मंगल ग्रह का 4.1 अरब साल पुराना सीक्रेट: भारत के हाथ लगा अंतरिक्ष का सबसे बड़ा जैकपॉट!

मंगल ग्रह का 4.1 अरब साल पुराना सीक्रेट: भारत के हाथ लगा अंतरिक्ष का सबसे बड़ा जैकपॉट!

अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में अचानक एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। दुनिया भर की टॉप स्पेस लैब्स में इस वक्त सन्नाटा पसरा हुआ है। जिस लाल ग्रह यानि मंगल ग्रह के रहस्यों को टटोलने के लिए महाशक्तियां पिछले 50 साल से अपनी तिजोरियां खाली कर रही थीं, क्या वो पूरी कोशिश अब तक बिल्कुल गलत दिशा में चल रही थी? क्या वो धूल जिसे मंगल से धरती पर लाने के लिए 90,000 करोड़ रुपये का दांव लगाया जा रहा है, वो चुपचाप सहारा के रेगिस्तान में आकर पहले ही गिर चुकी थी? आखिर सहारा के रेगिस्तान में मंगल ग्रह का 4.1 अरब साल पुराना ऐसा क्या अवशेष मिल गया जिसने भारत की लॉटरी लगा डाली? अमेरिका और चीन की मार्स रेस के बीच भारत के हाथ लगा यह साइलेंट जैकपॉट अंतरिक्ष की महाशक्तियों की नींद क्यों उड़ा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या 800 ग्राम के एक हल्के गुलाबी पत्थर ने ISRO के अगले सबसे बड़े मिशन यानी मंगलयान-2 का पूरा लैंडिंग प्लान बदल कर रख दिया है?

दोस्तो आज इसरो के आने वाले सबसे तगड़े मिशन यानि मंगलयान-2 को लेकर जो खबर आई है उसने हड़कंप मचा डाला है क्योंकि जिस मंगल ग्रह पर भारत के इसरो ने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह को फतह कर इतिहास रच दिया है, अब उसके दूसरे मिशन यानि मंगलयान-2 मिशन के लिए रेगिस्तान में कुछ ऐसा मिल गया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान इसरो की तरफ खींच लिया है। पश्चिमी दुनिया की बड़ी एजेंसियां जिस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए अरबों डॉलर फूंक रही थीं, उसकी सटीक चाबी अचानक वैज्ञानिकों के हाथ लग चुकी है। यह केवल किसी उल्कापिंड के मिलने का सामान्य मामला नहीं है। यह अंतरिक्ष की जियोपॉलिटिक्स, ग्रहों के भूविज्ञान और भारत के फ्यूचर मार्स मिशन से जुड़ा एक सीधा गेम चेंजर साबित हो रहा है।

अफ्रीका के माली में सहारा रेगिस्तान का एक इलाका है, जिसे तेघाज़ा कहा जाता है। यह इलाका अपनी भीषण गर्मी, बंजर नमक के मैदानों और दूर-दूर तक फैले सन्नाटे के लिए जाना जाता है। इसी इलाके की तपती जमीन पर 2022 में स्थानीय खोजकर्ताओं को एक अनोखा पत्थर मिला। उसका वजन लगभग 800 ग्राम था और उसका रंग आम पत्थरों जैसा काला या भूरा नहीं, बल्कि हल्का गुलाबी और धूसर था। जब यह टुकड़ा दुनिया की सबसे एडवांस लैब्स में पहुँचा, तो जांच में सामने आया कि इसका नाम तेघाज़ा 001 रखा गया। जांच करने वाली टीमों में NASA की JPL यानी जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी और एम्स रिसर्च सेंटर के सबसे बड़े वैज्ञानिक शामिल थे। जब इस पत्थर के आइसोटोप्स की जांच हुई, तो वैज्ञानिकों के होश उड़ गए।

