BrahMos से अफ्रीका तक भारत की नई पहल! रक्षा साझेदारी से कैसे बढ़ेगा वैश्विक प्रभाव?

BrahMos से अफ्रीका तक भारत की नई पहल! रक्षा साझेदारी से कैसे बढ़ेगा वैश्विक प्रभाव?

भारत का रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ तक पहुँच चुका है। भारतीय रक्षा उपकरण अब 80 से अधिक देशों तक पहुँच रहे हैं। यह बदलाव भारत की इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की बढ़ती क्षमता को दिखाता है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल उठता है। क्या बढ़ते रक्षा संबंध भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के करीब ले जा सकते हैं? और क्या 72 देशों के नेटवर्क वाला दावा वास्तव में पूरी हो चुकी तैनाती का प्रमाण है? इन सवालों का जवाब समझे बिना इस कहानी की असली अहमियत सामने नहीं आएगी।

सबसे पहले उस फर्क को समझना होगा, जो पूरी बहस की दिशा तय करता है। किसी देश में भारतीय दूतावास की रक्षा शाखा होना, उस देश को रक्षा उपकरण निर्यात करना और उसके साथ सुरक्षा समझौता करना अलग व्यवस्थाएँ हैं। इनकी संख्याओं को जोड़कर एक साझा सैन्य गठबंधन घोषित नहीं किया जा सकता। भारत के बढ़ते प्रभाव का सही आकलन तभी होगा, जब हम हर रिश्ते की प्रकृति और उसकी वास्तविक स्थिति देखें।

डिफेंस अटैची विदेश में तैनात एक सैन्य प्रतिनिधि होता है। वह दूतावास के माध्यम से स्थानीय रक्षा संस्थानों के साथ संपर्क, प्रशिक्षण, प्रतिनिधिमंडलों की यात्राओं और सहयोग की संभावनाओं पर काम करता है। उसके लिए भारतीय कंपनियों की क्षमताओं की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाना भी उपयोगी भूमिका हो सकती है। लेकिन ऐसी नियुक्ति अपने आप विदेशी सैन्य अड्डा, स्थायी नौसैनिक तैनाती या उस देश की सुरक्षा व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं बन जाती।

अप्रैल 2025 की Reuters रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से मार्च 2026 तक कम से कम 20 अतिरिक्त डिफेंस अटैची विदेश भेजने की योजना बताई गई थी। इसमें अल्जीरिया, मोरक्को, गुयाना, तंजानिया, अर्जेंटीना, इथियोपिया और कंबोडिया का उल्लेख था। कुछ पश्चिमी दूतावासों से अधिकारियों को अन्य स्थानों पर भेजने की बात भी थी। यह विस्तार की योजना का प्रमाण है; हर प्रस्तावित तैनाती पूरी होने का प्रमाण अलग से चाहिए।

इसीलिए 52 से सीधे 72 देशों में नेटवर्क स्थापित हो जाने वाली बात सावधानी से कही जानी चाहिए। उपलब्ध जाँच में इस पूरी संख्या और सभी नियुक्तियों के पूरा होने की एक स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि नहीं मिली। इसका अर्थ यह नहीं कि विस्तार की पहल नहीं हुई। इसका अर्थ है कि मंजूरी, नियुक्ति, अधिकारी का कार्यभार संभालना और किसी पड़ोसी देश की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलना अलग चरण हैं।

भारत की इस पहल का रणनीतिक महत्व समझने के लिए कारोबारी प्रक्रिया देखिए। किसी विदेशी सरकार को उपकरण चाहिए, लेकिन उसे कीमत के अलावा प्रशिक्षण, रखरखाव और लंबे समय तक सर्विस की भरोसेमंद व्यवस्था भी चाहिए। भारतीय प्रतिनिधि उस जरूरत को समझकर संबंधित कंपनियों और सरकारी संस्थानों के बीच संपर्क आसान कर सकता है। इस तरह रक्षा कूटनीति तकनीकी क्षमता को संभावित साझेदारी में बदलने का माध्यम बन सकती है।

