क्या वाशिंगटन डीसी के कैपिटल हिल में एक सौ प्रतिशत आयात शुल्क यानी टैरिफ की जो खौफनाक धमकी तैयार हुई थी, उसका सटीक इलाज नई दिल्ली ने दो साल पहले ही खोज लिया था? क्या सच में अमेरिका की एक खोखली धमकी से भारत घुटने टेकने वाला है, या फिर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस टैरिफ वाले ब्रह्मास्त्र को मोदी सरकार ने लागू होने से पहले ही हमेशा के लिए कचरे के डिब्बे में डाल दिया है? आखिर ट्रंप की इस भयानक व्यापारिक धमकी के बाद भी भारत तनाव में क्यों नहीं है? क्या प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के इस खतरनाक प्लान का पहले से ही पूरी तरह पता था? क्या इसीलिए मोदी ने यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन, ईफ्टा देश, फ्रांस, यूएई और इटली के साथ गुपचुप तरीके से पहले ही आठ लाख करोड़ रुपये की वो खुफिया डील कर डाली थी, जिसमें ट्रंप की इस धमकी का तोड़ बहुत पहले ही निकाल लिया गया था? इस बार ऐसा क्या बदल गया है कि भारत, ट्रंप की आंखों में आंखें डालकर खुलेआम कह रहा है कि वो जिससे चाहेगा तेल लेगा और दुनिया की किसी भी महाशक्ति के दबाव में बिल्कुल नहीं आएगा? आखिर क्या है मोदी के पास वो मास्टर चाबी, जिससे अमेरिका से इस बार रत्ती भर भी नहीं डर रहा है भारत?
ज़रा सोचिए, क्या होगा अगर भारत के जामनगर की रिफाइनरियों ने कल सुबह से अचानक काम करना बंद कर दिया? क्या वाकई भारत की एक ना से पूरे यूरोप और अमेरिका में पेट्रोल के दाम डेढ़ सौ डॉलर पार कर जाएंगे और ट्रंप की पूरी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी? क्या वाशिंगटन की असली बौखलाहट भारत की उस मुद्रा विनिमय की महायोजना को लेकर है, जो सौ साल पुराने अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को हमेशा के लिए मिट्टी में मिलाने वाली है? लाल सागर में मिसाइलों की खौफनाक बारिश के बीच, मोदी ने वो कौन सा आईएमईसी रूट खोज निकाला है, जिससे भारत का अरबों डॉलर का माल बिना अमेरिका के रहमो-करम के सीधा यूरोप के बाजारों पर राज करने वाला है?
दोस्तों, हाल ही में अट्ठारह सितंबर को वाशिंगटन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट दो हजार छब्बीस पर दस्तखत किए। दुनिया भर की मीडिया ने तुरंत यह नैरेटिव बनाना शुरू कर दिया कि भारत के लिए यह एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका है। सौ प्रतिशत आयात शुल्क की लटकती तलवार दिखा कर अमेरिका ने सीधा संदेश देने की कोशिश की कि या तो रूस से तेल खरीदना बंद करो, या फिर अमेरिकी बाजार भूल जाओ। दशकों पहले का भारत होता, तो शायद इस भारी दबाव में आकर अपनी विदेश नीतियां बदल देता। लेकिन आज का मजबूत भारत अमेरिका को सीधा और स्पष्ट जवाब दे रहा है कि हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं और अपने फैसले खुद लेंगे।
पर सवाल यह उठता है कि नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में इतनी शांति और निडरता आई कहां से? क्या यह सिर्फ कैमरे के सामने दिया गया एक राजनीतिक बयान है? बिल्कुल नहीं। इसके पीछे भारत की वो कूटनीतिक महारणनीति काम कर रही है जिसे वाशिंगटन का खुफिया तंत्र समय रहते समझ ही नहीं पाया। आज हम उन तमाम छिपे हुए रहस्यों, भू-राजनीतिक आंकड़ों और भारत की उस बिसात का पर्दाफाश करेंगे, जिसने ट्रंप के इस सौ प्रतिशत आयात शुल्क वाले प्लान को पूरी तरह से बेअसर और पंगु कर दिया है।
