पॉइंट्स से मिसाइल के कंप्यूटर तक जोड़ने की तकनीक मास्टर कर ली गई।

लेकिन दुनिया को सबसे ज्यादा शॉक जिस बात ने दिया, वह थी पेंटागन के बड़े-बड़े फेलियर्स के मुकाबले भारत की यह पहले ही शॉट में मिली साइलेंट सक्सेस। अमेरिका ने अपने लॉन्ग-रेंज हाइपरसोनिक वेपन यानी LRHW Dark Eagle और एयर-लांच्ड AGM-183A ARRW प्रोजेक्ट्स पर खरबों डॉलर का बजट पानी की तरह बहा दिया। लेकिन कभी बूस्टर में फॉल्ट, कभी ग्लाइडर की अनकंट्रोल्ड फ्लाइट तो कभी ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट के फेलियर के चलते यूएस आर्मी को अपने टेस्ट बार-बार टालने या कैंसिल करने पड़े। वेस्टर्न डिफेंस मैगजीन्स में यह डिबेट छिड़ गई कि जब दुनिया का सबसे बड़ा मिलिट्री बजट रखने वाला देश हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड टेक्नोलॉजी को ऑपरेशनल करने में स्ट्रगल कर रहा है, तब भारत ने लिमिटेड डिफेंस बजट और बिना किसी फॉरेन हेल्प के इस मोस्ट एडवांस्ड टेक्नोलॉजी को बंगाल की खाड़ी के पानी में कैसे परफेक्टली अचीव कर लिया?

इस टेक्नोलॉजिकल सीक्रेट को समझने के लिए हाइपरसोनिक की दोनों कैटेगरीज का डिफरेंस समझना होगा। एक टेक्नोलॉजी है स्क्रैमजेट इंजन वाली Hypersonic Cruise Missile, जिस पर भारत अपने HSTDV और फ्यूचर की BrahMos-2 के जरिए काम कर रहा है। लेकिन 16 नवंबर 2024 को जिस वेपन ने उड़ान भरी, वह था Hypersonic Glide Vehicle यानी HGV। इसमें एक पावरफुल मल्टी-स्टेज रॉकेट बूस्टर ग्लाइडर को स्पेस के एज पर यानी 70 से 100 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जाकर ड्रॉप कर देता है। इसके बाद बिना किसी इंजन के, केवल अपनी भयानक काइनेटिक एनर्जी और एयरोडायनामिक लिफ्ट के दम पर वह ग्लाइडर एटमॉस्फियर की ऊपरी लेयर पर एक चपटे पत्थर की तरह स्किप करते हुए सीधे टारगेट की ओर गोता लगाता है।

और यहीं पर आकर दुनिया के सबसे महंगे एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह हेल्पलेस हो जाते हैं। मॉडर्न मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स जैसे अमेरिका का THAAD, Patriot PAC-3 और रूस का S-400 एक फिक्स मिलिट्री डॉक्ट्रिन यानी OODA लूप पर काम करते हैं। जब कोई कन्वेंशनल मिसाइल स्पेस की ऊंचाई से गिरती है, तो रडार उसकी स्पीड और ट्रेजेक्टरी को देखकर तुरंत यह कैलकुलेट कर लेते हैं कि वह किस सेकंड में कहां पहुंचेगी, और उसी बेस पर इंटरसेप्टर मिसाइल को ठीक उसी पॉइंट की ओर फायर कर दिया जाता है। लेकिन हाइपरसोनिक ग्लाइडर स्पेस में जाता ही नहीं। वह पृथ्वी के कर्व के ठीक नीचे, 30 से 50 किलोमीटर के उस कॉरिडोर में उड़ता है जहां ग्राउंड रडार उसे तब तक देख ही नहीं पाते जब तक कि वह टारगेट से मात्र 300 या 400 किलोमीटर की क्लोज रेंज में न आ जाए।