यहाँ भारत के लिए बड़ा अवसर है। एक अच्छी मशीन बनाना पहला कदम है। उसे ग्राहक की जरूरत के अनुरूप ढालना, समय पर देना और वर्षों तक उपयोगी बनाए रखना अगली परीक्षा है। खरीदार पूछेगा कि खराबी आने पर सहायता कितनी जल्दी मिलेगी, जरूरी पार्ट्स कहाँ से आएँगे और उसके कर्मचारियों को प्रशिक्षण कैसे मिलेगा। इन सवालों के ठोस जवाब भारतीय उत्पाद की विश्वसनीयता बढ़ा सकते हैं।

मोरक्को के साथ हालिया पहल इस प्रक्रिया की स्पष्ट मिसाल है। आठ सितंबर 2026 को नई दिल्ली में दोनों देशों की पहली Joint Defence Committee बैठक हुई। प्रशिक्षण, सैन्य अभ्यास, चिकित्सा सहयोग, साइबर डिफेंस और रक्षा उद्योग पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी सहयोग और रखरखाव की संभावनाएँ तलाशने पर सहमति जताई। सितंबर 2025 के रक्षा सहयोग समझौते के बाद यह संस्थागत बातचीत का अगला कदम था।

रवांडा के साथ भी इसी तरह ठोस प्रगति दर्ज हुई है। छह और सात जुलाई 2026 को नई दिल्ली में दूसरी Joint Defence Cooperation Committee बैठक हुई। प्रशिक्षण, अभ्यास, चिकित्सा सहयोग और रक्षा उद्योग में साझेदारी बढ़ाने पर सहमति बनी। तय कामों के लिए समयसीमा वाला implementation plan भी स्वीकार किया गया। यह विवरण अहम है, क्योंकि किसी साझेदारी की गंभीरता घोषणाओं के साथ उसके अमल की व्यवस्था से समझ आती है।

इन उदाहरणों से निकला रणनीतिक आकलन यह है कि भारत अधिक देशों के साथ नियमित और उपयोगी रक्षा संवाद बनाने की कोशिश कर रहा है। किसी साझेदार की प्राथमिकता समुद्री सुरक्षा हो सकती है, किसी की तकनीकी ट्रेनिंग और किसी की उपकरणों की मरम्मत। हर देश की अलग जरूरत के अनुसार सहयोग तैयार करना भारत की ताकत बन सकता है। यही दृष्टिकोण संबंधों को लंबे समय तक टिकाऊ बनाता है।

अब रक्षा निर्यात के आँकड़े देखिए। वित्त वर्ष 2023–24 में ₹21,083 करोड़ का रिकॉर्ड बना था। उसे 2026 का नवीनतम आँकड़ा बताना सही नहीं होगा। वित्त वर्ष 2025–26 में निर्यात ₹38,424 करोड़ रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹23,622 करोड़ से 62.66 प्रतिशत अधिक था। नए आँकड़े के साथ समय का सही उल्लेख जरूरी है, क्योंकि भारत की वास्तविक प्रगति समझने के लिए तुलना का आधार भी सही होना चाहिए।

लेकिन निर्यात का हर रुपया किसी पूर्ण रक्षा प्रणाली की बिक्री नहीं होता। आधिकारिक विवरण में सिस्टम और सब-सिस्टम की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में भारत की भूमिका भी शामिल है। इसलिए निर्यात प्राप्त करने वाले सभी देशों को भारतीय उपकरणों पर पूरी तरह निर्भर बताना गलत निष्कर्ष होगा। वास्तविक उपलब्धि यह है कि भारतीय उद्योग के लिए विदेशों में अवसर बढ़ रहे हैं और उन अवसरों को टिकाऊ कारोबार में बदलने की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है।