सबसे पहले अमेरिका के उस पाखंड को बेनकाब करते हैं, जिसे अब पूरी दुनिया अच्छी तरह समझ चुकी है। ट्रंप प्रशासन ने भारत और चीन को डराने के लिए जो कानून पास किया है, उसमें साफ लिखा है कि रूस से तेल या गैस खरीदने वाले देशों पर सौ प्रतिशत तक सीमा शुल्क लगाया जा सकता है। अमेरिका का तर्क है कि रूस से तेल खरीदकर आप पुतिन की युद्ध मशीन को पैसा दे रहे हैं। लेकिन जब बात अमेरिका की अपनी ऊर्जा जरूरतों की आती है, तो सारे अंतरराष्ट्रीय उसूल और नैतिकताएं ताक पर रख दी जाती हैं।
क्या आप जानते हैं कि अमेरिका के पास नब्बे से ज्यादा व्यावसायिक परमाणु रिएक्टर हैं? ये रिएक्टर अमेरिका की कुल बिजली का बीस प्रतिशत पैदा करते हैं। और इन रिएक्टरों को चलाने के लिए जिस यूरेनियम की सख्त जरूरत होती है, वो कहां से आता है? अमेरिकी ऊर्जा प्रशासन के एकदम नए और प्रामाणिक आंकड़ों पर नजर डालिए। अमेरिकी रिएक्टर संचालकों ने जितनी भी विदेशी यूरेनियम संवर्धन सेवाएं खरीदीं, उसमें छब्बीस प्रतिशत हिस्सा अकेले रूस का था। जी हां, अमेरिका खुद रूस से बेझिझक यूरेनियम खरीद रहा है। अमेरिका ने अपने ही कानून में नागरिक परमाणु सहयोग को बकायदा छूट दे रखी है ताकि वाशिंगटन के घर हमेशा रोशन रहें।
भारत के रणनीतिकारों ने अमेरिका की इसी दुखती रग को बहुत ही मजबूती से पकड़ लिया है। भारत का तर्क बेहद सीधा और मारक है। अगर अमेरिका अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस को डॉलर दे सकता है, तो चौदह लाख करोड़ की आबादी वाला देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से सस्ता कच्चा तेल क्यों नहीं खरीद सकता? हमारे विदेश मंत्री लगातार वैश्विक मंचों पर अमेरिका के इस दोहरे रवैये को सटीक आंकड़ों के साथ धो रहे हैं। नैतिक रूप से अमेरिका अब भारत पर रत्ती भर भी दबाव बनाने की औकात नहीं रखता।
अब जरा इस सौ प्रतिशत आयात शुल्क के मनोवैज्ञानिक खेल को गहराई से समझिए। फरवरी दो हजार छब्बीस में अमेरिका ने भारत पर लगाया गया अतिरिक्त पच्चीस प्रतिशत शुल्क हटा दिया था। उस वक्त दोनों देशों के बीच एक व्यापारिक ढांचा सामने आया था, जिसमें अमेरिका ने भारतीय सामान पर अपना शुल्क घटाकर अठारह प्रतिशत कर दिया था। यह एक मीठा जाल था, एक हनीट्रैप, ताकि भारत खुद ही खुशी-खुशी रूस से दूरी बना ले। लेकिन जब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी, तो ट्रंप प्रशासन पूरी तरह से बौखला गया।
लेकिन इस अमेरिकी कानून में एक बहुत बड़ा पेंच है, जो पश्चिमी मीडिया आपसे लगातार छिपा रहा है। कानून में लिखा है कि अमेरिका सौ प्रतिशत तक आयात शुल्क लगा सकता है। यह बिल्कुल नहीं लिखा कि लगा दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति को सिर्फ विशेषाधिकार दिया गया है। आखिर ऐसा क्यों? क्योंकि अर्थशास्त्र का सबसे बुनियादी नियम कहता है कि आयात शुल्क निर्यातक देश नहीं, बल्कि आयातक देश के नागरिक यानी खुद वहां की जनता चुकाती है।
ज़रा सोचिए, अगर ट्रंप प्रशासन भारतीय आईटी सेवाओं, दवा उद्योग, रत्न और आभूषण और कपड़ा उद्योग पर सौ प्रतिशत आयात शुल्क लगा दे, तो अमेरिका का क्या हाल होगा? अमेरिका आज भी अपनी जीवन रक्षक जेनरिक दवाओं के लिए भारत पर भारी रूप से निर्भर है। अगर भारतीय दवाएं सौ प्रतिशत महंगी हो गईं, तो अमेरिका की पूरी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली रातों-रात चरमरा जाएगी। एप्पल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी शीर्ष अमेरिकी तकनीकी कंपनियां भारत को अपने सबसे बड़े उभरते हुए बाजार और विनिर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं। चाइना प्लस वन रणनीति के तहत भारत उनका सबसे बड़ा दांव है। ये अमेरिकी कॉरपोरेट दिग्गज खुद ट्रंप प्रशासन की गर्दन पकड़े हुए हैं कि भारत के खिलाफ उठाया गया कोई भी कड़ा कदम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक आत्मघाती कदम साबित होगा। भारत सरकार इस अर्थशास्त्र को बहुत ही गहराई से समझती है।