यह कोई मामूली उल्कापिंड नहीं था। यह मंगल ग्रह का 4.1 अरब साल पुराना एक सीधा और असली टुकड़ा था। हमारी पृथ्वी पर आज तक 70,000 से ज्यादा उल्कापिंड खोजे जा चुके हैं। लेकिन मंगल ग्रह से आए पत्थरों की कुल संख्या पूरी दुनिया में सिर्फ 435 के आसपास ही दर्ज है। यानी धरती पर किसी दूसरे ग्रह की चट्टान का गिरना कायनात की सबसे दुर्लभ घटनाओं में से एक है। तेघाज़ा 001 पृथ्वी पर मिले अब तक के तीन सबसे पुराने मंगल पत्थरों की लिस्ट में सीधे शामिल हो गया है।

यहाँ पर एक बहुत बड़ा वित्तीय और वैज्ञानिक विरोधाभास खड़ा होता है। अमेरिका की स्पेस एजेंसी NASA अपने मार्स सैंपल रिटर्न यानी MSR मिशन पर काम कर रही है। अमेरिका में मौजूदा प्रशासन के सामने इस मिशन का बजट 10 से 11 अरब डॉलर यानी लगभग 90,000 करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। इस भारी भरकम खर्च और टाइमलाइन को लेकर वाशिंगटन के नीति निर्माताओं के बीच तीखी बहस चल रही है। मंगल से महज़ कुछ सौ ग्राम मिट्टी और चट्टान लाने के लिए दुनिया की सबसे अमीर एजेंसी खरबों रुपये दांव पर लगा रही है। दूसरी तरफ, कुदरत ने टकराव के एक भयानक खेल के जरिए 4.1 अरब साल पुराना मंगल का बिल्कुल सुरक्षित सैंपल सहारा के वीराने में मुफ्त में लाकर पटक दिया।

लेकिन यह पत्थर मंगल से टूटकर धरती तक पहुँचा कैसे? इस यात्रा के पीछे अंतरिक्ष भौतिकी का सबसे हिंसक खेल काम कर रहा था। करोड़ों साल पहले मंगल ग्रह पर किसी बहुत बड़े एस्टेरॉयड या विशाल धूमकेतु का जोरदार टकराव हुआ। इस टक्कर से इतनी भयानक काइनेटिक एनर्जी पैदा हुई, जिसने मंगल के ग्रेविटेशनल पुल को तोड़ दिया। मंगल ग्रह की एस्केप वेलोसिटी लगभग 5.03 किलोमीटर प्रति सेकंड है। उस टकराव ने मंगल की अंदरूनी जमीन से चट्टानों के टुकड़ों को सीधे अंतरिक्ष के शून्य में उछाल दिया। साइंस की भाषा में इस प्रोसेस को इम्पैक्ट स्पैलेशन कहा जाता है, जहाँ चट्टान पिघले बिना ही सीधे स्पेस में शूट हो जाती है।

अंतरिक्ष के अंधेरे और शून्य में यह चट्टान लाखों साल तक भटकती रही। इस दौरान सूरज के चारों तरफ घूमते हुए इस पर कॉस्मिक रेज की लगातार बमबारी होती रही। इस बमबारी ने इसके खनिजों पर हीलियम-3, नियॉन-21 और आर्गन-38 जैसी नोबल गैसों के अमिट फिंगरप्रिंट्स छोड़ दिए। आखिरकार करोड़ों साल बाद इसका रास्ता पृथ्वी के ऑर्बिट से टकराया। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण ने इसे अपनी तरफ खींच लिया। जब यह टुकड़ा लगभग 15 से 20 किलोमीटर प्रति सेकंड की तूफानी रफ्तार से हमारे वायुमंडल में दाखिल हुआ, तो हवा के भीषण घर्षण ने इसके बाहरी हिस्से पर एक पतली काली फ्यूजन क्रस्ट बना दी। सहारा के तेघाज़ा के सूखे और नमक भरे वातावरण ने इसे पानी और जंग से बचाकर अरबों साल तक सुरक्षित रखा, जैसे कुदरत ने इसे किसी टाइम कैप्सूल में बंद करके रखा हो।