फिलीपींस के साथ BrahMos समझौता इस कहानी का एक स्थापित उदाहरण है। 28 जनवरी 2022 को BrahMos Aerospace ने फिलीपींस के रक्षा विभाग के साथ तट आधारित Anti-Ship Missile System की आपूर्ति का अनुबंध किया था। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने इसे जिम्मेदार रक्षा निर्यात की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। इस समझौते की अहमियत बताने के लिए किसी दूसरे देश में काल्पनिक आपात बैठक या पूरे समुद्री क्षेत्र का समीकरण बदल जाने की कहानी जोड़ने की जरूरत नहीं है।

किसी बड़ी प्रणाली के साथ प्रशिक्षण, रखरखाव और तकनीकी सहायता का संबंध विकसित हो सकता है। इससे दोनों पक्षों के बीच नियमित संवाद बढ़ने की संभावना रहती है। लेकिन उपकरण खरीदना संयुक्त राष्ट्र में हर मुद्दे पर विक्रेता देश के पक्ष में मतदान करने की बाध्यता नहीं बनाता। हर सरकार अपने हित, क्षेत्रीय संबंध और घरेलू प्राथमिकताओं के अनुसार निर्णय लेती है। भारत के लिए भरोसा और उपयोगिता इसी कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

समुद्री सहयोग की चर्चा में गुरुग्राम के IFC-IOR का नाम भी आता है। भारतीय नौसेना के अनुसार यह केंद्र दिसंबर 2018 में स्थापित हुआ था। इसका उद्देश्य जानकारी साझा करके हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और Maritime Domain Awareness बढ़ाना है। सार्वजनिक विवरण में व्यापारिक जहाजों और रुचि वाले पोतों से संबंधित जानकारी का उल्लेख है। उससे हर पनडुब्बी की हर गतिविधि लगातार ट्रैक करने का दावा सिद्ध नहीं होता।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर आते हैं। क्या बढ़ता रक्षा नेटवर्क UNSC की स्थायी सदस्यता का रास्ता खोल देगा? रणनीतिक आकलन में ऐसे संबंध भारत की विश्वसनीयता और संवाद की पहुँच मजबूत कर सकते हैं। किसी साझेदार के साथ लगातार सहयोग होने से सुधारों पर बातचीत आसान हो सकती है। लेकिन राजनीतिक समर्थन बनना और संयुक्त राष्ट्र की कानूनी प्रक्रिया पूरी होना दो अलग उपलब्धियाँ हैं।

UN Charter का Article 108 स्पष्ट व्यवस्था देता है। चार्टर संशोधन के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन चाहिए। उसके प्रभावी होने के लिए दो-तिहाई सदस्य देशों का अनुमोदन भी जरूरी है, जिसमें सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्य शामिल हों। 193 सदस्यों के आधार पर दो-तिहाई समर्थन का मतलब कम से कम 129 देश है। फिर भी केवल इतने वोट मिलने से स्थायी सदस्यता अपने आप लागू नहीं होती।

यही वह तथ्य है जो पूरी कहानी को सही दिशा देता है। रक्षा साझेदारी भारत के लिए प्रभाव बढ़ाने का साधन हो सकती है, मगर उससे स्थायी सदस्यों के अनुमोदन की शर्त समाप्त नहीं होती। इसलिए चीन की भूमिका खत्म हो जाने या भारत के लिए सीट सुनिश्चित हो जाने की घोषणा समय से पहले होगी। भारत को व्यापक समर्थन बनाने और सुधारों पर अंतरराष्ट्रीय सहमति विकसित करने का काम साथ आगे बढ़ाना होगा।

भारत की उभरती क्षमता की असली पहचान उसके संस्थानों, इंजीनियरों और भरोसेमंद साझेदारियों से बनेगी। रक्षा कूटनीति नए संवाद खोल सकती है। उद्योग उन संवादों को सफल उत्पाद और सेवा में बदल सकता है। विदेश नीति उस भरोसे को व्यापक समर्थन में बदलने की कोशिश कर सकती है। भारत के सामने अवसर बड़ा है, और आगे की कसौटी भी स्पष्ट है: बेहतर गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति और लंबे समय तक निभाया जाने वाला सहयोग। इसी आधार पर बढ़ती वैश्विक भूमिका को ठोस और स्थायी बनाया जा सकता है।

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