समंदर में ड्रैगन का शिकार! सुखोई में अस्त्र मिसाइल, इंडोनेशिया से कांपा चीन

समंदर में ड्रैगन का शिकार! सुखोई में अस्त्र मिसाइल, इंडोनेशिया से कांपा चीन

दक्षिण चीन सागर का नटुना इलाका। एक ऐसा समंदर जहां चीन के 10-10 हजार टन से भी भारी मॉन्स्टर जहाज अपनी दादागिरी दिखाते थे, वहां अचानक बीजिंग के रडार्स में पैनिक मच गया है। ड्रैगन के खेमे में आज खौफ का वो माहौल है, जिसे पहले कभी नहीं देखा गया। इंडोनेशिया के फाइटर जेट्स ने 110 किलोमीटर दूर से ही चीनी ड्रैगन के फाइटर जेट्स को लॉक कर लिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर कैसे? रूस के Sukhoi लड़ाकू विमान के विंग्स के नीचे भारत की स्वदेशी Astra मिसाइल रातोंरात कैसे पहुंच गई? आखिर रूसी फाइटर जेट के पंखों के नीचे भारत की ये अचूक और स्वदेशी मिसाइल देखकर सुपरपावर्स की नींद क्यों उड़ी हुई है? करोड़ों डॉलर की अमेरिकी मिसाइलों को लात मारकर इंडोनेशिया ने भारत के दरवाजे पर दस्तक क्यों दी? क्या भारत का मिसाइल इकोसिस्टम और डिफेंस इंडस्ट्री अब दुनिया के हथियारों के बाजार में सबसे बड़ा गेम चेंजर बन चुका है?

दोस्तो, दुनिया अब तक यही समझ रही थी कि भारत केवल अपनी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल BrahMos के एक्सपोर्ट तक सीमित है। दुनिया को लग रहा था कि हम सिर्फ ब्रह्मोस बेचकर ही शांत बैठ जाएंगे। फिलीपींस को 375 मिलियन डॉलर में BrahMos बेचकर भारत ने चीन के माथे पर पहला पसीना जरूर ला दिया था। लेकिन असली धमाका तब हुआ जब इंडोनेशिया ने अपनी एयरफोर्स के रूसी सुखोई विमानों को भारत की स्वदेशी, हवा से हवा में मार करने वाली Astra Mk-1 मिसाइल से लैस करने का ऐतिहासिक और जबरदस्त फैसला किया।

नटुना सागर में इंडोनेशिया का संकट और चीन की दादागिरी

यह कोई साधारण डिफेंस डील नहीं है। यह सीधे तौर पर 21वीं सदी के पावर बैलेंस और जियो-पॉलिटिक्स को पलटने वाला एक महा-कदम है। इस सौदे की जड़ें उस नटुना सागर की गहराइयों में हैं, जहां इंडोनेशिया अपनी संप्रभुता बचाने के लिए वर्षों से लगातार जूझ रहा है। इंडोनेशिया 17,000 से ज्यादा आईलैंड्स का देश है। इसके पास दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते Malacca, Sunda और Lombok मौजूद हैं, जहां से दुनिया का खरबों डॉलर का व्यापार गुजरता है। लेकिन चीन की बुरी नजर इंडोनेशिया के नटुना द्वीपसमूह पर गड़ी है।

चीन ने अपनी तथाकथित ‘नाइन-डैश लाइन’ और अब नई ‘टेन-डैश लाइन’ को मनमाने तरीके से आगे बढ़ाते हुए इंडोनेशिया के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन यानी EEZ पर खुलेआम दावा ठोक दिया। बीजिंग इस पूरे इलाके को अपना पारंपरिक मछली पकड़ने का क्षेत्र बताता है। चीन के कोस्ट गार्ड के विशालकाय जहाज, जिन्हें समंदर का ‘मॉन्स्टर कटर’ कहा जाता है, लगातार इंडोनेशियाई पानी में बेखौफ घुसपैठ करते हैं। इनमें 12,000 टन वजनी 5901 और 4,000 टन वजनी 5402 जैसे भीमकाय जहाज शामिल हैं। इन बड़े जहाजों के पीछे चीन की आर्म्ड मैरीटाइम मिलिशिया की सैकड़ों नावें चलती हैं, जो इंडोनेशिया के टूना ब्लॉक और ईस्ट नटुना गैस फील्ड्स के पास खुलेआम दादागिरी करती हैं।