जब वैज्ञानिकों ने तेघाज़ा 001 की आंतरिक बनावट की जांच की, तो पता चला कि यह चट्टान मंगल के नोआचियन युग की है। मंगल के पूरे इतिहास को तीन बड़े दौरों में बांटा जाता है। पहला है नोआचियन युग, जो 4.1 से 3.7 अरब साल पहले का दौर था। यह वह समय था जब मंगल पर सक्रिय ज्वालामुखी थे, घना वायुमंडल था और सतह पर नदियों व झीलों का पानी बह रहा था। दूसरा दौर आया हेस्परियन युग, जो 3.7 से 3.0 अरब साल पहले का था, जहाँ पानी सूखने लगा और सल्फेट बनने लगे। तीसरा दौर है अमेज़ोनियन युग, जो पिछले 3.0 अरब साल से आज तक चल रहा है, जिसने मंगल को एक सूखा, ठंडा और लाल जंग लगा रेगिस्तान बना दिया।

तेघाज़ा 001 उस नोआचियन काल के बिल्कुल शुरुआती दौर यानी 4.1 अरब साल पहले का गवाह है। इस पत्थर के भीतर वैज्ञानिकों को सबसे दुर्लभ चीज मिली, जिसे ज़िरकॉन क्रिस्टल कहा जाता है। भूविज्ञान में ज़िरकॉन को कुदरत का सबसे सटीक टाइम कैप्सूल माना जाता है। ज़िरकॉन जब जमता है, तो वह अपने अंदर यूरेनियम और थोरियम को तो जगह देता है, लेकिन लेड यानी सीसे को पूरी तरह बाहर रखता है। जैसे-जैसे वक्त बीतता है, यूरेनियम रेडियोएक्टिव क्षय के जरिए लेड में बदलता जाता है। वैज्ञानिकों ने नैनो-सिम्स जैसी अत्याधुनिक माइक्रो-बीम तकनीक का इस्तेमाल करके यूरेनियम-लेड और रूबिडियम-स्ट्रोंटियम डेटिंग की। रूबिडियम-87 के स्ट्रोंटियम-87 में बदलने के अनुपात ने यह साबित कर दिया कि यह पत्थर ठीक 4.1 अरब साल पहले बना था।

लेकिन असली धमाका तब हुआ जब इस पत्थर के अंदर पानी के सीधे सबूत मिले। इस चट्टान की बारीक दरारों में वैज्ञानिकों को फाइलोसिलिकेट्स यानी क्ले मिनरल्स, कार्बोनेट्स और हाइड्रेटेड सिलिका के रेशे मिले। जब यह चट्टान मैग्मा से जमकर ठंडी हुई थी, तब मंगल के भीतर से उबलते हुए मिनरल रिच पानी के फव्वारे यानी हाइड्रोथर्मल वेंट्स इसके आर-पार बहे थे। इस पानी ने चट्टान के साथ केमिकल रिएक्शन किया था।

इस खोज ने विज्ञान की दुनिया की पुरानी समझ को पूरी तरह उलट दिया। इस पत्थर के अंदर मिले खनिजों ने साबित कर दिया कि 4.1 अरब साल पहले मंगल के अंदर बहने वाला पानी एसिडिक यानी तेजाबी नहीं था। उसका pH लेवल न्यूट्रल से लेकर हल्का एल्कलाइन था। यह वही माहौल है जिसमें जीवन को जन्म देने वाले ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल्स पनप सकते हैं। इतना ही नहीं, इसमें मौजूद ऑक्सीजन आइसोटोप्स ने यह साफ कर दिया कि मंगल पर सिर्फ सतही तालाब नहीं थे, बल्कि वायुमंडल, जमीन और जमीन की गहराइयों के बीच एक विशाल और सक्रिय वाटर साइकिल काम कर रहा था। यानी मंगल कभी सूखा और बंजर ग्रह था ही नहीं, बल्कि वहाँ जीवन के पनपने की हर जरूरी शर्त पूरी तरह मौजूद थी।