लेकिन असली खेल तो वैश्विक तेल बाजार का है, जिसे वाशिंगटन खुद भी स्वीकार करने से डरता है। यूरोप और अमेरिका के नीति निर्माताओं को बहुत अच्छे से पता है कि अगर भारत और चीन ने आज रात से रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। इसका सीधा सा मतलब है अमेरिका के पेट्रोल पंपों पर आग लग जाना। अमेरिका में महंगाई इतनी बेकाबू हो जाएगी कि ट्रंप का राजनीतिक भविष्य और अमेरिकी अर्थव्यवस्था दोनों पूरी तरह से तबाह हो जाएंगे। असलियत तो यह है कि भारत सस्ता तेल खरीदकर पूरी दुनिया को एक भयानक मंदी से बचा रहा है।
इससे भी बड़ा सच है तेल की हेराफेरी, जिसे कूटनीतिक भाषा में ऑयल लॉन्ड्रिंग कहा जाता है, जिसके बारे में पश्चिमी देश कोई बात नहीं करना चाहते। भारत, रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदता है। जामनगर और वाडिनार जैसी विश्वस्तरीय रिफाइनरियों में उसे साफ करता है। और फिर उसी तेल को पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन के रूप में यूरोप और खुद अमेरिका को भारी मुनाफे पर निर्यात कर देता है। पश्चिमी देश तकनीकी रूप से रूसी तेल ही इस्तेमाल कर रहे हैं, बस उस पर भारत में परिष्कृत होने का ठप्पा लगा है। अगर अमेरिका आयात शुल्क लगाकर भारत को रोकता है, तो यूरोप और अमेरिका में ईंधन का ऐसा हाहाकार मचेगा जिसे संभालना ट्रंप के बस की बात नहीं होगी। भारत के पास वो चाबी है, जिससे उसने अमेरिका को ही कूटनीतिक ताले में बंद कर दिया है।
अब उस सवाल पर आते हैं जो इस पूरी कूटनीतिक बिसात का केंद्र है। क्या प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के इस भावी कदम का अंदेशा था? विदेश मंत्रालय के रणनीतिकार बहुत अच्छी तरह जानते थे कि अमेरिकी चुनावों के बाद ट्रंप जैसे नेता संरक्षणवाद और आयात शुल्क का हथियार जरूर इस्तेमाल करेंगे। इसीलिए भारत ने अमेरिकी बाजार पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एक अभूतपूर्व रणनीति पर काम किया।
अगस्त दो हजार पच्चीस के बाद से प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं और व्यापारिक समझौतों के घटनाक्रम को डिकोड करें तो आपका दिमाग हिल जाएगा। भारत ने ईफ्टा यानी स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिक्विडस्टीन के साथ ऐतिहासिक डील साइन की। करीब आठ लाख करोड़ रुपये की बाध्यकारी निवेश प्रतिबद्धता सामने आई। यह इतिहास में पहली बार था। यह अमेरिका को सीधा संदेश था कि निवेश अब सिर्फ वाशिंगटन से नहीं, ज्यूरिख और ओस्लो से भी आ रहा है।
इसके साथ ही ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत ने अचानक रॉकेट जैसी रफ्तार पकड़ ली। इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी के साथ द्विपक्षीय व्यापार का बड़ा लक्ष्य तय हुआ। फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों के साथ रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में ऐसी भागीदारियां हुईं, जिसने भारत को अमेरिकी हथियारों पर निर्भरता से काफी हद तक मुक्त कर दिया।