Mach 8 की रफ्तार पर 300 किलोमीटर का फासला तय करने के लिए मिसाइल को सिर्फ 90 से 100 सेकंड का टाइम चाहिए। इतने शॉर्ट नोटिस में किसी भी एयर डिफेंस कमांडर के लिए थ्रेट को आइडेंटिफाई करना, उसे ट्रैक करना, डिफेंस सिस्टम को फायर करने का ऑर्डर देना और इंटरसेप्टर को लॉन्च करना लगभग इम्पॉसिबल हो जाता है। और अगर किसी तरह किस्मत से इंटरसेप्टर मिसाइल फायर कर भी दी जाए, तो हाइपरसोनिक ग्लाइडर अपने कार्बन-कंपोजिट विंग्स और रिएक्शन कंट्रोल थ्रस्टर्स के दम पर पलक झपकते ही अपना डायरेक्शन चेंज कर लेता है। मैक 4 या 5 पर उड़ने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलें हवा में इतने शार्प टर्न ले ही नहीं सकतीं, क्योंकि भयानक एयरोडायनामिक प्रेशर उन्हें हवा में ही तोड़ कर रख देगा। मॉडर्न मिसाइल शील्ड्स के लिए यह सिचुएशन किसी अंधे शिकारी जैसी है जो एक ऐसी बुलेट को पकड़ने की कोशिश कर रहा है जो लगातार अपना रास्ता बदल रही है।

इसके बाद आता है इस वेपन का सबसे खौफनाक पहलू, जिसे मिलिट्री साइंस में काइनेटिक शॉक यानी काइनेटिक एनर्जी का इम्पैक्ट कहा जाता है। फिजिक्स का बेसिक रूल कहता है कि किसी भी ऑब्जेक्ट की काइनेटिक एनर्जी उसकी वेलोसिटी के स्क्वायर के प्रोपोर्शन में बढ़ती है। जब 1,000 किलोग्राम से ज्यादा वजन का कोई मेटल स्ट्रक्चर लगभग 3 किलोमीटर प्रति सेकंड की स्पीड से किसी भी टारगेट से टकराता है, तो उसे भारी तबाही मचाने के लिए किसी कन्वेंशनल बारूद या न्यूक्लियर पेलोड की जरूरत ही नहीं होती। उसकी केवल प्योर फिजिकल टक्कर ही सैकड़ों टन TNT एक्सप्लोसिव जितनी एनर्जी पैदा करती है। 11,000 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से सीधे डाइव लगाता यह ग्लाइडर समंदर में तैरते 100,000 टन के सुपरकैरियर के पूरे स्ट्रक्चर को दो टुकड़ों में चीर कर रख सकता है, या पहाड़ के 50 फीट नीचे बने कंक्रीट बंकर को बिना किसी केमिकल ब्लास्ट के सिर्फ सीस्मिक शॉकवेव से धूल में मिला सकता है।

ग्लोबल डिप्लोमेसी और पावर बैलेंस के एंगल से देखें तो यह टेक्नोलॉजी सीधे तौर पर डिकैपिटेशन स्ट्राइक यानी दुश्मन की लीडरशिप और कमांड सेंटर्स के तुरंत सफाये की कैपेसिटी से जुड़ी है। जब लॉन्च बटन दबने और टारगेट के हिट होने के बीच का विंडो केवल 4 से 5 मिनट रह जाए, तो विरोधी देश के पास अपने न्यूक्लियर वेपन्स को एक्टिवेट करने या रिटेलिएशन का ऑर्डर देने का टाइम ही नहीं बचता। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी LAC के पार तिब्बत के पठार पर स्थित चाइनीज एयरबेस जैसे Hotan, Lhasa और Ngari Gunsa, जहां चीन ने अपने फाइटर जेट्स और S-400 तथा HQ-9B की बैटरियां डिप्लॉय कर रखी हैं, वे इस मिसाइल की रेंज में मात्र कुछ मिनटों की दूरी पर आ जाते हैं। बीजिंग का यह भ्रम अब पूरी तरह टूट चुका है कि वह दूरी और ऊंचाई का एडवांटेज लेकर भारत पर स्ट्रेटेजिक प्रेशर बना सकता है।

वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान की मिलिट्री स्ट्रेटेजी जो हमेशा से अपने टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स यानी नसर मिसाइलों और फर्स्ट स्ट्राइक के ब्लैकमेल पर टिकी रही है, इस हाइपरसोनिक कैपेसिटी के सामने पूरी तरह जीरो साबित होती है। भारत अपने No First Use यानी न्यूक्लियर वेपन्स का पहले इस्तेमाल न करने के सिद्धांत पर कायम रहते हुए भी, केवल कन्वेंशनल हाइपरसोनिक वेपन्स के दम पर दुश्मन के कमांड हेडक्वार्टर्स और मिसाइल साइलो को किसी भी न्यूक्लियर एस्केलेशन के बिना कुछ ही मिनटों में पैरलाइज कर सकता है। यह कन्वेंशनल डेटरेंस यानी पारंपरिक प्रतिरोध का वह अल्टीमेट लेवल है जो न्यूक्लियर रेड लाइन को क्रॉस किए बिना ही जंग का रिजल्ट तय कर देता है।

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