यहाँ से कहानी में एक बहुत बड़ा ट्विस्ट आता है। क्या दुनिया की टॉप स्पेस एजेंसियां पिछले 50 साल से मंगल पर गलत जगहों पर जीवन ढूंढ रही थीं? NASA ने अपने सबसे महंगे रोवर्स, जैसे क्यूरियोसिटी को गेल क्रेटर में और पर्सीवरेंस को जेज़ेरो क्रेटर में उतारा। ये दोनों जगहें मुख्य रूप से हेस्परियन काल की सूखी झीलों और डेल्टाओं से जुड़ी हैं। वैज्ञानिकों का मानना था कि सूखी झीलों की तलछट में जीवन के निशान मिलेंगे। लेकिन तेघाज़ा 001 ने साबित किया कि जब वे झीलें बन रही थीं, तब तक मंगल का असली पानी और उसका वायुमंडल खत्म होने की कगार पर था। जीवन का असली पालना तो उससे भी करोड़ों साल पहले, यानी 4.1 अरब साल पुराने नोआचियन युग के हाइड्रोथर्मल सिस्टम में धड़क रहा था।

इस खोज का सबसे सनसनीखेज मोड़ तब आया जब इस पत्थर के डेटा को सैटेलाइट डेटा से मिलाया गया। NASA का एक ताकतवर सैटेलाइट मंगल के चक्कर लगा रहा है, जिसका नाम है मार्स रिकोनिसेंस ऑर्बिटर यानी MRO। इस ऑर्बिटर पर एक बेहद खास उपकरण लगा है, जिसे CRISM यानी कॉम्पैक्ट रिकोनिसेंस इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर फॉर मार्स कहते हैं। CRISM ने पिछले 20 सालों में मंगल की पूरी सतह का मिनरल मैप तैयार किया है। जब वैज्ञानिकों ने तेघाज़ा 001 के इन्फ्रारेड एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रा को CRISM के ग्लोबल डेटाबेस से मैच किया, तो पूरी रिसर्च टीम दंग रह गई।

इस उल्कापिंड के मिनरल सिग्नेचर मंगल के आम ज्वालामुखीय मैदानों से मेल नहीं खाते थे। इसका सीधा मेल मंगल के सबसे पुराने, क्रेटर्स से भरे दक्षिणी उच्चभूमि यानी सदर्न हाइलैंड्स से जाकर बैठा। डेटा को और ज्यादा गहराई से खंगालने पर मंगल की सतह पर ठीक 13 ऐसे सीक्रेट इलाके सामने आए, जिनकी रासायनिक और खनिज बनावट तेघाज़ा 001 से 100 परसेंट मैच करती है। इन 13 इलाकों में टेरा सिमेरिया, टेरा सिरेनम और नोआचिस टेरा के कुछ बेहद खास क्रेटर्स शामिल हैं। वैज्ञानिकों के पास अब मंगल के उन 13 लॉन्च पैड्स के कोऑर्डिनेट्स हैं, जहाँ से यह प्राचीन चट्टान अंतरिक्ष में उड़ी थी। इतिहास में पहली बार वैज्ञानिकों के हाथ में मंगल की सतह का एक ऐसा फिजिकल टुकड़ा है, जिसका सीधा लिंक उस इलाके से जुड़ता है जिसे अब तक सिर्फ सैटेलाइट कैमरों से देखा गया था।

अब सवाल उठता है कि सहारा में मिले इस पत्थर और इन 13 कोऑर्डिनेट्स का भारत से क्या कनेक्शन है? क्यों भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO और अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी यानी PRL के वैज्ञानिक इस रिसर्च को सबसे करीब से ट्रैक कर रहे हैं? इसका जवाब समझने के लिए हमें मंगल अभियानों के खौफनाक इतिहास को देखना होगा।

अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में मंगल ग्रह को स्पेस एजेंसियों का कब्रिस्तान कहा जाता रहा है। 1960 के दशक से लेकर अब तक जितने भी मिशन मंगल के लिए भेजे गए, उनमें से आधे से ज्यादा या तो लॉन्च के वक्त तबाह हो गए, या रास्ते में भटक गए, या मंगल पर क्रैश हो गए। सोवियत संघ ने 1960 में कोराब्ल-4 से शुरुआत की। उनके मार्स-1, मार्स-2, मार्स-6 और 1988 के फोबोस मिशन भारी असफलताओं का शिकार हुए। 1971 में सोवियत संघ के मार्स-3 ने इतिहास में पहली बार मंगल पर सॉफ्ट लैंडिंग की थी, लेकिन उतरने के सिर्फ 110 सेकंड के बाद उसका सिग्नल हमेशा के लिए कट गया। 2011 में रूस का फोबोस-ग्रंट मिशन धरती के ऑर्बिट से बाहर ही नहीं निकल पाया।

सुपरपावर अमेरिका को भी इस लाल ग्रह ने गहरे जख्म दिए हैं। 1993 में NASA का 1 अरब डॉलर का मार्स ऑब्जर्वर मंगल की कक्षा में पहुँचने से सिर्फ 3 दिन पहले गायब हो गया। 1999 में मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर इसलिए जलकर राख हो गया क्योंकि सॉफ्टवेयर में एक टीम ने मीट्रिक यूनिट यानी न्यूटन का इस्तेमाल किया और दूसरी टीम ने पाउंड-फोर्स का इस्तेमाल कर लिया। उसी साल अमेरिका का मार्स पोलर लैंडर भी उतरते वक्त क्रैश हो गया।

इन महाशक्तियों के खरबों डॉलर के नुकसान और दशकों की मायूसी के बीच, भारत ने जब मंगल की तरफ कदम बढ़ाया, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई थी। 5 नवंबर 2013 को ISRO ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से अपने भरोसेमंद रॉकेट PSLV-C25 के जरिए मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी MOM को लॉन्च किया। इस पूरे मिशन की लागत सिर्फ 450 करोड़ रुपये थी, जो उस समय लगभग 73 मिलियन डॉलर बैठती थी। यह बजट हॉलीवुड की स्पेस फिल्मों के खर्च से भी कम था।

24 सितंबर 2014 की उस ऐतिहासिक सुबह को कोई नहीं भूल सकता। ISRO के वैज्ञानिकों ने 440 न्यूटन के लिक्विड एपोजी मोटर यानी LAM इंजन को 1,388 सेकंड के लिए फायर किया। यान मंगल के पिछले हिस्से में था, जहाँ 21 मिनट के लिए पृथ्वी से संपर्क पूरी तरह कट चुका था, जिसे रेडियो ब्लैकआउट कहते हैं। जब यान बाहर निकला और बैंगलोर के टेलीमेट्री सेंटर पर सिग्नल गूंजा, तो भारत ने इतिहास रच दिया था। भारत अपने पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। भारत एशिया का पहला ऐसा राष्ट्र बना जिसने मंगल की कक्षा में कदम रखा। अमेरिका, सोवियत संघ और यूरोपियन स्पेस एजेंसी ESA के बाद भारत दुनिया का चौथा स्पेस पावर बन चुका था।

मंगलयान का डिजाइन जीवन सिर्फ 6 महीने के लिए तय किया गया था। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की शानदार इंजीनियरिंग और फ्यूल मैनेजमेंट के दम पर इस यान ने मंगल की कक्षा में लगातार 8 साल तक शानदार काम किया। इसके मार्स कलर कैमरा यानी MCC ने मंगल की अद्भुत तस्वीरें भेजीं और MENCA पेलोड ने मंगल के वायुमंडल का ऐतिहासिक डेटा दुनिया को दिया।