मध्य पूर्व में यूएई के साथ भारत के रिश्ते इतने गहरे हो गए कि दोनों देशों ने अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करना शुरू कर दिया। यह सीधे तौर पर डॉलर के वर्चस्व को खुली चुनौती है। और सबसे बड़ा पासा पलटने वाला कदम साबित हो रहा है आईएमईसी यानी भारत मध्य पूर्व यूरोप आर्थिक गलियारा। लाल सागर में हमलों के बीच, भारत ने यूरोप तक पहुंचने का एक सुरक्षित, वैकल्पिक और आर्थिक रूट तैयार कर लिया है। अब भारत का अरबों डॉलर का माल अमेरिका पर निर्भर हुए बिना सीधे मध्य पूर्व से होते हुए यूरोप पहुंच सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के ताबड़तोड़ विदेशी दौरों और मध्य एशियाई देशों में रणनीतिक पैठ ने यह साबित कर दिया कि भारत अब सीमित दायरे में काम नहीं कर रहा है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इन दौरों से भारी मात्रा में नई निवेश प्रतिबद्धताएं सामने आईं। जब ट्रंप सौ प्रतिशत आयात शुल्क का खाका तैयार कर रहे थे, तब मोदी दुनिया के नक्शे पर भारत के लिए नए बाजार सुरक्षित कर चुके थे।
वाशिंगटन की बौखलाहट का एक और बहुत बड़ा कारण है डी-डॉलराइजेशन, यानी डॉलर से मुक्ति का अभियान। अमेरिका की असली ताकत उसकी सेना नहीं, उसका डॉलर है। पेट्रोडॉलर की ताकत से अमेरिका पूरी दुनिया को नियंत्रित करता है। जब पश्चिमी देशों ने अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम पर पाबंदी लगाई, तो भारत ने रूस के साथ स्थानीय मुद्रा प्रणाली शुरू कर दी। कई देशों के साथ विशेष बैंक खाते खोल दिए गए ताकि डॉलर के बिना सीधा व्यापार किया जा सके। अमेरिका इस बात से खौफजदा है कि अगर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने डॉलर को दरकिनार करने का सफल मॉडल खड़ा कर दिया, तो पूरा ग्लोबल साउथ यानी दुनिया के तमाम विकासशील देश भारत के पीछे चल पड़ेंगे। ट्रंप का यह सौ प्रतिशत आयात शुल्क का कानून भारत को झुकाने की नहीं, बल्कि डॉलर के टूटते तिलिस्म को बचाने की आखिरी छटपटाहट है।
हाल ही में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और उसके ऐतिहासिक घोषणापत्र ने इस पूरी कहानी को बिल्कुल साफ कर दिया है। दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक तिहाई हिस्सा भारत के नेतृत्व को स्वीकार कर रहा है। यह साबित करता है कि रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश इस बात पर सहमत हैं कि विश्व व्यवस्था में अब फैसले वाशिंगटन या लंदन से नहीं थोपे जा सकते। भारत ने साफ कर दिया है कि हम एक बहुध्रुवीय विश्व के पैरोकार हैं।
यानी दोस्तों, ट्रंप का यह नया कानून कागजों पर डरावना लग सकता है, लेकिन असलियत में यह एक ऐसे शेर की दहाड़ है जिसके दांत वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिलताओं ने कुंद कर दिए हैं। भारत क्यों नहीं डर रहा? क्योंकि भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता उपभोक्ता बाजार है। भारत क्यों तनाव में नहीं है? क्योंकि अगर भारत ने अपनी रिफाइनरियों से तेल की सप्लाई रोक दी, तो पश्चिमी देशों में हाहाकार मच जाएगा। भारत ने अमेरिका के हर झटके को सहने की ढाल बहुत पहले ही तैयार कर ली थी।
अमेरिका आज भी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत, जी-सेवन की बैठकों में शामिल होता है, क्वाड का सक्रिय सदस्य है और अमेरिकी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछाता है। लेकिन भारत ने एक लाल लकीर भी खींच दी है। साझेदारी बराबरी के आधार पर होगी, शर्तों पर नहीं। अमेरिका चाहे तो रूस से यूरेनियम खरीदे, भारत सवाल नहीं उठाएगा। लेकिन अमेरिका यह तय नहीं करेगा कि चौदह सौ मिलियन भारतीयों के लिए सस्ता तेल कहां से आएगा। आज का भारत नियम मानने वाले देश से नियम बनाने वाला देश बन चुका है। ट्रंप की यह सौ प्रतिशत आयात शुल्क की धमकी, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के आगे पूरी तरह बेअसर है। और यह सिर्फ एक कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि आने वाली नई विश्व व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव है।