खतरा केवल पानी की सतह पर नहीं है। चीन ने साउथ चाइना सी के अंदर Fiery Cross Reef, Subi Reef और Mischief Reef जैसे आर्टिफिशियल आईलैंड्स पर अवैध रूप से मिलिट्री बेस खड़े कर दिए हैं। इन कृत्रिम द्वीपों पर 3 किलोमीटर लंबे रनवे, बड़े हैंगर और HQ-9 जैसी खतरनाक एयर डिफेंस मिसाइलें तैनात की गई हैं। वहां से चीन के J-11B, J-16 और 5th जनरेशन के स्टील्थ फाइटर J-20 नटुना सागर के ऊपर उड़ान भरते हैं। साथ ही H-6K न्यूक्लियर बॉम्बर्स की गश्त ने इंडोनेशियाई वायुसेना की सांसें अटका रखी थीं।

रूस और अमेरिका के चक्रव्यूह में फंसा इंडोनेशिया

इंडोनेशिया के पास इस विस्तारवादी चीनी ड्रैगन को रोकने के लिए मॉडर्न हथियारों की भारी कमी थी। 1999 के ईस्ट तिमोर संकट के समय अमेरिका ने इंडोनेशिया पर कड़े हथियार प्रतिबंध लगा दिए थे, जिससे उनके F-16 विमान बिना स्पेयर पार्ट्स के जमीन पर धूल फांकने लगे। इस कड़वे धोखे के बाद जकार्ता ने अपना रुख रूस की तरफ किया और अपनी सुरक्षा के लिए Su-27 और Su-30 लड़ाकू विमान खरीदे।

लेकिन 2022 में हालात अचानक बदल गए। रूस और यूक्रेन के बीच भयंकर जंग छिड़ गई। अमेरिका ने CAATSA सैंक्शंस कड़े कर दिए। रूस इंटरनेशनल बैंकिंग सिस्टम SWIFT से बाहर हो गया। नतीजा यह हुआ कि इंडोनेशिया के लिए अपने ही सुखोई विमानों के स्पेयर पार्ट्स और मिसाइलें हासिल करना लगभग नामुमकिन हो गया। मॉस्को की अपनी फैक्ट्रियां यूक्रेन के मोर्चे के लिए हथियार बनाने में हांफ रही थीं।

उधर चीन अपनी 200 किलोमीटर रेंज वाली PL-15 मिसाइलों के दम पर इंडोनेशिया को लगातार आंखें दिखा रहा था। इंडोनेशियाई सुखोई में पुरानी रूसी मिसाइलें R-77 और R-27 लगी थीं, जिनकी रेंज महज 70 से 80 किलोमीटर थी। यानी चीनी फाइटर जेट्स इंडोनेशियाई सुखोई के रडार में आए बिना ही उन्हें मीलों दूर से मार गिराने की ताकत रखते थे।

इस गंभीर सुरक्षा संकट के बीच जकार्ता ने वाशिंगटन का दरवाजा खटखटाया। लेकिन अमेरिका ने अपनी AIM-120 AMRAAM मिसाइलें देने के लिए ऐसी बेतुकी शर्तें रख दीं, जिसे कोई भी स्वाभिमानी देश स्वीकार नहीं कर सकता। अमेरिका की एक सिंगल AMRAAM मिसाइल की कीमत 1.5 से 2 मिलियन डॉलर बैठती है। इसके साथ ITAR के कड़े नियम और अपमानजनक एंड-यूजर मॉनिटरिंग की शर्त जुड़ी थी। अमेरिकी अफसर जब चाहें तब इंडोनेशियाई एयरबेस पर जाकर मिसाइलों की गिनती कर सकते थे। सबसे बड़ी बात, अमेरिका अपनी मिसाइल को रूसी मूल के सुखोई विमान में लगाने की इजाजत कभी नहीं देता।

भारत की महा-एंट्री और अस्त्र मिसाइल का खौफ

यहीं पर भारत ने दुनिया के डिफेंस मार्केट में वो मास्टरस्ट्रोक खेला, जिसने सबको पूरी तरह हैरान कर दिया। भारत ने इंडोनेशिया के सामने अपनी 100% स्वदेशी Astra Mk-1 मिसाइल पेश की। यह मिसाइल अमेरिकी AMRAAM की तुलना में एक-तिहाई कीमत पर उपलब्ध है। इसकी लागत लगभग 450,000 से 600,000 डॉलर के बीच आती है। इसके साथ न तो कोई पॉलिटिकल ब्लैकमेलिंग है और न ही देश की संप्रभुता को चोट पहुंचाने वाली कोई अपमानजनक शर्त।