लेकिन अब दौर बदल चुका है। 2026 में भारत का स्पेस प्रोग्राम सिर्फ अपनी तकनीकी मौजूदगी दर्ज कराने तक सीमित नहीं है। भारत अब गहरे वैज्ञानिक अन्वेषण की उस लीग में खेल रहा है जहाँ सीधे ग्लोबल लीडरशिप तय होती है। केंद्र सरकार की अंतरिक्ष सुधार नीतियों और आत्मनिर्भर भारत के विजन के तहत ISRO अब अपने सबसे बड़े मिशन मंगलयान-2 की तैयारी में जुटा है। मंगलयान-1 सिर्फ एक ऑर्बिटर था, जिसका पेलोड वजन सिर्फ 15 किलोग्राम था। लेकिन मंगलयान-2 एक विशाल साइंस-फर्स्ट मिशन है, जिसे भारत के सबसे भारी रॉकेट LVM3 के जरिए लॉन्च किया जाना तय है। इसमें 100 किलोग्राम से ज्यादा के भारी साइंटिफिक पेलोड्स, एक अत्याधुनिक ऑर्बिटर, एक हाई-टेक लैंडर और एक संभावित रोवर शामिल होगा।

यहीं पर सहारा का यह गुलाबी पत्थर ISRO के लिए एक साइलेंट जैकपॉट बनकर सामने आया है। ग्रहीय विज्ञान में सबसे बड़ी चुनौती होती है ग्राउंड ट्रूथिंग। जब कोई सैटेलाइट अंतरिक्ष से किसी ग्रह की सतह को देखता है, तो वह केवल परावर्तित रोशनी का डेटा होता है। लेकिन अगर आपके पास उस जमीन का असली पत्थर लैब में मौजूद हो, तो आप अपने कैमरों और रडार को बिल्कुल सटीक वेवलेंथ पर ट्यून कर सकते हैं। इसे स्पेक्ट्रल कैलिब्रेशन कहते हैं।

तेघाज़ा 001 ने भारतीय वैज्ञानिकों को मंगल की असली नोआचियन क्रस्ट का एक ऐसा फिजिकल सैंपल दे दिया है, जिसकी मदद से मंगलयान-2 के हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजर्स और सब-सरफेस रडार को कैलिब्रेट किया जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब भारत का ऑर्बिटर मंगल के चक्कर लगाएगा, तो उसके सेंसर्स जमीन के नीचे 100 से 500 मीटर गहराई में दबे प्राचीन जलमार्गों और बर्फ के भंडारों को बिना किसी गलती के पहचान लेंगे।

सबसे बड़ा रणनीतिक मोड़ लैंडिंग साइट के चुनाव को लेकर आया है। अब तक दुनिया की नजरें हेस्परियन झीलों पर थीं। लेकिन तेघाज़ा 001 के स्पेक्ट्रल मैच ने जिन 13 सीक्रेट कोऑर्डिनेट्स की पहचान की है, वे नोआचियन दक्षिणी उच्चभूमि में हैं। टेरा सिमेरिया और टेरा सिरेनम जैसे इलाके अब मंगलयान-2 की संभावित लैंडिंग साइट्स की रडार पर सबसे ऊपर आ चुके हैं। अगर ISRO का लैंडर इन 13 चिन्हित इलाकों में से किसी एक के पास उतरता है, तो भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन जाएगा जो उस प्राचीन धरातल पर सीधे ड्रिल करेगा, जहाँ कभी खौलता हुआ हाइड्रोथर्मल पानी जीवन की नींव रख रहा था। यह सीधे तौर पर अन्य अंतरिक्ष मिशनों को बाईपास करके विज्ञान की सबसे बड़ी छलांग लगाने जैसा है।

भारतीय वैज्ञानिकों के लिए उल्कापिंडों का विज्ञान कोई नया खेल नहीं है। मंगल के उल्कापिंडों की पूरी दुनिया में पहचान ही भारत के नाम से जुड़ी हुई है। ग्लोबल साइंस में मंगल के पत्थरों को SNC ग्रुप कहा जाता है। इसमें S का मतलब होता है शेर्गाटाइट। यह नाम बिहार के गया जिले के शेरघाटी कस्बे से आया है। 25 अगस्त 1865 को दोपहर के समय शेरघाटी में एक भयानक धमाके के साथ उल्कापिंड गिरा था। दशकों बाद जब आधुनिक विज्ञान ने जांच की, तो पता चला कि वह पत्थर सीधे मंगल के ज्वालामुखी से आया था। आज पूरी दुनिया में मंगल के जितने भी उल्कापिंड मिलते हैं, उनमें से अधिकांश शेर्गाटाइट क्लास के ही होते हैं। दूसरा क्लास है नखलाइट, जो 1911 में मिस्र में गिरा था, और तीसरा है चैसेग्नाइट, जो 1815 में फ्रांस में गिरा था।

अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी यानी PRL, जिसकी नींव भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई ने रखी थी, उल्कापिंडों और कॉस्मोकेमिस्ट्री के विश्लेषण में दुनिया के सबसे बड़े केंद्रों में गिनी जाती है। इसके अलावा, भारत के पास महाराष्ट्र का लोनार क्रेटर है, जो बेसाल्टिक चट्टान पर उल्कापिंड गिरने से बना दुनिया का इकलौता क्रेटर है। लद्दाख का ठंडा और शुष्क रेगिस्तान दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए मंगल का सबसे बेहतरीन अर्थ एनालॉग माना जाता है। लोनार के पत्थरों में जिस मास्केलिनाइट मिनरल का अध्ययन भारतीय भूवैज्ञानिक करते हैं, ठीक वही मिनरल तेघाज़ा 001 की संरचना में मौजूद है।

अब जरा इस दौर में चल रही ग्लोबल मार्स रेस की नब्ज को समझिए। इस वक्त लाल ग्रह सिर्फ साइंस की लैब नहीं है, बल्कि यह भविष्य की स्पेस इकोनॉमी और जियोपॉलिटिकल दबदबे का नया मैदान बन चुका है। एक तरफ अमेरिका है, जिसके रोवर्स सतह पर हैं, लेकिन उसका मार्स सैंपल रिटर्न मिशन भारी बजट संकट और तकनीकी पेचीदगियों में फंसा हुआ है। दूसरी तरफ चीन है, जिसने अपने रोवर्स को उतारकर हलचल मचाई है और अब वह नए मिशनों के जरिए अमेरिका से पहले मंगल की मिट्टी लाने की फिराक में है। अन्य देश भी मंगल की कक्षा में डटे हुए हैं।

इस भयंकर और खर्चीली होड़ के बीच भारत की रणनीति हमेशा से लागत-कुशल और अधिकतम वैज्ञानिक प्रभाव वाली रही है। अमेरिका और चीन जिस नोआचियन चट्टान को लाने के लिए अपनी संसद और बजट कमेटियों में खरबों रुपये की मंजूरी मांग रहे हैं, भारत ने उसी नोआचियन चट्टान के सीक्रेट्स को अपनी लैब्स में पहले ही डिकोड करना शुरू कर दिया है। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक दूरदर्शिता का वह साइलेंट मास्टरस्ट्रोक है, जिसकी गूंज आने वाले दशकों तक सुनाई देगी।

सहारा के नमक के मैदान में लावारिस पड़ा वह 800 ग्राम का पत्थर कोई आम टुकड़ा नहीं था। वह करोड़ों किलोमीटर का सफर तय करके इंसानियत को यह बताने आया था कि हमारी पृथ्वी और मंगल कभी एक जैसे ही पानी से लबालब संसार हुआ करते थे। उसने दुनिया को यह भी बता दिया कि अगर मंगल पर जीवन के सबसे गहरे पन्नों को खोलना है, तो नजरें कहाँ दौड़ानी होंगी। भारत, जिसने अपने पहले ही वार में मंगल की दहलीज लांघकर दुनिया को चौंका दिया था, अब मंगलयान-2 के जरिए उसी 4.1 अरब साल पुराने रहस्य की अंतिम परत हटाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है

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