अब जरा तकनीकी तौर पर समझिए कि Astra Mk-1 आखिर इतनी खतरनाक और घातक क्यों है। इसे DRDO की प्रमुख लैब्स DRDL, RCI और BDL ने मिलकर तैयार किया है। यह बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइल है। इसका कुल वजन 154 किलोग्राम, लंबाई 3.57 मीटर और व्यास 178 मिलीमीटर है। यह मिसाइल समंदर के लेवल से लेकर 20 किलोमीटर यानी करीब 66,000 फीट की ऊंचाई तक दागी जा सकती है।

Astra की असली ताकत इसकी सुपर स्पीड और गजब की मैन्युवरेबिलिटी में है। यह हवा में Mach 4.5 यानी आवाज की गति से साढ़े चार गुना तेज रफ्तार से चीरती हुई उड़ती है। इसमें स्वदेशी स्मोकलेस सॉलिड-फ्यूल रॉकेट मोटर लगा है। हवा में फायर होते ही यह धुएं की कोई सफेद लकीर नहीं छोड़ती। इसका सीधा सा मतलब है कि दुश्मन के पायलट को आंखों से यह पता ही नहीं चलता कि मौत किस दिशा से आ रही है। जब तक वह संभल पाता है, तब तक मिसाइल उसके सिर पर पहुंच जाती है।

टर्मिनल फेज में यानी टारगेट के पास पहुंचकर यह मिसाइल 40-G तक का भयानक और जानलेवा टर्न ले सकती है। जबकि दुनिया का बेहतरीन से बेहतरीन फाइटर पायलट भी कॉकपिट में 9-G से ज्यादा का दबाव नहीं झेल सकता। इसका साफ मतलब है कि चाहे चीनी J-16 हो या पांचवीं पीढ़ी का J-20, वो आसमान में कितनी भी हवाई कलाबाजियां दिखा लें, Astra के चंगुल से बचकर निकलना उनके लिए नामुमकिन है।

मिसाइल के अंदर हैदराबाद की RCI लैब द्वारा बनाया गया Ku-band एक्टिव रडार सीकर लगा है। शुरुआत में मिसाइल फाइटर जेट के रडार और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के जरिए टारगेट की तरफ बढ़ती है। लेकिन आखिरी पलों में मिसाइल की नाक में लगा खुद का रडार ऑन हो जाता है। यह पूरी तरह ‘फायर एंड फॉरगेट’ हथियार है। पायलट को मिसाइल दागने के बाद दुश्मन की तरफ उड़ते रहने की कोई जरूरत नहीं होती, वह तुरंत अपने विमान को सुरक्षित मोड़ सकता है।

सबसे घातक बात इसका इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स (ECCM) सिस्टम है। मॉडर्न एरियल वॉरफेयर में DRFM जैमर्स मिसाइलों के रडार को अंधा कर देते हैं। लेकिन Astra का सीकर एडवांस्ड सॉफ्टवेयर और फ्रीक्वेंसी हॉपिंग तकनीक से लैस है। दुश्मन कितने भी 100 मिलियन डॉलर के जैमर्स ऑन कर ले, Astra का सीकर असली जेट और नकली इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलों के बीच का फर्क तुरंत पहचान लेता है।

इसके वॉरहेड में 15 किलोग्राम का हाई-एक्सप्लोसिव प्री-फ्रेगमेंटेड बारूद भरा है। इसमें रेडियो-फ्रीक्वेंसी प्रॉक्सिमिटी फ्यूज लगा है। इसे दुश्मन के विमान से टकराने की जरूरत ही नहीं होती। जेट के चंद मीटर के दायरे में आते ही यह फट जाती है। हजारों सुपरसोनिक टंगस्टन के छर्रे दुश्मन के विमान के विंग्स, कॉकपिट और फ्यूल टैंक को एक झटके में छलनी कर देते हैं। इसकी एक्सपोर्ट रेंज 110 किलोमीटर से ज्यादा है और इसका नो-एस्केप जोन 25 से 30 किलोमीटर का है। इस दायरे में आने के बाद कोई भी विमान बचकर वापस बेस पर नहीं जा सकता।

इंपॉसिबल को पॉसिबल बनाता भारत का ‘देसी जुगाड़’

इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सस्पेंस था सुखोई का एवियोनिक्स कोड। भारत का Su-30MKI और इंडोनेशिया का Su-30MK2 देखने में भले ही एक जैसे लगते हों, लेकिन अंदर से दोनों का इलेक्ट्रॉनिक दिमाग पूरी तरह अलग है। भारतीय वायुसेना के सुखोई में आधुनिक Bars PESA रडार लगा है, जिसका सोर्स कोड भारत ने खुद डिकोड कर लिया था। दूसरी तरफ इंडोनेशिया के पास मौजूद विमानों में दशकों पुराना सोवियत N001VEP रडार लगा है, जो पुराने रूसी प्रोटोकॉल पर चलता है।

पूरी दुनिया को लग रहा था कि भारत कभी इंडोनेशियाई सुखोई के साथ Astra को इंटीग्रेट नहीं कर पाएगा। इसके लिए मॉस्को से सोर्स कोड मांगना पड़ेगा और रूस कभी अपना कोड किसी तीसरे देश को नहीं देगा। लेकिन भारतीय रक्षा वैज्ञानिकों ने एक सीक्रेट हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर ब्रिज बनाकर पश्चिमी देशों के होश उड़ा दिए। भारत ने स्मार्ट वेपन इंटरफेस यूनिट (SWIU) तैयार की। यह यूनिट एक अनुवादक की तरह काम करती है। यह पुराने रूसी रडार से निकलने वाले डेटा को पकड़ती है और उसे तुरंत Astra के फायर कंट्रोल लॉजिक में बदल देती है। रूसी ओरिजिनल कोड को छेड़ने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ी। इतना ही नहीं, भारत ने इंडोनेशिया को पुराने रूसी रडार हटाकर अपना स्वदेशी Uttam AESA रडार लगाने का विकल्प भी दे दिया है। रूस भी इस सब पर खामोश है, क्योंकि भारत की यह मदद उलटे रूस के सुखोई प्लेटफॉर्म को दुनिया भर में प्रासंगिक बनाए रख रही है।

कलाम साहब का विजन और ग्लोबल डिमांड

Astra की इस बेमिसाल कामयाबी ने दुनिया भर में हथियारों की खरीद की होड़ मचा दी है। हैदराबाद के मिसाइल कॉम्प्लेक्स के बाहर आज 6 से ज्यादा देश कतार में खड़े हैं। सबसे पहला नाम आर्मेनिया का है। अजरबैजान जब पाकिस्तान से JF-17 फाइटर जेट खरीद रहा है, तो आर्मेनिया ने अपनी सुरक्षा के लिए भारत से Astra मिसाइलें मांगी हैं। भारतीय वायुसेना पहले से ही Su-30 पर Astra चला रही है, इसलिए आर्मेनिया के लिए यह ‘प्लग-एंड-प्ले’ सॉल्यूशन है।

दूसरा बड़ा मोर्चा खाड़ी देशों में खुला है। सऊदी अरब और UAE जैसे अमीर मुल्क अमेरिका की मनमानी और हथियारों की डिलीवरी में देरी से तंग आ चुके हैं और भारत की Astra मिसाइल के जॉइंट प्रोडक्शन में भारी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। साउथ ईस्ट एशिया में वियतनाम और मलेशिया भी अपने सुखोई विमानों के लिए Astra मिसाइल की तरफ देख रहे हैं। अगर वियतनाम भी Astra से लैस हो जाता है, तो साउथ चाइना सी में ड्रैगन की घेराबंदी पूरी तरह से कस जाएगी।

भारत की इस मिसाइल क्रांति के पीछे वो महान सीक्रेट पावर है, जिसकी मजबूत नींव भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉक्टर APJ Abdul Kalam ने इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के जरिए रखी थी। भारत हथियारों के साथ कोई ब्लैक बॉक्स तकनीक नहीं बेचता। अमेरिका जब हथियार बेचता है, तो उसका कंट्रोल अपने हाथ में रखता है। वह जब चाहे सॉफ्टवेयर अपडेट रोककर हथियारों को कबाड़ बना सकता है। लेकिन भारत अपने खरीदारों को पूरी आजादी देता है। Astra का पूरा सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम DRDO का है, जो भारतीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC पर बेहतरीन काम करता है।

हैदराबाद का मिसाइल हब आज 100% स्वदेशी सीकर बना रहा है, जो विदेशी सीकरों से 30% हल्के हैं। इसके साथ ही प्राइवेट कंपनियां भी मिसाइल के कलपुर्जे रिकॉर्ड समय में तैयार कर रही हैं। भविष्य की Astra Mk-2 (160 किमी) और Astra Mk-3 (350 किमी) भी कतार में हैं, जो दुनिया की सबसे एडवांस मिसाइलों को सीधी टक्कर देंगी।

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